संक्षिप्त पूजन विधि

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प्रकृति से सीधे संपर्क का सशक्त माध्यम है पूजा
मनुष्य का ब्रह्मांड की मूल शक्ति से सीधा संपर्क का सबसे आसान माध्यम है पूजन। हालांकि योग, ध्यान और तपस्या से भी इस लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है लेकिन उसमें ज्यादा एकाग्रता और अधिक समय देने की जरूरत पड़ती है जबकि पूजन में चूंकि साधक की भक्ति भावना के साथ विषय (देवी/देवता) स्पष्ट होते हैं, इसलिए आसानी से एकाग्रता आ जाती है और मनुष्य का प्रकृति से सीधा संपर्क हो जाता है। इसमें किसी अन्य अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रक्रिया से मनुष्य की आंतरिक शक्तियां जागृत होती हैं और वह किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करती हैं। वैदिक युग में यही लक्ष्य और विधि प्रचलित थी। इसमें कोई कर्मकांड और आडंबर की गुंजाइश नहीं थी। बाद के युगों में कथित धर्मगुरुओं ने अपनी दुकान चलाने के लिए इस प्रक्रिया को दुरुह बना दिया। परिणास्वरूप पूजा में भक्ति भाव से ज्यादा दिखावा और व्यर्थ की क्रियाओं का समावेश हो गया जिससे लोगों को पूजा का फल मिलना भी कम होते-होते बंद सा हो गया है। इस भ्रमजाल को तोड़कर लोगों को फिर से प्रकृति की मूल शक्ति की ओर ले जाने के लिए आडंबररहित संक्षिप्त पूजन विधि की जानकारी दे रहा हूं ताकि लोग बिना किसी पंडित या जानकार के घर में खुद पूजन कर सकें और प्रकृति से सीधा संपर्क बनाकर मनचाहा लक्ष्य हासिल कर सकें।
पूजन विधि
सर्वप्रथम सभी आवश्यक पूजन सामग्री पूजा स्थान (जहां पूजा करनी हो उसे साफ करके) पर रख लें। इसमें अक्षत (बिना टूटा अरबा चावल धोकर), धूप, दीप, नैवेद्य (जो आसानी से उपलब्ध हो व प्रसाद),  जल (साफ पानी), अरघी (चम्मच जैसा पात्र न मिले तो चम्मच से भी काम चला सकते हैं) चंदन या रोली तथा फूल हो। इसके बाद आसन पर बैठकर धातु की साफ थाली या प्लेट को सामने रखें। इसके बाद ध्यान लगाकर (आंख बंद करने से अभीष्ट के प्रति ज्यादा एकाग्रता आती है यदि ऐसे ही ध्यान लगे तो बिना आंख बंद किए भी कर सकते हैं) अभीष्ट देवी या देवता जिनकी पूजा करनी हो उनका मंत्र पढ़कर मानसिक आवाहन (बुलाएं) करें। इसके बाद विधिवत पूजा शुरू करें। इस विधि से आप किसी भी देवी-देवता का पूजन कर सकते हैं। ध्यान रहे कि यदि बाहर हैं और पूजा के लिए अपेक्षित उपरोक्त वस्तु में से कोई वस्तु न मिले तो चिंता न करें। मानसिक रूप से उस वस्तु की कल्पना कर उसका पूजन में उपयोग कर सकते हैं।
सबसे पहले दायें हाथ में अक्षत लेकर ऊं भूर्भुव: स्व: …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) इहा गच्छ, इह तिष्ट, स्थापयामि, पूजयामि नम: मंत्र पढ़ कर थाली में अक्षत डाल दें। इसके बाद अरघी/चम्मच में जल लेकर एतानि पाद्यार्चमनीय स्नानीय पुनराचमनीयानि समर्पयामि …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) नम: मंत्र पढ़ कर जल थाली में दें। फिर उंगली में या हाथ में फूल लेकर उसमें चंदन लगाकर ऊं भूर्भुव: स्व: …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) नम: चंदानु लेपनम समर्पयामि मंत्र पढ़कर चंदन थाली में लगाएं (यदि फूल में लगा हो तो उसे थाली में रख दें)। पुन: हाथ में अक्षत लेकर ऊं भूर्भुव: स्व: …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) नम: अक्षतान समर्पयामि मंत्र पढ़कर अक्षत थाली में रखें। पुन: हाथ में फूल लेकर ऊं भूर्भुव: स्व: …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) नम: पुष्पम् समर्पयामि पढ़कर फूल थाली में रखें। इसके बाद अरघी/चम्मच में जल लेकर धूप के समक्ष घुमाते हुए ऊं भूर्भुव: स्व: …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) नम: धूपमाघ्रापयामि नम: मंत्र पढ़कर जल को थाली में डाल दें। पुन: इसी तरह जल लेकर दीप के समक्ष घुमाते हुए ऊं भूर्भुव: स्व: …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) नम: दीपम दर्शयामि कहते हुए जल को थाली में डाल दें। इसके बाद पुन: जल लेकर नैवेद्य (प्रसाद) के चारों ओर घुमाते हुए एवं थोड़ा सा जल उसमें गिराते हुए ऊं भूर्भुव: स्व: …….(अभीष्ट देवी/देवता का नाम लेकर) नैवेद्यं निवेदयामि मंत्र पढ़ते हुए शेष जल को थाली में डाल दें। इसके बाद पुन: जल लेकर ऊं आचमनीयम जलं समर्पयामि कहते हुए जल को पात्र में डाल दें। ध्यान रहे कि थाली में डालते समय आपके मन में उसे अभीष्ट देवी/देवता को समर्पित करने का भाव रहे। इसके बाद आरती और अंत में पुष्पांजलि अर्पित करें। जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि यदि कोई सामग्री एकत्र कर पाना संभव न हो तो चिंता की कोई बात नहीं है। आप उस सामग्री की मानसिक भावना कर अभीष्ट देवी/देवता को समर्पित कर सकते हैं। इससे फल पर कोई असर नहीं पडऩे वाला है। जैसे मान लें कि आप अक्षत का प्रबंध नहीं कर पा रहे हैं तो अक्षतम् मनसा परिकल्पय समर्पयामि मंत्र पढ़ कर काम चला सकते हैं।

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