ऐसे मनाएं विजया दशमी, इस तरह करें विसर्जन

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ऐसे मनाएं विजया दशमी, इस तरह करें विसर्जन
विजया दशमी या दशहरा के कई अर्थ हैं। जाने इसके बारे में।

know vijayadashmi or dashahara : ऐसे मनाएं विजया दशमी? कैसे करें विसर्जन? यह महत्वपूर्ण सवाल है। लोग विजया दशमी को नवरात्रि का सिर्फ समापन मानते हैं। राम की जीत के रूप में रावण का पुतला दहन करते हैं। यह काफी हद तक सही है। रामलीला के जिक्र के बिना नवरात्रि पूरी नहीं हो सकती है। बुराई के प्रतीक रावण, कुंभकर्म और मेघनाद के पुतले जलाने को भी कम नहीं आंका जा सकता है। इसे दशहरा भी कहा जाता है। इन सबमें गहरा संदेश है। इससे अलग इसका एक और महत्व है। यह माता की कैलाश वापसी का दिन है। इसलिए बंगाल व आसपास में इसे जात्रा भी कहते हैं। साधकों के लिए भी इस दिन का बहुत महत्व है। वे साधना के समापन के बाद माता का विसर्जन करते हैं। इस पर उनकी सफलता निर्भर करती है। इसके साथ ही इस दिन कुछ और काम करने चाहिए, उनकी जानकारी नीचे दे रहा हूं।

ऐसे करें विसर्जन

भक्त नियमपूर्वक विसर्जन करें। दशमी को पहले सामान्य पूजन करें। फिर मूर्ति/कलश विसर्जन की प्रक्रिया शुरू करें। विसर्जन के समय पहले माता को उपहार दें। इस दौरान निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

ऊं कालि कालि महाकालि कालिके पापनाशनि काली कराल निष्क्रांते। कालिके त्वां नमोस्तुते। सिंहवाहिनी चामुंडे पिनाक धनुवल्लभे! उपहारं गृहीत्वैवं प्रसीद परमेश्वरि।

कलश विसर्जन के दौरान मानें कि घट में देवी का मूल तत्व विराजमान है। घट के पास जाकर गहरी सांस खींचें। भावना करें कि सांस के साथ ही देवी घट से निकलकर हृदय में आकर बैठ गई हैं। इसके बाद कलश को उठाकर प्रार्थना करें। इस दौरान निम्न मंत्र पढ़ें।
उत्तिष्ठ देवी चंडेशि शुभां पूजां प्रगृह्य च। कुरुष्व मम कल्याणमष्टभि शक्तिभि: सह।
दुर्गे  देवि  जगन्मात:  स्थानं  गच्छ  पूजिते। संवत्सर  व्यतीते  तु पुनरागमनाय वै।
इमां पूजां मयादेवि यथा शक्त्युपपादितम्। रक्षार्थं त्वं समादाय व्रज स्वस्थानमुत्तमम्।
 

प्रक्रिति के संतुलन का रखें ध्यान

विसर्जन के बाद प्रतिमा हो तो उसे साफ वाहन में रखकर नगर परिक्रमा कराएं। फिर नदी या सरोवर के पास ले जाएं। वहां प्रतिमा को उतारें। पहले उन्हें जल में स्थापित किया जाता था। ध्यान रहे कि प्रतिमा के वस्त्र न उतारे जाएं। मौजूदा स्थिति में पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए। माता प्रकृति रूपा ही हैं। प्रकृति का ध्यान रखने से वे प्रसन्न ही होंगी। प्रतिमा की विदाई के समय उसकी ओर न देखें। यही बात कलश विसर्जन में भी लागू है। प्रतिमा/घट की विदाई के समय उनकी प्रार्थना करें। ऐसे मनाएं विजया दशमी। मंत्र नीचे है।
गच्छगच्छ परं स्थानं स्वस्थानं देविचंडिके।
व्रज स्रोतोजलं वृद्धयै स्थीयतां च जले त्विह।
 
बाद में आचार्य को दक्षिणा देकर वापस लौटें।
 

नए काम के लिए विजय मुहुर्त शुभ

नया काम विजय मुहुर्त में शुरू करें। निश्चय ही सफलता मिलेगी। तारा उदय का समय विजय काल माना जाता है। इस मुहुर्त में जो भी काम शुरू करें, सफल होंगे। भगवान राम ने भी इसी काल में रावण वध के लिए लंका पर चढ़ाई की थी। कार्य की सफलता के लिए पूजन का भी विधान है। पूजन के बाद नए कार्य शुरू करना अच्छा होता है। ऐसा करना हो तो ध्यान रखें। विजय योग में पहले शमी वृक्ष के पास जाएं। वहां भूमि को साफ करें। फिर श्वेत वस्त्र पर चावलों से अष्टदल बनाएं। उस पर कुंभ स्थापित करें। फिर दूध व जल की धारा देकर आचार्य से पूजन कराएं। उनका अभिषेक करें। उन्हें यथायोग्य दक्षिणा दें। उनसे आशीर्वाद लेकर काम शुरू करें।

अपराह्न में खंजन दर्शन का महत्व

विजया दशमी के दिन खंजन दर्शन का महत्व है। उस दिन ऐसे मनाएं विजया दशमी। अपराह्न में लोग खंजन एवं नीलकंठ के दर्शन करते हैं। उसका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता है। हालांकि दर्शन के समय को लेकर सावधान रहें। समय के थोड़े से अंतर से शुभ के बदले कुछ अशुभ फल होता है। खंजन का दर्शन होने पर उसे प्रणाम करें। फिर निम्न मंत्र से प्रार्थना करें।
 
वासुदेव  स्वरूपेण  सर्वकामफलप्रद। पृथिव्यामवतीर्णोसि खंजजरीट नमोस्तुते।
खंजनाय नमस्तुभ्यं सर्वाभीष्ट प्रदाय च। नीलकंठाय भद्राय भद्ररूपाय ते नम:।
भद्र त्वं  देहि मे  भद्रमाशां पूरय पूरक। स्वस्तिकोसि कुरु खंजरीट नमोस्तुते।
नारायण स्वरूपाथ  संवत्सर  सुखप्रद। नीलकंठ  महादेव  खंजरीट नमोस्तुते।
देवदानव यक्षाणां नराणां पुष्टिवर्धनम्। दर्शनं तव भद्रस्य विष्णुरूप नमोस्तुते।
 

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