विज्ञान जैसे ही प्रभावी हैं मंत्र (दूसरी कड़ी)

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Mantras are as useful as science

इस कड़ी में मैं मंत्रों के प्रभाव, उपयोग और करने वालों की पात्रता के बारे में चर्चा करूंगा। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि हर तरह के मंत्र सभी के लिए उपयुक्त नहीं होते। जैसे शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति चाहे कितना भी प्रतिभाशाली हो, हर विषय में समान प्रदर्शन नहीं कर पाता है। किसी की रूचि गणित में ज्यादा होती है तो कोई हिंदी या अंग्रेजी में बेहतर नंबर लाता है तो किसी को अर्थशास्त्र में रस मिलता है और उसकी रूचि, विषय को समझने की क्षमता और याद रख पाने में कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। हमारे ऋषि-मुनि भी इसे जानते थे, इसी कारण उन्होंने मंत्रों की रचना में भी इसका पूरा ध्यान रखा है। इसीलिए उन्होंने मंत्रों के विभिन्न मार्ग बनाए। वैदिक मंत्र, तांत्रिक मंत्र एवं शाबर मंत्र। इनकी जप व प्रयोग विधि तथा पात्रता भी अलग-अलग है। लोग अपनी रूचि, क्षमता आदि के हिसाब से इनमें से किसी एक या अधिक का चयन करते हैं। इसे एक उदाहरण से थोड़ा और स्पष्ट करते हैं- एक मत के विचारकों के अनुसार ऊं का उच्चारण महिलाओं को नहीं करना चाहिए। इसके बदले उन्हें नमः का उच्चारण करना चाहिए। इसका कारण यह बताया गया है कि महिलाओं की शारीरिक संरचना ऊं के जप से होने वाली ऊर्जा को ठीक तरह से झेल सकने लायक नहीं होती है। इसकी तुलना में नमः का असर भले थोड़ा कम हो लेकिन वह सौम्य और कल्याणकारी मंत्र है। महिलाएं इनका लंबा उपयोग कर वहीं पहुंच सकती है, जहां पुरुष ऊं का जप कर पहुंच सकते हैं।


अपनी क्षमता के अनुसार ही करें जप

कोई मंत्र अधिक प्रभावशाली है, यह सोचकर ही उसका जप उतना फायदा नहीं पहुंचाता जितना व्यक्ति विशेष के लिए उपयोगी मंत्र पहुंचाता है। क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि किसी भी मंत्र का निरंतर जप शरीर में जबर्दस्त ऊर्जा का संचार करता है, जिससे कई बार दैनिक दिनचर्या, यहां तक की नींद पर भी असर पड़ता है। इसीलिए हर व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार ही मंत्रों का जप करना चाहिए। जैसे हर तरह का व्यायाम सभी लोग नहीं कर सकते, इसी तरह मंत्रों को भी समझना चाहिए। व्यायाम की तरह ही मंत्रों की मात्रा और उच्चारण का ध्यान रखना भी आवश्यक है। हालांकि मंत्र का अधिक संख्या में जप करने वाले साधकों के लिए कुछ उपाय भी हैं, जिसकी जानकारी मैं अगले लेखों में दूंगी। पुनः मूल विषय पर आते हुए ऊं का उदाहरण लें। यह मंत्र आ ऊ म से बना है, जिसका उच्चारण क्रमशः नाभि स्थान, हृदय और मस्तिष्क को झंकृत करता है। नाभि कमल पर ब्रह्मा, अर्थात निर्माणकर्ता का वास कहा गया है। इसी तरह से पेट नव निर्माण से लेकर शरीर की जरूरत को पूरा करने वाली ऊर्जा (भोजन-पानी के माध्यम से) का भी निर्माण करता है। हृदय का स्थान विष्णु अर्थात पालनकर्ता का स्थान है। हृदय उसी अनुरूप शरीर के लिए शुद्ध रक्त एवं सांस की आपूर्ति करता है। मस्तिष्क को तीसरे नेत्र अर्थात संहारकर्ता का स्थान माना गया है, जो हमारी वासनाओं का नाश कर हमें उच्च पद की ओर ले जाने में सक्षम है। अतः ऊं को उच्चारण में तीनों अक्षर का सधा प्रयोग ही कल्याणकारी माना गया है। इस का जप करते समय कई बार अंजान लोग म पर ज्यादा जोर देते हैं, क्योंकि उन्हें तत्काल शरीर में ऊर्जा की अनुभूति होती है, यह अनुचित है।


मंत्रों के प्रयोग का खुद अनुभव करें

जानकार लोगों एवं साधकों के पास अपार क्षमता होती है और वह लोगों को देखकर ही समझ जाते हैं कि किस व्यक्ति के लिए किस मंत्र का और कितना जप कल्याणकारी है। समस्या यह है कि ऐसे सच्चे साधक और जानकार आमतौर पर लोगों के सामने आने से परहेज करते हैं, जो आसानी से मिलते हैं, उनमें अधिकतर धंधेबाज हैं। ऐसे में इस राह के राही के लिए बड़ी समस्या होती है कि वह आगे कैसे बढ़ें। वास्तव में यह उतनी गंभीर समस्या नहीं है। आप खुद भी मंत्रों के बारे में अपनी क्षमता, रूचि और उपयोगिता का अंदाजा लगा सकते हैं। मैंने इसे कई लोगों पर किए अनुभव के आधार पर साझा कर रहा हूं। अलग-अलग मंत्रों का आप खुद कुछ-कुछ जप कर अनुभव कर सकते हैं कि किस मंत्र का जप आसानी से ज्यादा कर पाते हैं। इसके साथ ही किस मंत्र से आपको ज्यादा शांति मिलती है। मैंने देखा है कि कुछ लोग वैदिक मंत्रों का जप पसंद करते हैं और ज्यादा अच्छी तरह से कर पाते हैं तो कुछ लोगों की तांत्रिक मंत्रों में जबर्दस्त पकड़ होती है। कई लोग साबर के कुछ मंत्र का जप कर ही उतनी क्षमता अर्जित कर लेतें हैं जो वैदिक मंत्रों व तांत्रिक मंत्रों का जप करने वालों के लिए कठिन है।


शुद्धता का रखें ध्यान

मंत्रों का उपयोग शुरू करने से पूर्व उसकी और उच्चारण की शुद्धता को अवश्य परख लें। इसके लिए प्रतिष्ठित प्रकाशनों की पुस्तक का ही प्रयोग करें। इसके साथ ही आसपास के कम से कम दो पंडितों को भी मंत्र दिखा और सुनाकर आश्वस्त हो जाएं। उसके बाद ही उसका प्रायोगिक जप प्रारंभ करें। शुरू में संख्या का संकल्प न लें। कुछ-कुछ दिन के अंतराल पर मंत्रों का प्रभाव महसूस करें। ज्यादा अच्छा न लगे तो दूसरा मंत्र शुरू करें। इस मामले में अंतरात्मा की आवाज सबसे अच्छी होती है। एक बार मंत्रों के प्रति आश्वस्त होने के बाद प्रारंभ में छोटी-छोटी संख्या का संकल्प लेकर सामान्य तरीके से जप प्रारंभ करें। ध्यान रहे कि संकल्प वाले मंत्रों के साथ भले कम संख्या में हो, उस मंत्र से हवन अवश्य होना चाहिए। दरअसल मंत्र को यदि शरीर मानें तो हवन उसकी आत्मा है। बिना हवन के मंत्रों का चाहे कितना भी जप हो पूरा प्रभाव नहीं दे सकेगा।



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