एक ही पिता की संतान हैं सभी जातियों के लोग…

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सांस्कृतिक-वैचारिक भिन्नता से बने देव,दानव,यक्ष व गंधर्व

पहले पृथ्वी पर देवता, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि प्रमुख जातियां थीं। उन्हें लेकर भारी भ्रम फैला हुआ है। अधिकतर लोग उन्हें विशिष्ट या मौजूदा युग के लोगों से एकदम अलग मानते हैं जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। इस भ्रम को दूर करने के लिए मैं इस लेख में कुछ तथ्य व पौराणिक साक्ष्य प्रस्तुत करूंगी। वे भी पहले हमारी तरह ही सामान्य लोग थे। अपने-अपने कर्मों और सोच की वजह से अलग-अलग नामों से पुकारे जाने लगे और उनके बारे में अलग-अलग धारणा बनी। पौराणिक काल के ग्रंथों एवं धर्मग्रंथों के अनुसार अनेक ग्रंथों के रचयिता ऋषि कश्यप (मनुष्य) की विभिन्न पत्नियों —अदिति से देवताओं की, दिति से दैत्यों की, दनु से दानवों की, सुरसा से राक्षसों की तथा अरिष्टा से गंधर्वों की उत्पत्ति हुई। इसी तरह उनकी अन्य पत्नियों से यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। सृष्टि के विकास की नींव में ऋषि कश्यप एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने कुल का विस्तार किया था।  ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र ऋषि कश्यप जिन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है, उनकी माता का नाम ‘कला’ था जो कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल ऋषि की बहन थी। पुराणों अनुसार सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर स्थित था जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा कि तपस्या में लीन रहते थे।


सात द्वीपों में बंटी थी धरती

पौराणिक काल की मान्यता के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे। समुद्र तब भी था लेकिन भूभाग इतने अलग-अलग नहीं थे। प्राचीन काल में पूरी धरती को सात द्वीपों में बांटा गया था – जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप मध्य में स्थित था। जम्बू द्वीप के 9 खंड थे : इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इसी क्षेत्र में सुर और असुरों का साम्राज्य था। जैसा कि आज भी सौतेले भाइयों में विवाद होता है, उसी तरह असुर देवताओं के सबसे प्रबल शत्रुओं में माने जाते थे। महाभारत काल में तो चचेरे भाइयों के विवाद से ही महाविनाश हुआ था। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भी असुरों और देवों में सदा युद्ध होता रहा। एक ही पितामह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एवं एक ही पिता कश्यप मुनि की विभिन्न पत्नियों से संतान- देव ‘अदिति’ के पुत्र, दैत्य ‘दिति’ के पुत्र एवं दानव ‘दनु’ के पुत्र अर्थात भाई भाई होने पर भी बड़े भाइयों दैत्य व दानवों ने देवों के विरुद्ध दुश्मनी/ श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ में पहले तो अति वीरतापूर्ण कार्यों हेतु स्वयम को प्रतिबद्ध किया, तत्पश्चात भौतिक उन्नति व सुखलिप्तता के लिए निंदनीय कर्म प्रारंभ किये। इसी दौरान गुरु बनाने के मामले में देवताओं के रवैये से क्षुब्ध ऋषि भृगु के अत्यंत प्रतिभाशाली पुत्र शुक्राचार्य दानवों के गुरु बन गए जिससे उनकी ताकत और बढ़ गई। चूंकि शुक्राचार्य देवताओं से बेहद नाराज थे और उन्हें और उनके गुरु बृहस्पति को नीचा दिखाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने नेतृत्व में दानवों को और शक्तिशाली बनाना प्रारंभ किया तथा देवताओं के विरुद्ध खुलकर मैदान में उतार दिया। इस चक्कर में अति-भौतिकतापूर्ण एवं सुर (देवता) विरोधी कार्य खुलकर होने लगे। चूंकि दैत्यों का यह आचरण सुर विरोधी कहलाया। इसी कारण उनका एक नाम असुर भी पड़ गया। इसे दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि वैचारिकता एवं संस्कृति-भिन्नता के कारण स्व-संस्कृति स्थापना एवं वर्चस्व के हेतु संघर्ष  होने लगे। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि ब्रह्मा और उनके कुल के लोग धरती के नहीं थे। उन्होंने दूसरे ग्रह से आकर धरती पर आक्रमण किया और मधु व कैटभ नाम के दैत्यों का वध कर धरती पर अपने कुल का विस्तार किया था। बस, यहीं से धरती के दैत्यों और स्वर्ग के देवताओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई।


संघर्ष की कथा

देवता और असुरों का यह संघर्ष हजारों साल तक चलता रहा। इससे इन दोनों के बारे में काफी जानकारी भी मिल जाती है। जम्बूद्वीप के इलावर्त क्षेत्र ( रशिया=रूस) में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। असुरों ने वर्चस्व के लिए लगातार देवों के साथ युद्ध किया और इनमें से कई युद्धों में वे प्राय: विजयी भी होते रहे। असुरों में भी बड़े प्रसिद्ध राजा, बलवान-शक्तिशाली, वीर, भक्त, धार्मिक एवं विद्वान् हुए। उनमें से कुछ ने तो सारे विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया जब तक कि उनका संहार इंद्र, विष्णु, शिव आदि देवों ने नहीं किया। देवताओं (मूलत: इंद्र व विष्णु) के शत्रु होने के कारण ही उन्हें असुर, दुष्ट, दैत्य कहा गया है, किंतु सामान्य रूप से वे दुष्ट नहीं थे। उनके गुरु शुक्राचार्य देवगुरु बृहस्पति के तुल्य ही ज्ञानी और राजनायिक थे। शिव सुर–असुर दोनों के प्रति समभाव रखते थे यद्यपि वे दैत्यों के अति-भौतिकता की संस्कृति एवं देवों की सुखलिप्ततापूर्ण जीवनचर्या की अपेक्षा वनांचली प्राकृतिक जीवन शैली के समर्थक थे। असुर भी प्राय: प्रकृति-पूजक थे। देव गुरु बृहस्पति के भाई दैत्य गुरु शुक्राचार्य स्वयं शिव के शिष्य, भक्त व उपासक थे। वे उशना नाम से प्रसिद्द कवि-विद्वान् एवं मृतक को पुन: जीवित कर देने वाली मृतसंजीवनी विद्या के ज्ञाता थे जो भगवान शिव ने उन्हें देवों को अमृत द्वारा अमरता प्राप्त होने पर दोनों वर्गों के समानुपातिक समन्वय व शक्तिसंतुलन के स्वरूप प्रदान की थी। इस प्रकार बृहस्पति के शिष्य व समर्थक देव, सुर तथा शुक्राचार्य के शिष्य व समर्थक दैत्य आदि असुर कहे जाने लगे।


देव-दानव में अंतःसंबंध

इस कटुता और सांस्कृतिक भिन्नता के बावजूद देव-दानवों में प्रेम व विवाह आदि अंत:संबंध प्रतिबंधित नहीं थे। यथा उशना अर्थात शुक्राचार्य ने इंद्र के लिए बज्र निर्मित किया, भक्त प्रहलाद, शंखचूर्ण असुर की पत्नी विष्णु भक्त तुलसी, मथुरा का धार्मिक न्यायप्रिय शासक मधु दैत्य जिसका पुत्र लवण बड़ा होने पर अत्याचारी राजा व लवणासुर इसी श्रेणी के थे। दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद के विष्णु भक्त होने के बाद असुर भी मानवीयता एवं भक्तिभावयुत होने लगे एवं विद्याधरों की कोटि में आने लगे एवं असुरों में भी देवताओं के समर्थक होने लगे। वर्चस्व के युद्धों में अंतिम बार प्रहलाद के पुत्र राजा बलि के साथ इंद्र का युद्ध हुआ और देवता हार गए तब संपूर्ण जम्बूद्वीप पर असुरों का राज हो गया। इस जम्बूद्वीप के बीच के स्थान में था इलावर्त राज्य जो आज का समस्त एशिया व यूरोप है। देव केवल स्वर्ग, देवलोक, भरत-खंड ( मध्य एशिया, उत्तरापथ, उत्तराखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त ) तक सिमट गए। चूंकि यक्ष, गंधर्व, नाग एवं किन्नरों से किसी का कोई बड़ा और लंबा संघर्ष नहीं हुआ, इसलिए उनके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं मिल सकी है। इस बारे में प्रयास करता रहूंगा और जैसे ही जानकारी मिलेगी, आप सबसे साझा भी करूंगा।





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