संवाद में क्रोध का अर्थ हार है

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जब हम दो लोगों या समूह में संवाद के बारे में चर्चा करते हैं तो महत्‍वपूर्ण यह होता है कि बातचीत किस तरह की होनी चाहिए? यह वार्ता ऐसी होनी चाहिए जो क्रोध या प्रतिकार पैदा न करे। वैसी ही बात को सर्वश्रेष्ठ और ग्राह्य माना जाता है। धर्म और आध्यात्म का मूल मंत्र है क्रोध और वाणी पर नियंत्रण। जिसने दोनों पर नियंत्रण कर लिया, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता है, जिसका इस पर नियंत्रण नहीं, वह ज्ञानी होकर भी अज्ञानी और बन जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आदि शंकर और मंडन मिश्र के बीच हुआ शास्‍त्रार्थ और उसका परिणाम था। आधुनिक समय के लिए भी यह प्राचीन उदाहरण स्‍मरणीय और वर्णन योग्‍य है। आदि शंकर दक्षिण भारतीय एक युवा क्रांतिकारी विचारक थे जो धार्मिक कर्मकांडों को अधिक महत्‍व नहीं देते थे जबकि मंडन मिश्र उत्तर भारत के स्थापित बुजुर्ग विद्वान थे जो प्राचीन परंपरा और अनुष्‍ठानों के अनुयायी थे। वह पशु बलि में भी विश्‍वास करते थे।


आदि शंकराचार्य इन कर्मकांडों की उपयोगिता, महत्व और आवश्यकता पर चर्चा और बहस के माध्‍यम से यह स्‍थापित करना चाहते थे कि मुक्ति प्राप्‍त करने के लिए ये कर्मकांड आवश्‍यक नहीं हैं। इसके माध्यम से वह धर्म से आडंबर को दूर करने के बारे में सामान्य जन को संदेश देकर जागरूक करना चाहते थे। इस कार्य के लिए वह देश भर में विद्वानों से शास्त्रर्थ कर अपने विचारों का प्रचार कर रहे थे। चूंकि मंडन मिश्र उत्तर भारत के स्थापित विचारक थे, अत: उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित करने के अर्थ एक बड़े समूह में एक ही झटके में अपने विचारों का प्रचार करना होता। इसी उद्देश्य से वह मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने आए थे।


दूसरी ओर मंडन मिश्र का मकसद आदि शंकराचार्य को पराजित कर अपनी इस विचारधारा को और मजबूती से स्थापित करना था कि कर्मकांड न सिर्फ हमारी प्राचीन परंपरा है, बल्कि दैनिक जीवन के लिए भी जरूरी है। चूंकि शंकराचार्य देश के बड़े हिस्से में अपने मत का प्रचार कर यहां आए थे। अत: उन्हें पराजित करने से कर्मकांड वाली विचारधार को अधिक मजबूती मिलनी तय थी। दोनों प्रकांड विद्वान थे और अपनी-अपनी विचारधारा को लेकर अतिउत्साही भी इसलिए शास्त्रार्थ के प्रति दोनों लालायित भी थे। प्राचीन भारत की यह बड़ी खूबी थी कि बड़े से बड़े संवेदनशील मुद्दों को भी वार्ता के द्वारा ही सुलझा लिया जाता था। ऐसे मुद्दे सड़कों पर या ताकत से तय नहीं होते थे।


क्रोध बना मंडन मिश्र की हार का कारण

यह सभी जानते हैं कि आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र ने शास्‍त्रार्थ में भाग लिया और उसमें शंकर विजयी हुए। अत: मैं पाठकों को यहां इसी विषय पर ज्यादा जानकारी देना नहीं चाहती हूं। मेरा मकसद उस प्रक्रिया और उसकी उपयोगिता की जानकारी देना है जिससे शास्त्रार्थ का फैसला हो सका और उसे सभी पक्षों ने स्वीकार किया। इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण विषय की बहस नहीं है बल्कि यह है कि वह बहस कैसे आयोजित की गई। यह एक ऐसी दिलचस्प कहानी है जो मानवता के लिए सर्वकाल में परिचर्चा और व्यक्तित्व को समझने के उच्‍चतम स्वरूप को प्रस्‍तुत करती रहेगी। सभी यह भी जानते हैं कि इस शास्त्रार्थ के लिए निर्णय की जिम्मेदारी मंडन मिश्र की धर्मपत्नी को दी गई थी क्योंकि उस जमाने में किसी और विद्वान को इतना योग्य नहीं पाया गया जो दोनों असाधारण विचारकों के शास्त्रार्थ का फैसला कर सके। शास्त्रार्थ से पूर्व ही यह सहमति बनी थी कि अगर मंडन मिश्रा हार जाएंगे तो वह गृहस्‍थ छोड़ देंगे और सन्‍यास अपना लेंगे। अगर आदि शंकर पराजित हो गए तो वह सन्‍यास छोड़ देंगे और विवाह करके गृहस्‍थ जीवन अपना लेंगे।


मंडन मिश्रा, जो उच्‍च्‍ कोटि के विद्वान थे, उन्‍होंने आदि शंकर को जो एक युवा थे, उन्‍हें कहा कि मंडन मिश्र से उनकी समानता नहीं है इसलिए वे अपनी पंसद के किसी व्‍यक्ति को पंच चुन लें। आदि शंकर ने और बड़ा व उदार फैसला करते हुए मंडन मिश्र की पत्नी जो स्‍वंय विदुषी थी, को पंच के रूप में चुन लिया। अब सबसे कठिन परीक्षा पंच की ही होने लगी। शास्त्रार्थ में पति को हारा हुआ घोषित करने का मतलब था कि वह उन्हें खो देंगी। इतने कठिन फैसले में उनके कदम न लड़खड़ा जाएं, ऐसा होने पर पंच का पद बदनाम हो जाता। इसलिए उन्होंने ऐसा रास्ता निकाला कि जिसमें उनके लड़खड़ाने का खतरा ही खत्म हो गया। इसके लिए देखिए, उन्होंने क्‍या किया? उन्होंने मंडन मिश्र और शंकर, दोनों से ताजे फूलों के हार पहनने के लिए कहा और कहा कि उसके बाद ही शास्‍त्रार्थ शुरू होगा। उन्होंने कहा कि जिसके फूलों के हार की ताजगी समाप्‍त हो जाएगी उसे ही पराजित घोषित किया जाएगा। ऐसा क्‍यों? क्‍योंकि आप दोनों में जिसे क्रोध आ जाएगा उसका शरीर गर्म हो जाएगा जिसके कारण माला के फूलों की ताजगी समाप्‍त हो जाएगी। क्रोध स्‍वयं ही पराजय का संकेत है। इसी तर्क पर मंडन मिश्रा को शास्‍त्रार्थ में पराजित घोषित किया गया और उन्‍होंने संन्‍यास ले लिया और शंकर के शिष्‍य बन गए।


यह बातचीत के तौर-तरीके की महत्‍ता और उपयोगिता को दर्शाता है। इससे यह सीख मिलती है कि संवाद के दौरान क्रोध का अर्थ तर्क की कमी होती है। अर्थात जब हमारा मस्तिष्क किसी भी रूप में सामने वाले को तर्कपूर्ण जवाब व आचारण करने में असमर्थ पाता है, तब हम क्रोधित होते हैं। इसलिए कहा गया है कि बातचीत बिना क्रोध और तनाव के शांतचित्त मन से होनी चाहिए।



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