रोगनाश, ख्याति वृद्धि, मनवांछित फल के लिए अत्यंत उपयोगी मंत्र

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कलियुग में हनुमान को सबसे प्रभावी देवता कहा गया है। वह शीघ्र प्रसन्न होने वाले तथा भक्तों को मनवांछित फल देने वाले हैं। रामभक्त हनुमान यूं तो सामान्य भक्ति और उपासना से ही भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन कुछ अमोघ मंत्र भी हैं जिनके प्रयोग से उनकी प्रसन्नता शीघ्र हासिल की जा सकती है। प्रस्तुत हैं हनुमान के कुछ अत्यंत प्रभावी मंत्र, उनकी जप संख्या, विधि एवं प्रयोग के तरीके की जानकारी। जिनके इष्ट हनुमान हैं या जो जीवन में शारीरिक बल और शक्ति में विश्वास रखते हैं, उन्हें हनुमान की उपासना एवं उनके मंत्रों का तय संख्या में जप अवश्य करना चाहिए। इससे उनका जीवन सुखद और निरापद हो जाएगा।


1-हनुमान मंत्र- हौं ह् स्फ्रें ख्फ्रें ह् सैं ह् स्ख्फ्रें ह् सों हनुमते नम:।

जप से पूर्व हनुमान जी का इस मंत्र से ध्यान करें—
बालार्कायुत तेजसं त्रिभुवन प्रक्षोभकं सुंदरम्। 
सुग्रीवादि समस्त वानर गणै: संसेव्य पादांबुजम्। 
नादेनैव समस्त राक्षसगणान् संत्रासयंतं प्रभुम्। 
श्रीमद्राम पदांबुज स्मृति रतं ध्यायामि वातात्मजम्। 
विधि एवं फल- मंत्र का अनुष्ठान शुरू करने से पहले इसे करने का समय और स्थान खुद तय कर लें। फिर उसी स्थान पर रोज निर्धारित समय पर और निर्धारित अवधि के अंदर इस मंत्र का बारह हजार जप करें। इससे मंत्र सिद्ध हो जाएगा। ध्यान रहे के अनुष्ठान के दौरान साधक को पूर्ण सात्विक भोजन (कंद, मूल व फल हो तो सर्वश्रेष्ठ) करना है, जमीन पर पतले कपड़े को बिछा कर सोना है। इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है। यह अनुष्ठान हर तरह, खासकर घर में होने वाले उपद्रव की शांति करता है। साधक के घर में भूत, पिशाच, प्रेत की बाधा कभी नहीं आती। उसके अकालमृत्यु का खतरा भी टल जाता है। मंत्र का जप करने वाले में अत्यधिक आत्मबल आता है और उसके कार्य स्वत: सिद्ध होने लगते हैं। रुके कार्य भी पूरे हो जाते हैं।


2-अष्टादशाक्षर मंत्र– ऊं नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा
दिन में निश्चित समय पर नहा-धोकर मंत्र का जप करने से पूर्व हनुमान का ध्यान निम्न मंत्र से करें—
ऊं दह्नतप्त सुवर्ण समप्रभं भयहरं हृदये विहितांजलिम्। 
श्रवण कुंडल शोभि मुखांबुज वानराज मिहाद्भुतम्।। 
विधि एवं संख्या—इक्कीस हजार जप तथा जप संख्या के दसवें हिस्से का हवन करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है। साधक के घर में सुख-शांति तथा सभी प्रकार के उपद्रवों से मुक्ति के लिए यह मंत्र अत्यंत उपयोगी है। जिस घर में या जिस व्यक्ति अक्सर बीमार रहता हो या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो, उसे इसके अनुष्ठान से रोग से मुक्ति मिल जाती है। भूत, प्रेत, पिशाच आदि बाधा एवं उपद्रव खत्म हो जाते हैं।


3-द्वादशाक्षर मंत्र- हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्।
ध्यान—
महाशैलं समुत्पाट्य धावन्तं रावणं प्रति।
तिष्ठ तिष्ठ रणे दुष्ट घोरारावं समुच्चरन्। 
लाक्षा रसारुणं गात्रं कालांतक यमोपमम्।
ज्लदग्नि लसन्नेत्रं सूर्य्यकोटि समप्रभम्।
श्रंगदाद्यैर्महावीरं र्वेष्टितं रुद्ररूपिणम्।
एवं रूपं हनुमन्तं ध्यात्वा पूजां समारभेत्। 
इस मंत्र को गोपनीय माना गया है। इसकी सिद्धि से अन्य कई तरह की सिद्धियां मिलने में भी मदद मिलती है। इस मंत्र को सिद्ध करने वाले का यश और प्रभाव तीनों लोकों में फैलता है। मंत्र को सिद्ध करने वाले को किसी प्रकार की कमी नहीं रह जाती है। इस मंत्र की जानकारी महादेव ने भगवान श्रीकृष्ण को दी थी। कृष्ण ने अर्जुन को इसका ज्ञान दिया जिन्होंने इसे सिद्ध कर त्रिलोक में ख्याति प्राप्त की और अपनी क्षमता का डंका बजाया।
जप संख्या और विधि— एक लाख जप और दसवें हिस्से का हवन करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। नदी का किनारा, निर्जन वन, मंदिर, पहाड़, गुफा या घर में ही पूरी तरह एकांत कमरे में संकल्प कर इस मंत्र का जप करना चाहिए। जप के दौरान हनुमान जी की मूर्ति या चित्र सामने हो और तेल का दीपक जलता रहना चाहिए। अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।


4-द्वादशाक्षर वीर साधन मंत्र– हं पवननंदनाय स्वाहा।
ध्यान–
ध्यायेद्रणे हनुमंतं कपि कोटिसमन्वितम्।
धावंतं रावणं जेतुं दृष्टा वकमुत्थितम्।
लक्ष्मणं च महावीरं पतितं रणभूतले।
गुरं च क्रोधमुत्पाद्य गृहीस्त्वा गुरुपर्वतम्।
हाहाकारै: सदर्पेश्च कंपयंतं जगत्रयम्। 
ब्रह्मांडं स समावाप्य कृत्वा भीमं कलेश्वरम्।
संख्या और विधि– यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली है। इसकी साधना भी कठिन है। एक सप्ताह की इस साधना में संकल्प लेकर छह दिन-रात मिलाकर प्रतिदिन छह-छह हजार जप करना होता है। सातवें दिन रात के चौथे प्रहर में जप के दौरान हनुमान पहले विकराल रूप में दर्शन देते हैं। उस दौरान गुरु का रहना उपयोगी होता है, अन्यथा साधक डर सकता है। हनुमान जी साधक को दर्शन देकर मनचाहा वरदान देते हैं। यह अनुष्ठान अत्यंत प्रभावी है। इस दौरान यह ध्यान रखना आवश्यक है कि साधक पूर्णत: ब्रह्मचर्य का पालन करे। वह रोज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संध्याआदि करके पहले आठ बार मूल मंत्र का जप करे। फिर बारह बार जल हाथ में लेकर मंत्र पढ़कर जल को अपने शरीर पर छिड़के फिर नदी के किनारे या पहाड़ पर बैठकर रेचक व कुंभक कर फिर ध्यान कर मंत्र जप शुरू करे। 



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