कपोल कल्पना नहीं सोमरस, आज भी है मौजूद

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कपोल कल्पना नहीं सोमरस
सोमलता का पौधा

Somras is not fantasy : कपोल कल्पना नहीं सोमरस, उसका अस्तित्व आज भी है। भारत, ईरान और अफगानिस्तान के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में इसके पौधे पाए जाते हैं। इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। शोध और प्रचार के अभाव में सही जानकारी सामने नहीं आ पाई है। जिन क्षेत्रों ये पाया जाता है, वहां के लोग इसके गुणों से थोड़े-बहुत परिचित हैं।

वेदों में सोमरस का वर्णन

सोमरस को सोमलता नामक पौधे से बनाया जाता है। वेदों के अनुसार यह पहले सिर्फ स्वर्ग में पाया जाता था। ऋग्वेद के अनुसार ब्रह्मा ने सोमलता का निर्माण किया था। इसका उद्देश्य बीमारी और मृत्यु पर विजय पाना था। इसका मूल स्थान स्वर्ग माना गया है। बाद में इसे धरती पर लाया गया। यहां इसकी उत्पत्ति का स्थान गांधार का मूजवंत पर्वत (वर्तमान में अफगानिस्तान) है।

इन क्षेत्रों में मिलते हैं ऐसे पौधे

अफगानिस्तान की पहाड़ियों में ऐसे पौधे अभी भी पाए जाते हैं। हिमालय पर सात से 16 हजार फीट ऊंचाई पर भी पाया जाता है। चीन में इसकी बहुतायात मिलती है। देश में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों में ऐसे पौधे मिलते हैं। रंग-रूप में थोड़ अंतर है लेकिन औषधीय गुणों से भरपूर है। कुछ लोग ईरान में पाए जाने वाले इफेडा पौधे को सोमलता होने का दावा करते हैं।

सोमलता के गुण

वैदिक साहित्य अनुसार यह सौम्यता, आरोग्यता, अमरता प्रदान करने वाला है। देवताओं के प्रिय इस पेय को पीने वाला पवित्र हो जाता है। कपोल कल्पना नहीं सोमरस, यह लोक कथाओं में भी शामिल है। इसे अमरता देने वाला और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। वेद के विपरीत लोक कथाओं में इसे नशीला पेय कहा गया है। यह भी मान्यता है कि इसे पीने से पौरुष शक्ति बढ़ती है।

ऐसा होता है सोमलता का पौधा

सोमलता पौधे की एक और प्रजाति।

इसके पौधे बिना पत्तियों वाले पौधे गहरे बादामी रंग के होते हैं। हालांकि अलग-अलग जगहों में इसके रूप में अंतर दिखता है। इसके अस्तित्व व पहचान पर विद्वान एकमत नहीं हैं। इसमें कई तरह के औषधीय गुण होते हैं। यह स्फूर्ति व ताकत बढ़ाता है। कुछ जगहों पर पौरुष गुण बढ़ाने में इसका उपयोग होता है। कुछ जगहों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम आता है। कहीं लोग उबाल कर नशे के लिए पीते हैं।

यज्ञ में उपयोग और विलुप्त होना

वेदों में सोमरस के उपयोग का खूब वर्णन मिलता है। यह देवताओं का प्रिय पेय माना जाता था। यज्ञ में इसका खूब उपयोग किया जाता था। कालांतर में यज्ञ करने वालों ने इस ज्ञान को दूसरों को नहीं दिया और यह लुप्त होता चला गया। सतयुग के बाद से ही इसकी पहचान कठिन होती गई। विदेशी आक्रमण के बाद तो इसकी चर्चा भी लगभग खत्म हो गई।

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