दूसरी महाविद्या तारा के प्रतिदिन स्मरणीय उपयोगी मंत्र (दस महाविद्या)

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दूसरी महाविद्या तारा को मूल रूप से ज्ञान की देवी माना जाता है। इसलिए इनका एक नाम नील सरस्वती भी है। मान्यता है कि इनकी साधना करने वाले को रोजगार भी ज्ञान के क्षेत्र में ही मिलता है। मैं इससे पूरी तरह से सहमत नहीं हूं। यह सही है कि तारा की उपासना मात्र से भक्तों में ज्ञान, तर्क शक्ति आदि की बढ़ोतरी होती है लेकिन उन्हें सिर्फ इसमें समेट देना बहुत बड़ी भूल है। दूसरी महाविद्या होने के कारण तारा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। वह अपने भक्तों को दुनिया के सारे जंजाल से तार (मुक्त) देती हैं। उनकी साधना इंसान को सब कुछ देने में सक्षम है। एक बड़े वर्ग की मान्यता है कि तारा का ज्ञान महर्षि वशिष्ठ ने महात्मा बुद्ध से चीन में सीखी थी लेकिन मैं इससे भी सहमत नहीं हूं। दोनों के कालखंड को देखें तो उसमें युग का अंतर है। बौध विद्वान, साधक एवं दलाईलामा के निकट सहयोगी साम दोंग रिंपोछे (निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री भी रहे) से इस विषय पर मेरी विस्तार से बात हुई। उन्होंने बताया कि चूंकि तारा की सर्वाधिक उपासना बौद्ध करते हैं और इस बारे में उनके पास काफी ज्ञान है, संभवत: इसी कारण ऐसा भ्रम फैला होगा।


मंत्र पर भी विवाद

तारा के आठ स्वरूप माने जाते हैं लेकिन प्रचलित तीन स्वरूप उग्रतारा, नील सरस्वती और एकजटा हैं। माता के बारे में अन्य विवादों के साथ ही एक प्रमुख विवाद मंत्र को लेकर भी है। इनका एकाक्षरी मंत्र त्रीं कहा गया है। विद्वानों के अनुसार साधना क्रम में लगातार असफलता से खिन्न महर्षि वशिष्ट ने उन्हें शाप दे दिया था। शांत होने पर माता ने उन्हें त्रीं के साथ सकार लगाकर जप करने के लिए कहा और इससे महर्षि को सफलता भी मिल गई। कालांतर में कृष्णावतार में शाप का प्रभाव खत्म हो गया। स्त्रीं को वधू बीज (शीघ्र फल देने वाली) कहा गया है। इसके बावजूद विद्वानों ने त्रीं का प्रयोग जारी रखा है और कई मंत्रों में उसका उपयोग है। वह कितना प्रभावी और सफल है, इस पर चर्चा हो सकती है लेकिन मेरे विचार से सामान्य साधकों को इस विवाद में पड़ने के बदले स्त्रीं का ही जप करना चाहिए। इस मंत्र की उपयोगिता और प्रभाव पर किसी को शक नहीं और न कोई विवाद है। मेरा अनुभव है कि यह मंत्र अत्यंत कल्याणकारी है। भौतिक सुख के साथ ही यह साधक की चेतना को जगाकर ऊपर ले जाती है।


ध्यान

प्रत्यालीढपदां घोरां मुंडमालाविभूषिताम्, खर्वा लंबोदरींभीमां व्याघ्रचर्म्मावृत्तां कटौ।

नवयौवनसंपन्नां पंचमुद्रा विभूषिताम्, चतुर्भुजां लोलजिह्वां महाभीमां वरप्रदम्।।

खंगकर्तृसमायुक्तसव्येतरभुजद्वयाम्, कपोलोत्पलसंयुक्तसव्यपाणियुगान्विताम्।

पिंगाग्रैकजटांध्यायेन्मौलावक्षोभ्यभूषिताम्, बलार्कमंडलाकारलोचनत्रय भूषिताम्।।

ज्वलच्चितामध्यगतां घोरदंष्ट्राकरालिनीम्, स्वादेशस्मेरवदनां ह्यलंकारविभूषिताम्।

विश्वव्यापकतोयान्त: श्वेतपद्मोपरिं स्थिताम्।।


षोढान्यास

तारा की साधना में षोढान्यास का विशेष महत्व है। ये न्यास हैं- रूद्रन्यास, ग्रहन्यास, लोकपालन्यास, शिवशक्तिन्यास, तारादिन्यास और पीठन्यास। हालांकि मेरे विचार से विशेष साधना क्रम में ही इसकी आवश्यकता है। सामान्य साधक सिर्फ ध्यान से काम चला सकते हैं।


उग्रतारा (तारा) मंत्र प्रयोग

मंत्र– एकाक्षर मंत्र ऊपर दिया जा चुका है। माता तारा की साधना करने वाले को पहले उस मंत्र का कम से कम 25 लाख जप कर लेना चाहिए। इसके बाद ही यह मंत्र प्रभावी और कल्याणकारी होता है। बाद में इच्छित कामना से पूर्व और बाद में मंत्र मिलाकर जप करने से लक्ष्य की प्राप्ति होती है।


त्र्यक्षर मंत्र– हूं स्त्रीं हूं

चतुरक्षर मंत्र– ह्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं

पंचाक्षर मंत्र– ऊं ह्रीं स्त्रीं हुं फट

विनियोग– अस्य श्री तारामंत्रस्य अक्षोभ्य ऋषि:, वृहती छंद:, तारा देवता, ह्रीं बीजं, हूं शक्ति:, स्त्रीं कीलकं, आत्मनोभीष्टसिद्धये जपे विनियोग:।

ऋष्यादिन्यास– ऊं अक्षोभ्य ऋषिये नम: शिरसि, वृहतीछंदसे नम: मुखे, तारादेवताये नम: हृदि, ऊं ह्रीं (हूं) बीजाय नम: गुह्ये, ऊं हूं (फट्) शक्तिये नम: पादयो:, ऊं स्त्रीं कीलकं नाभौ, विनियोगाय नम: सर्वांगे।

षडंगान्यास– ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रीं, ह्र: से क्रमश: हृदयादि व करन्यास करना चाहिए।

एकजटा के लिए षडंगन्यास– ऊं ह्रीं त्रां ह्रां एक जटायै हृदयाय नम:। हृं त्रीं ह्रीं तारिण्यै शिरसे स्वाहा। हूं त्रूं हूं वज्रोदकायै शिखायै वषट्। ह्रैं त्रैं ह्रैं उग्रतारायै कवचाय हुं। ह्रौं त्रौं ह्रौं महापरिवासरायै नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्र: त्र: ह्र: पिंगोग्रैकजटायै अस्त्राय फट्। इसी तरह करन्यास करें।


ध्यान

प्रत्यालीढ पदार्पितांघ्रि शवहृत् घोराट्टहासांपराम्, खडगेंदीवर कर्तृ खर्पर भुजां हूंकार बीजोद्धभवाम्।

खर्वां नीलविशाल पिंगलजटाजूटैक नागैर्युताम्, जाड्यंन्यस्य कपालके त्रिजतां हंत्युग्रतारा स्वयम्।।


पुरश्चरण– चार लाख मंत्र का जप कर दूध व घी मिश्रित लाल कमलों से दशांश हवन करें। निर्जन स्थान, शून्य घर (यह संभव न हो तो रात्रि में खाली कमरा), देव मंदिर (तारा का हो तो बेहतर है), वन, पर्वत आदि में जप विशेष फलदायी होता है।


पुरश्चरण का फल

  • इसका पुरश्चरण करने वाले पर लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा रहती है।

  • बच्चे के जन्म लेते ही उसकी जीभ पर शहद एवं घी से स्वर्ण शलाका या श्वेतदूर्वा की सींख से मंत्र लिखने पर बालक आगे चलकर महान विद्वान बनता है। उसे शत्रु कभी परास्त नहीं कर पाएंगे।

  • गोरोचन को मंत्र से सौ बार अभिमंत्रित कर तिलक लगाने से लोगों का वशीकरण होता है। कोई महत्वपूर्ण काम के लिए जाते समय इसका तिलक अत्यंत लाभकारी होता है।



 

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