बिसरख में नहीं होता रावण दहन, रामलीला भी नहीं होती

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बिसरख में नहीं होता रावण दहन, रामलीला भी नहीं होती
चबूतरे के रूप वाली इसी जगह को कहते हैं रावण की जन्मस्थली।

Bisrakh is the birth place of Ravan : बिसरख में नहीं होता रावण दहन। रामलीला भी नहीं होती है। इस गांव के लोग रावण को श्रद्धेय मानते हैं। पहले तो दशहरा के दिन शोक में चूल्हा भी नहीं जलता था। गांव के लोग रावण को महान मानते हैं। उसका नाम अपने साथ जोड़कर गौरवान्वित महसूस करते हैं।

यहीं ऋषि विश्रवा के आश्रम में हुआ रावण का जन्म

यह गांव है गौतमबुद्धनगर जिला में नोएडा के पास। इसी गांव में ऋषि विश्रवा का आश्रम था। उन्हीं के नाम पर गांव को नाम विश्रवा पड़ा। उसी का अपभ्रंश रूप बिसरख है। कुबेर, रावण और कुंभकर्ण का जन्म वहीं हुआ। ऋषि विश्रवा ने वहां दूधेश्वर लिंग की स्थापना की थी। वहां आज भी मंदिर है। रावण दूधेश्वर लिंग की घंटों पूजा-अर्चना करता था। वहीं से उसमें शिव की भक्ति जगी। मंदिर का जिक्र तीर्थांक के पृष्ठ संख्या 87 पर भी है। उसमें विश्रवा आश्रम की बात भी है।

दिव्य अनुभूति होती है बिसरख धाम में

यह स्थान एक दिव्य अनुभूति कराता है। मंदिर परिसर भव्य है। प्रवेश करते ही सामने रावण का जन्म स्थान है। उसे चबूतरे के रूप में ऊंचा किया गया है। दायीं ओर दूधेश्वर शिव मंदिर है। वह मनोकामना पूरी करने का भी केंद्र है। बायीं ओर शनि मंदिर है। उसी परिसर में अष्टभूजा पीपल है। उसे भक्त शनि के आठ रूपों का प्रतीक मानते हैं।

रावण जन्मभूमि की मिट्टी राम मंदिर के लिए भेजी

बिसरख धाम के पीठाधीश्वर आचार्य अशोकानंद ने इसमें बदलाव की शुरुआत की। वे कहते हैं कि रावण को राम ने भी महत्व दिया। उसमें विरोध खोजना उचित नहीं है। राम ने रावण को रामेश्वरम में आचार्य बनाया था। लक्ष्मण ने भी उनसे ज्ञान लिया था। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए बिसरख धाम की भी मिट्टी भेजी। अब गांव के लोग भी राम को पूजने लगे हैं।

पहले दशहरा को गांव में चूल्हा नहीं जलता था

कुछ साल पहले तक लोग इस स्थान के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे। इसी गांव के निवासी आचार्य अशोकानंद ने इसके विकास का बीड़ा उठाया। मंदिर की पहचान व मौजूदा स्वरूप उनकी देन है। उन्होंने बताया कि पहले ग्रामीण राम की पूजा भी नहीं करते थे। दशहरा में बिसरख में नहीं होता त्योहार। वह उनके लिए शोक का दिन है। पहले उस दिन गांव में चूल्हा तक नहीं जलता था। रामलीला का मंचन शुरू हुआ तो राम और हनुमान का किरदार निभाने वाले की मौत हो गई। फिर रामलीला भी बंद हो गई।

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