सामाजिक समरसता का संदेश देती है मनुस्मृति

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मनुस्मृति सामाजिक समरसता का संदेश देने तथा भारतीय सभ्यता-संस्कृति की व्याख्या करने वाला महान ग्रंथ है। दुर्भाग्य से अंग्रेजों ने देश में फूट डालो राज करो की नीति पर चलते हुए इसकी मूल कृति के साथ जबर्दस्त छेड़छाड़ कर अर्थ का अनर्थ कर दिया है। जेएनयू में कुछ लोगों द्वारा जिस मनुस्मृति को दलित व समतामूलक समाज का विरोधी करार देते हुए जलाया गया, वास्तव में उसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन इस घटना से मनुस्मृति और उसकी प्रासंगिकता पर नई बहस शुरू करने का मौका दे दिया है। इसके साथ ही इसकी आवश्यकता भी महसूस करा दी है कि हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को पहचानें। मेरा अब तक का ज्ञान और अनुभव इसे मानने को तैयार नहीं है कि मनुस्मृति समाज के किसी भी वर्ग की विरोधी हो सकती है। वास्तव में भारतीय संस्कृति की यही खूबी है कि इसने न सिर्फ सबको (यहां तक की परस्पर विरोधी धारा को भी) अपने में समाहित कर लिया, बल्कि इस तरह से आत्मसात कर लिया मानो वह कभी अलग थी ही नहीं। यही कारण है कि यह देश विविधता में एकता का संदेश देने वाला विश्व का सर्वश्रेष्ठ देश बना हुआ है। जिसमें इंद्रधनुष की तरह सारे रंग एक साथ चमकते हैं। मेरा प्रचंड विश्वास है कि जिसे मनुस्मृति कहकर आलोचना की जा रही है, वह फर्जी है।


भारतीय सभ्यता-संस्कृति का अध्ययन करें तो साफ हो जाता है कि जितने भी प्राचीन ऋषि, संत, महात्मा व मूल भारतीय धर्म ग्रंथ हैं, सभी मनुष्यों को प्रेम, भाईचारा, सहअस्तित्व और एकजुटता का संदेश देने वाले हैं लेकिन दुर्भाग्य से बाद के दिनों में कथित धर्मगुरुओं ने अपनी-अपनी दुकान चलाने के लिए धर्म की मनमानी व्याख्या कर दी और प्रेम, भाईचारा, सहअस्तित्व और एकजुटता के बदले धर्म की अलग-अलग दुकान खोलने का तरीका निकाल लिया। परिणामस्वरूप भारतीय सभ्यता-संस्कृति का विकृत औव विद्रूप चेहरा ही लोगों के सामने आया और उन्होंने उसे ही सही समझा। आज ब्राह्मणों को शोषक व समतामुलक समाज का सबसे बड़ा विरोधी करार देकर विलेन की तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाद के युगों में कुछ कथित धर्मगुरुओं ने ऐसा किया भी लेकिन वैदिक व पौराणिक काल में यह स्थिति कभी नहीं रही। ब्रह्मदंड रखने वाले ब्रह्मर्षि वशिष्ट का आश्रम घने जंगल में था, जहां वे भौतिक सुख-सुविधा के लिहाज से एवं आर्थिक रूप से अत्यंत सामान्य जीवन जीते थे। ताकत इतनी कि विश्वमित्र बड़े व ताकतवर राजा होने के बावजूद उनका मुकाबला नहीं कर पाए और बाद में उन्हें टक्कर देने के लिए उन्हें राजपाट छोड़कर ऋषि ही बनना पड़ा लेकिन इतनी ताकत होने के बावजूद वशिष्ट के मन में कभी सत्ता व सुख-सुविधा को पाने की इच्छा नहीं जागी। विश्वामित्र ने भी क्षत्रिय होने के बावजूद राजपाट छोड़कर न सिर्फ जंगल में सामान्य जीवन जीना स्वीकार कर लिया बल्कि क्षत्रिय जाति छोड़कर ब्राह्मणों की जमात में सामिल हो गए। परशुराम इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय (राजा) विहीन कर दिया लेकिन खुद उनमें कभी राजा बनने की लालसा नहीं जगी।


दरअसल उस दौर में ब्राह्मण जन्म से ही बनने वाली कोई जाति नहीं थी। वह ऐसे लोगों का समूह था जो देश व समाज को मजबूत करने के लिए अध्ययन-अध्यापन व शोध में लगा रहता था। उस दौर में जाति का निर्धारण जन्म से नहीं बल्कि कर्म से होता था। इसलिए विश्वामित्र ही नहीं, दलित समाज में जन्म लेकर वाल्मीकि भी महान ऋषि बन सके। महान ऋषि व्यास की माता ब्राह्मण नहीं बल्कि केवट कन्या थीं। ऐतरेय ऋषि दासी पुत्र थे। वज्रसूच्यपनिषद में ऋषि अपने शिष्य को ब्राह्मण कौन का जवाब देते हुए कहते हैं- यदि जाति से ब्राह्मण होता तो दूसरी जाति में उत्पन्न बहुत से लोग महर्षि कैसे हो जाते?


ऐसे में मनुस्मृति पर समाज को तोड़ने का आरोप लगाना सरासर गलत होगा। आइए जरा मनुस्मृति के बारे में उन तथ्यों का अवलोकन करें जिनकी जानकारी कम लोगों को है। इसके साथ ही इस तथ्य को भी स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा कि किस तरह मनुस्मृति से छेड़छाड़ कर उसकी मौलिकता नष्ट कर दी गई है। इसके लिए हमें मनुस्मृति के बारे में मूल तथ्यों का अवलोकन करना होगा। सबसे पहले तो इसे लिखे जाने के समय को जानना होगा। पहली बात तो मनुस्मृति के नाम से ही स्पष्ट होता कि इसे मनु ने लिखा था। वैसे तो कई मनु हुए हैं लेकिन अंतिम मनु का कालखंड त्रेता से पूर्व अर्थात कम से कम दस हजार साल पहले का था। क्योंकि उनकी उत्पत्ति (त्रेतायुग राम से हजारों साल पहले) सतयुग में हुई थी। उसमें जिस तरह के मंत्रों की भरमार है, उसकी भाषा ही इतनी पुरानी नहीं लगती है। अब आइए कुछ तथ्यों पर नजर डालें।


सन् 1932 में जापान के एक बम विस्फोट द्वारा चीन की ऐतिहासिक दीवार का एक हिस्सा टूट गया था। टूटे हुए इस हिस्से से लोहे का एक ट्रंक मिला जिसमें चीनी भाषा में एक प्राचीन पांडुलिपियां भरी हुई थीं। विदेशी प्रमाणों में मनुस्मृति के काल तथा श्लोकों की संख्या की जानकारी कराने वाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण चीन में मिला है। सन् 1932 में जापान ने बम विस्फोट द्वारा चीन की ऐतिहासिक दीवार को तोड़ा तो उसमें से एक लोहे का ट्रंक मिला जिसमें चीनी भाषा की प्राचीन पांडुलिपियां भरी थीं। ये पांडुलिपियां सर आगस्टस रिट्ज जॉर्ज के हाथ लग गईं और उन्होंने इसे ब्रिटिश म्यूजियम में रखवा दिया था। उन पांडुलिपियों को प्रोफेसर एंथोनी ग्रेम ने चीनी विद्वानों से पढ़वाया तो पता चला कि चीन के राजा ‍शी लेज वांग ने अपने शासनकाल में यह आज्ञा दी कि सभी प्राचीन पुस्तकों को नष्ट कर दिया जाए। इस आज्ञा का मतलब था कि कि चीनी सभ्यता के सभी प्राचीन प्रमाण नष्ट हो जाएं। तब किसी विद्याप्रेमी ने पुस्तकों को ट्रंक में छिपाया और दीवार बनते समय चुनवा दिया। संयोग से ट्रंक विस्फोट से निकल आया।


चीनी भाषा के उन हस्तलेखों में से एक में लिखा है ‍कि मनु का धर्मशास्त्र भारत में सर्वाधिक मान्य है, जो वैदिक संस्कृत में लिखा है और 10,000 वर्ष से अधिक पुराना है तथा इसमें मनु के श्लोकों की संख्या 630 भी बताई गई है। किंतु वर्तमान में मनु स्मृति में 2400 के आसपास श्लोक हैं। इस दीवार के बनने का समय लगभग 220 से 206 ईसा पूर्व का है अर्थात लिखने वाले ने कम से कम 220 ईसा पूर्व ही मनु के बारे में अपने हस्तलेख में लिखा। 220+10,000= 10,220 ईसा पूर्व मनुस्मृति लिखी गई होगी अर्थात आज से 12,234 वर्ष पूर्व मनुस्मृति उपलब्ध थी। किसने रची मनु स्मृति : धर्मशास्त्रीय ग्रंथकारों के अतिरिक्त शंकराचार्य, शबरस्वामी जैसे दार्शनिक भी प्रमाणरूपेण इस ग्रंथ को उद्धृत करते हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि परंपरानुसार यह स्मृति स्वायंभुव मनु द्वारा रचित है, वैवस्वत मनु या प्राचनेस मनु द्वारा नहीं। महाभारत ने स्वायंभुव मनु एवं प्राचेतस मनु में अंतर बताया है, जिनमें प्रथम धर्मशास्त्रकार एवं दूसरे अर्थशास्त्रकार कहे गये हैं। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार राजा वैवस्वत मनु का जन्म 6382 विक्रम संवत पूर्व वैशाख कृष्ण पक्ष 1 को हुआ था अर्थात ईसा पूर्व 6324 को हुआ था। इसका मतलब कि आज से 8,340 वर्ष पूर्व राजा मनु का जन्म हुआ था।


वैवस्वत, मनु को श्राद्धदेव भी कहते हैं। इन्हीं के काल में विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इनके पूर्व 6 और मनु हो गए हैं। स्वायंभुव मनु प्रथम मनु हैं, तो क्या प्रथम मनु के काल में मनुस्मृति लिखी गई? स्वायंभुव मनु 9057 ईसा हुए थे। ये भगवान ब्रह्मा की दो पीढ़ी बाद हुए थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उनका काल 9000 से 8762 विक्रम संवत पूर्व के बीच का था अर्थात 8942 ईसा पूर्व उनका जन्म हुआ था। इसका मतलब आज से 10,956 वर्ष पूर्व प्रथम राजा स्वायंभुव मनु थे। तो कम से कम आज से 10,000 वर्ष पुरानी है हमारी ‘मनुस्मृति’। सच तो यह है कि सारे मनुष्य मनु की ही संतान थे। ऐसे में उनसे किसी भेदभाव की उम्मीद करना भयानक भूल होगी। आवश्यकता इस बात की है कि इस विवाद को हवा देने के बदले मूल मनुस्मृति की तलाश की कोशिश की जाए। यदि विद्वान अलग-अलग कालखंडों की भाषा पर शोध करें तो मनुस्मृति के मूल 630 श्लोकों को निकालना बहुत कठिन नहीं होगा। यदि ऐसा हो सका तो अपनी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति के साथ ही देश, समाज और मानवता के लिए भी यह बड़ा कार्य साबित होगा।


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