प्रकृति की शक्ति और उसके दोहन के तरीके (भाग-3)

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Power of nature and the different ways of its exploitation

सकारात्मकता से ही मिलती है सफलता

लोग चाहे सफल हों या असफल, अधिकतर खुद नहीं समझ पाते कि उनके जीवन में सफलता या असफलता का कारण क्या है? यदि आप उनके जीवन का बारीकी से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि सफल लोगों के विचार सकारात्मकता से भरपूर होते हैं। उनके जीवन में उमंग और उत्साह रहता है और वे अपने जीवन तथा सफलता के क्षेत्र से भरपूर प्रेम करते हैं। असफल लोग इसके विपरीत, अर्थात नकारात्मक विचारों के होते हैं। उनके जीवन और विचारों में चिड़चिड़ापन, क्रोध, घृणा, जलन और दुख ही नजर आते हैं। सभी महान एवं सफल लोग प्रेम और सकारात्मकता की शक्ति का जाने-अनजाने दोहन (उपयोग) करते हैं। यह अलग बात है कि उनमें से अधिकतर लोग इस सिद्धांत से परिचित नहीं होते। वह उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है और वह उसे सामान्य प्रक्रिया के रूप में करते हैं और सफल होते हैं।


टेलीफोन के आविष्कार अलेक्जेंडर ग्राहम बेल के अनुसार- मैं नहीं जानता कि वह कौन सी शक्ति है, मैं तो केवल इतना जानता हूं कि यह है। सच्चाई यह है कि प्रेम और सकारात्मकता ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति है।


इतिहास और पुराण गवाह हैं कि घृणा, हिंसा और नकारात्मकता चाहे कितनी भयानक हो, उनकी हार होती है। बीतते समय के साथ-साथ क्रूरता और नकारात्मक शक्ति को लोग भूलते जाते हैं। दूसरी ओर प्रेम और सकारात्मकता की जीत होती है और उसे लंबे समय तक याद रखा जाता है। द्वारकाधीश कृष्ण भले विष्णु के अवतार रहे हों और महाभारत के युद्ध को जीतने का पूरा सूत्र रचा हो लेकिन लोग उनके उस रूप की पूजा न के बराबर करते हैं। अधिकतर मंदिरों में प्रेममयी राधा और उनके प्रेम रस से सराबोर कान्हा की ही मूर्ति है और लोग उन्हीं की पूजा करते हैं। कृष्ण की प्रेम दिवानी मीरा की याद किसी को दिलाने की जरूरत नहीं है। कृष्ण की लीला समाप्त होने के सदियों बाद भी प्रेम की शक्ति के बल पर वह महान बन गईं। त्रिदेवों में सबसे चर्चित महादेव को संहार का देवता कहा जाता है लेकिन उनकी पूजा सिर्फ प्रेम से अभिभूत होने वाले भोलेनाथ के रूप में ही की जाती है। जब पूरी दुनिया त्रिदेवों के उग्र रूप को स्वीकार नहीं कर पाती है तो वह आम मनुष्य की नकारात्मकता को कैसे और किस रूप में स्वीकार करती होगी, समझा जा सकता है। धर्मग्रथों को भी देखें तो पाएंगे कि भगवान प्रेम और समर्पण से ही सबसे जल्दी भक्त के वश में हो जाते हैं। ऐसे भक्त की वह खुद चिंता करते हैं।


आईए उक्त सिद्धांत को विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं। वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चुका है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से बनी है। फिलहाल इसके भी सूक्ष्म रूप पर शोध हो रहा है, जिसमें गॉड पार्टीकल की बात सामने आई है। यहां यह भी जानना आवश्यक है कि ये सभी ठोस या द्रव नहीं, बल्कि तरंगों के रूप में हैं। जाहिर है कि इन्हें तरंगों की तरह ही नियंत्रित और संचालित किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो पूरा ब्रह्मांड तरंगों के आधार पर नियंत्रित और संचालित होता है। विचार और प्रेम की शक्ति का संचालन भी तरंगों के आधार पर होता है। यही कारण है कि वह ब्रह्मांड की शक्तियों को सीधा प्रभावित करता है। यदि हम ब्रह्मांड में सकारात्मक और प्रेम की शक्ति के तरंग छोड़ते हैं तो न्यूटन के सिद्धांत के अनुसार हमारे पास प्रेम और सकारात्मकता लौट कर आती है। यही नियम नकारात्मक शक्ति और घृणा के साथ लागू होता है। अत: आवश्यक है कि सफल और सुखी जीवन के लिए हम अपने मन को नियंत्रित कर प्रेम और सकारात्मकता की ओर मोड़ कर रखें। इससे हम दूसरों पर नहीं, बल्कि खुद पर एहसान करेंगे। गीता में भगवान कृष्ण ने भी इसी आधार पर कहा है— जो लोग अपने मन को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं, मन उनका शत्रु बनकर काम करता है।


अब फिर भारतीय धर्म और दर्शन की ओर लौटें। भारतीय ऋषि-मुनि इसी सिद्धांत से भलीभांति परिचित थे और इसका उपयोग करना जानते थे। उन्होंने इसी के बल पर लगातार चमत्कार किए। तीनों लोकों में उनका प्रवेश था। वे त्रिकालदर्शी थे और इच्छानुसार किसी को भी श्राप और वरदान दे पाने में समर्थ थे। कालांतर में भौतिक सुख-सुविधाओं में फंसे लोग धर्म और आध्यात्म से दूर होते गए जिससे उनकी विशिष्ट क्षमता भी कम होती हुई खत्म हो गई। इसका यह कदापि अर्थ नहीं है कि वे बातें गलत थी। आज भी उन सिद्धांतों को अपना कर हम असंभव को संभव बना सकते हैं। भारतीय ग्रंथों को खंगालें तो हम पाते हैं कि ईसा के जन्म से कई सदी पूर्व महान ऋषि और वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक ऋषि कणाद ने द्वयाणुक (दो अणु वाले) तथा त्रयाणुक की चर्चा की है। कणाद परमाणु की अवधारणा के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले महर्षि कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। उन्होंने कहा था कि भौतिक जगत की उत्पत्ति सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण परमाणुओं के संघनन से होती है। यह भी उल्लेखनीय है कि महर्षि कणाद ने ही न्यूटन से पूर्व गति के तीन नियम बताए थे। उनके निम्न मंत्र से इस सिद्धांत की पुष्टि होती है– वेग: निमित्तविशेषात कर्मणो जायते। वेग: निमित्तापेक्षात कर्मणो जायते नियतदिक क्रियाप्रबन्धहेतु। वेग: संयोगविशेषविरोधी॥ (वैशेषिक दर्शन)। अर्थात्‌ वेग या गति पांचों द्रव्यों पर निमित्त व विशेष कर्म के कारण उत्पन्न होता है तथा नियमित दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट या उत्पन्न होता है।


वैज्ञानिक भी अब भारतीय दर्शन के सिद्धातों को मानने लगे हैं। उन्होंने मनुष्य में अद्भुत शक्तियों के वास होने के सिद्धांत को भी स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही वह यह भी मानने लगे हैं कि मानसिक शक्तियों को सधे उपयोग से कई बड़े चमत्कार संभव हैं।


प्रख्यात क्वांटम भौतिक शास्त्री डेविड बॉम (1917-1992) ने तो यहां तक कहा है- एक मायने में मनुष्य ब्रह्मांड का संक्षिप्त रूप है, इसलिए उससे ही ब्रह्मांड की सुराग मिल सकता है।



(जारी)

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