बनें अपने मन का मालिक

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Control your mind

हम हैं सुख-दुख के कारण

यह साबित हो चुका है कि सुख और दुख हमारे मन की भावना है। हम सुख-दुख के किसी भाव या समस्या को कितनी देर तक खुद पर लादे रखते हैं, वही हमारे मूड को तय करता है। जो समझदार लोग हैं, वे अपने मन (मूड) को नियंत्रित रखते हैं और इच्छानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। अधिकतर लोग ऐसा नहीं कर पाते। उनको चंचल मन अपने गुलाम की तरह इधर से उधर भटकाता रहता है। वह जीवन भर दुखी और परेशान रहते हैं। वास्तव में योग, ध्यान, तंत्र-मंत्र आदि क्रियाओं का मकसद मन के इसी भटकाव पर नियंत्रण पाकर उसकी कमान अपने हाथ में लेना है। जब हमारा मन पर नियंत्रण हो जाता है तो आत्मा का परमात्मा से मिलन की राह खुल जाती है। हमें यहीं परमानंद की अनुभूति होने लगती है। यदि मनुष्य समझदारी से काम ले तो बिना अतिरिक्त तामझाम एवं विशेष क्रियाओं के कुछ समय के अभ्यास में ही इस पर नियंत्रण पा सकता है। इस बारे में एक रोचक लघु बोध कथा है।


एक बार एक युवक जंगल में भागा जा रहा है। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और वह बेहद खिन्न नजर आ रहा था। भागते-भागते वह थक गया तो थोड़ी देर के लिए एक घने पेड़ की छाया में सुस्ताने के लिए बैठ गया। संयोग से वहां एक महात्मा भी बैठे हुए थे। उन्होंने युवक के चेहरे पर परेशानी की गहरी छाया देखी तो उसका कारण पूछा। युवक ने बताया कि उसका मन बड़ा खिन्न है। कहीं मन नहीं लग रहा और न उसे चैन मिल रहा है। वह शांति की तलाश में ही भागा जा रहा है। महात्मा ने पूछा कि वह बेचैन क्यों है? उसे क्या परेशानी है? युवक ने कहा कि कहीं मन स्थिर नहीं हो पा रहा है। हमेशा उद्विग्न और अशांत रहता है। वह कई बाबाओं, साधु-महात्माओं से भी मिला लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। चारों ओर भटकने के बाद सोचा की जंगल में जाकर देखूं। इसीलिए भागा जा रहा हूं। अब तक जंगल में भी कहीं चित्त शांत नहीं हो सका है। यह कहकर वह आगे के सफर के लिए उठ खड़ा हुआ।


महात्मा ने कहा- तनिक रुको, शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। उसने पूछा- कैसे? महात्मा ने कहा कि पहले तुम मेरे कुछ सवालों का जवाब दो। उन्होंने पूछा कि तुम्हारी बेचैनी का कारण क्या तुम्हारा घर, परिवार, जगह या रोजगार है? उसने कहा कि इनमें से कोई भी नहीं। मैं तो इन सबसे प्रेम करता रहा हूं। ये सभी मेरे जीवन में बेहद महत्वपूर्ण हैं। महात्मा ने कहा- लेकिन तुम उन्हीं सबसे दूर भाग रहे हो जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह कैसा भटकाव और कैसा निर्णय है? युवक उलझन में पड़ गयया तो उन्होंने उसे समझाया कि वास्तव में तुम्हारी समस्या का असली कारण तुम ही हो। तुम्हारा मन तुम्हें भगा रहा है और तुम उसके गुलाम बनकर भागे जा रहे हो। बैचेन मन है। समस्या और परेशानी भी उसे ही है और तुम शरीर को तथा अपने प्रिय पात्रों को सजा दे रहे हो। ऐसे तो तुम कितना भी और कहीं भी भाग लो, मन को शांति नहीं मिलेगी। क्योंकि उसकी तो प्रकृति ही चंचलता और भटकने की है। उसके पीछे भागोगे तो भटकते ही रह जाओगे। जरूरत मन को पकड़ने, उसे बांधने और नियंत्रित करने की है और यह तुम्हारे ही हाथ में है। मन के पीछे भागो मत, उसे अपनी जरूरत के हिसाब से भगाओ, तभी वह तुम्हारी बात मानेगा और तुम अपने मन के मालिक बन सकोगे। यह सुनकर युवक की आंखें खुल गईं। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और कहा कि आपने सच्चा ज्ञान दे दिया। अब मैं घर जाकर अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से पालन करूंगा और वहीं रहकर मन को वश में करने का प्रयत्न करूंगा। मैं मन का गुलाम नहीं, मालिक बनूंगा। यह कह कर युवक घर लौट गया।


मन की शांति और उस पर नियंत्रण के लिए ये करें—


1- प्रतिदिन कम से कम बीस मिनट एकांत में अपने साथ बिताएं। किसी साफ जगह (घर का कोना या खुला मैदान भी हो सकता है) पर सहज आसान में बैठकर शरीर को शांत छोड़ दें।

2- शरीर को शांत छोड़ना कहने में जितना आसान है, प्रयोग में उतना ही कठिन। लेकिन ध्यान रहे कि आपको खुजली, छींक जैसी समस्या पर सख्ती से पार पाना होगा और शरीर में कोई गतिविधि नहीं करनी होगी।

3- पहले पांच बार गहरी सांस लें और छोड़ें। फिर सांसों के आवागमन पर ध्यान केंद्रीत करें।

4- अब आप मन को खुला छोड़ दें लेकिन खुद को द्रष्टा के रूप में रखें। मन कहां भागता है, न तो उसकी चिंता करें और न उसके पीछे भागें। बस शांत चित्त होकर सिर्फ देखते रहें, उसमें लिप्त न हों।

5- मन को बांधना सबसे कठिन होता है। वह बड़े-बड़े सिद्ध पुरुषों को भी गच्चा दे देता है। अत: पहले उसे भागने दें और आप सिर्फ द्रष्टा बने रहें। भागते-भागते जब मन थोड़ा शिथिल होने लगे तो उसे अपनी इच्छानुसार खास विचार या दिशा में मोड़ने का प्रयास करें। जैसे ही आप ऐसा करेंगे, मन फिर भागने लगेगा। ज्यादा परेशान न हों, उसे अपनी इच्छित दिशा को ओर मोड़ने का प्रयास जारी रखें। देखेंगे कि कुछ ही दिन में आपका शरीर और मन दोनों नियंत्रित होने लगा है।



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