ईश्वर पर भी लागू होता है सृष्टि का नियम

0
473

सृष्टि का नियम सर्वेपरि है। यह सब पर समान रूप से लागू होता है। इस नियम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि ब्रह्मांड में उत्पन्न हर वस्तु, जीव-जंतु, यहां तक कि देवी-देवताओं की भी आयु निर्धारित है। त्रिदेव भी इससे अलग नहीं हैं। हां, उनकी आयु हमसे अधिक है। इंद्र के पद पर समय-समय पर लोग बैठते रहे हैं। मृत्यु पर लंबे समय तक विजय पाने वाले ऋषि-मुनि भी अंतत: काल के गाल में समा गए। सिर्फ चंद महापुरुषों को बहुत लंबी आयु का वरदान मिला है लेकिन अमर कोई नहीं है। जैसे अलग-अलग जीवों की आयु में अंतर होता है, उसी तरह मनुष्यों और देवी-देवताओं की आयु में भी अंतर है। धर्म ग्रंथों को ही देखें तो त्रिदेवों तक की आयु निर्धारित है। महर्षि व्यास ने बाकायदा यह जानकारी दी है कि त्रिदेवों की आयु भी मनुष्यों की तरह ही 100 साल निर्धारित है। अंतर सिर्फ इतना है कि जहां मनुष्यों की औसत आयु सौ सौर वर्षों की मानी जाती है, वहीं त्रिदेवों के सौ सालों में एक दिन का मतलब चार अरब बत्तीस करोड़ तीस लाख सौर वर्ष होता है। इस समय मौजूदा त्रिदेव करीब साढ़े पचास साल की उम्र बिता चुके हैं।


नर के बिना नारायण अधूरे

जाहिर है कि सृष्टि के इसी नियम के अनुसार जैसे मनुष्यों को जीवित और स्वस्थ रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, वैसे ही देवी-देवता भी इससे अछूते नहीं हैं। त्रिदेवों में जहां विष्णु हर साल करीब पांच माह देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक) के लिए योगनिद्रा में जाकर ऊर्जा हासिल करते हैं, वहीं शिव तो मौका मिलते ही योग-ध्यान में लीन हो जाते हैं। स्वर्ग में रहने वाले देवी-देवता को ऊर्जा के लिए कर्म करने का अधिकार नहीं होता है। उन्हें इसके लिए अपने भक्तों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि मनुष्य और देवी-देवताओं में सिर्फ भक्त और भगवान का ही संबंध नहीं है। वे मानव के आदि माता-पिता भी हैं। वेदों में भी देवताओं की स्तुति करते हुए किसी को मित्र तो किसी को पिता की तरह संबोधित किया गया है। यही कारण मानवों से उनका संबंध अटूट और बेहद आत्मीय रहा है। इस दूसरा पहलू यह भी है कि प्रकृति की व्यवस्था में मानव और भगवान एक-दूसरे के पूरक हैं। धर्म ग्रंथों में भी नर और नारायण को एक-दूसरे के पूरक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हिंदुओं के अलावा अन्य धर्मों पर भी नजर डालें तो उसमें भी मनुष्य को खुदा या गॉड की संतान के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। माता-पिता के लिए संतान का क्या महत्व होता है, इसे कहने की जरूरत ही नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है- जैसे हम भगवान के बिना अधूरे हैं, वैसे ही वे भी हमारे बिना अधूरे और कमजोर हैं। हमें मनचाहे और बेहतर जीवन के लिए जैसे ईश्वरीय कृपा की जरूरत पड़ती है, ठीक उसी तरह देवी-देवता के लिए की गई हमारी प्रार्थना, उपासना, मंत्र जप, हवन आदि से संबंधित देवी-देवता को बल मिलता है। यही कारण है कि अपने प्रति समर्पित भक्त के लिए भगवान भी उतने ही व्यग्र रहते हैं जितने भक्त। इसलिए पूरे विश्वास और समर्पण के साथ अपने देवी-देवता की उपासना करें और विश्वास रखें कि वह आपको फल अवश्य देंगे।


पुरुष और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक

रही बात पूर्णता की तो एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि प्रकृति में सिर्फ प्रकृति ही पूर्ण है बाकी सभी अपूर्ण हैं। भगवान भी अधूरे हैं। शक्ति के बिना वे शव के समान हैं। यही कारण है कि ब्रह्मा को सरस्वती, विष्णु को लक्ष्मी, शिव को पार्वती और इंद्र को इंद्राणी का साथ लेना पड़ा। यहां तक कि बाद में जन्मे गणेश को भी ऋद्धि-सिद्धि का साथ मिलने के बाद ही पूर्णता प्राप्त हुई। सृष्टि का यही नियम देवी-देवता से लेकर मनुष्य आदि सभी जीव-जंतुओं पर समान रूप से लागू होता है। इन व्याख्याओं का यह कतई अर्थ नहीं है कि जब देवी-देवता भी पूर्ण नहीं हैं तो फिर उनकी महत्ता क्या है?  वास्तव में उनका हमारे लिए बहुत ज्यादा महत्व है। जैसे लोकतंत्र में देश-प्रदेश और उसके नागरिकों के जीवन के लिए चुने हुए जनप्रतिनिधियों से बनी सरकार का महत्व होता है, ईश्वर का महत्व उससे कहीं बहुत ज्यादा है। क्योंकि वे सृष्टि के नियम संचालक हैं। यह सही है कि उन्हें हमसे ही अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है लेकिन सामान्य स्थिति में भी उनकी क्षमता हमसे करोड़ों गुना ज्यादा है। इस सिद्धांत को थोड़े और व्यापक नजरिये से देखें तो पाएंगे कि जिस इंसान (ऋषि-मुनि, साधक आदि) ने खुद को प्रकृति की ऊर्जा से भरपूर करने में सफलता हासिल की, वे देवतुल्य हो गए। वशिष्ट, विश्वामित्र, वाल्मीकि, व्यास आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।



LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here