भक्तों के भाव से ही प्रसन्न होते हैं भगवान

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धर्म, पूजा, प्रभु को प्रसन्न करने की हमारी विधि अत्यंत दोषपूर्ण है और हद तो यह कि हम ईश्वर को दोष देते हैं कि उन्हें अब मनुष्य का ध्यान ही नहीं रहता है। ऐसा कैसे हो सकता है? माता-पिता अपनी संतान को कैसे भूल सकता या उपेक्षित छोड़ सकता है? समस्या हममें और हमारी प्रक्रिया में है। हम ईश्वर के साथ भी छल करने एवं धंधा करने की कोशिश करते हैं और फिर उन्हें ही दोष भी देते हैं। आइए इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं।


एक बार एक अजनबी किसी के घर गया। वह अंदर गया और मेहमान कक्ष में बैठ गया। वह खाली हाथ आया था तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा। यह सोच उसने वहीं टंगी एक पेंटिंग उतारी और जब घर का मालिक आया तो उसे पेंटिंग देते हुए कहा, यह आपके लिए है।


घर का मालिक, जिसे पता था कि यह मेरी चीज मुझे ही भेंट दे रहा है, अतिथि की हरकत से सन्न रह गया। अब आप ही बताएं कि क्या वह भेंट पाकर, जो कि पहले से ही उसका है, उस आदमी को खुश होना चाहिए? मेरे और आपमें से अधिकतर के ख्याल से नहीं।


कभी आपने विचार किया कि यही चीज हम भगवान के साथ भी करते हैं। हम उन्हें रुपये, पैसे, सोना, चांदी आदि चढ़ाते हैं, जबकि हर चीज तो उनकी ही बनाई और हमें दी हुई है। हद यह कि हम उन्हीं की चीज उन्हें भेंट करते हैं और मन में भाव रखते है की ये चीज मैं भगवान को दे रहा हूँ। इसके साथ ही हम यह सोचते हैं कि ईश्वर इस चढ़ावे से खुश हो जाएंगे। कितने नासमझ और भ्रम में रहते हैं हम। हम यह नहीं समझते कि ईश्वर को इन सब चीजों कि जरूरत ही नहीं है।


अगर आप सच में उन्हें कुछ देना चाहते हैं तो अपनी श्रद्धा दीजिए, भाव और प्रेम दीजिए। उन्हें अपनी हर एक सांस में याद कीजिये और विश्वास मानिए प्रभु जरुर खुश होंगे।
सच यह है कि संसार की हर वस्तु ईश्वर ने हमें दी है। हमारे पास अपनी चीज सिर्फ हमारा अहंकार है, जो उन्होंने नहीं दिया है। उसी अहंकार को मनुष्य उन्हें अर्पण कर दें तो जीवन सफल हो जाएगा। फिर हम खुद की नहीं, भगवान हमारी चिंता करेंगे। दुर्भाग्य से भाव के भूखे भगवान के साथ उनके भक्त व्यापार करने लगते हैं। भगवान ये मनोरथ पूरे कर दें तो ये चढ़ावा चढ़ाऊंगा। वो पूरे कर दें तो वो चढ़ाऊंगा। कैसा भद्दा मजाक है कि उन्हीं की वस्तु लेकर उन्हीं से व्यापार करते हैं। जबकि वे तो भक्त की सिर्फ एक भावपूर्ण पुकार सुनकर सब कुछ छोड़कर भक्त के पास भागे चले आते हैं।



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