चैत्र नवरात्र के लिए हो जाएं तैयार, मां आ रहीं घोड़े पर

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चैत्र नवरात्र का शुभ मुहूर्त जानें, इनका भी रखें ध्यान
चैत्र नवरात्र का शुभ मुहूर्त जानें, इनका भी रखें ध्यान।

Get Ready for Chaitra Navratra, Mother is coming on horse : चैत्र नवरात्र के लिए हो जाएं तैयार, मां आ रही घोड़े पर। वर्ष 2022 में 2 अप्रैल से 10 अप्रैल तक चैत्र नवरात्र है। इस दौरान सूर्यदेव उत्तरायण रहते हैं। अर्थात देवताओं के लिए दिन और पूर्ण सक्रिय रहने का समय होता है। इसलिए इस अवधि में की गई साधना न सिर्फ शीघ्र फल देती है, अपितु साधक के स्तर को भी बढ़ाती है। इन नौ दिनों में किसी भी मंत्र के जप और अनुष्ठान का चमत्कारिक लाभ मिलता है। सनातन धर्मावलंबियों के लिए नए वर्ष का प्रारंभ हो रहा है। मान्यता है कि इसी दिन पृथ्वी की उत्पत्ति हुई थी। अतः इस दौरान मां दुर्गा के आने-जाने के वाहन से वर्ष का सटीक आकलन भी संभव है। इस बार माता घोड़े पर आ रही हैं। यह युद्ध और उपद्रव जैसी स्थिति का संकेत है।

ऐसे करें साधना-उपासना

नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत फलदायी होता है। इसमें कामना मंत्र लगाकर संपुट पाठ मनोकामना प्राप्ति के लिए रामबाण की तरह होता है। चाहें तो नित्य दुर्गा के एक-एक रूप की विधिवत पूजा उपासना भी कर सकते हैं। इससे मनचाहा फल पाने के साथ ही भोग और मोक्ष तक की प्राप्ति की जा सकती है। इसके साथ ही किसी वैदिक, तांत्रिक एवं शाबर मंत्र का अनुष्ठान कर उसे सिद्ध भी किया जा सकता है। फल प्राप्ति में भी यह बेजोड़ है। शारदीय नवरात्र जहां शक्ति प्राप्ति और आध्यात्मिक चेतना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, वहीं चैत्र नवरात्र को हर लक्ष्य के लिए उपयोगी कहा गया है। इसमें विशेष बात यह भी होती है कि माता पहले से जाग्रत अवस्था में होती हैं। अतः उनका प्रभाव भी शीघ्र मिलता है। शारदीय नवरात्र में माता को पहले जगाना पड़ता है।

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शुभ मुहूर्त और अनुकूल रंग

चैत्र नवरात्र के लिए प्रतिपदा को घट स्थापना की जाती है। इसे शुभ मुहूर्त में करना लाभदायक होता है। इस बार 2 अप्रैल को प्रातः 6.22 से 8.31 बजे तक का समय शुभ है। इस समय उपासना-पूजन प्रारंभ कर सकते हैं। चूंकि पहले दिन तैयारी में थोड़ा विलंब हो जाता है। ऐसे में दोपहर 12.08 से 12.57 बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। वह समय भी घट स्थापना कर पूजा प्रारंभ करने के लिए उपयुक्त है। इस दौरान पूजा-अनुष्ठान की दो प्रचलित विधियां हैं। पहले में भक्तजन इन नौ दिनों तक सात्विक भोजन करते हैं। दूसरे में आठ दिन तक व्रत रखकर नौवें दिन कन्या पूजन व भोजन के बाद व्रत समाप्त करते हैं। कुछ लोग आठवें दिन ही व्रत का पारण कर लेते हैं। यह उचित नहीं है क्योंकि नौ दिन तक देवी विराजमान रहती हैं। उनकी पूजा चलती रहती है। दशमी के दिन विसर्जन किया जाता है।

मां दुर्गा के वाहन

मैंने ऊपर ही लिखा है कि इस बार माता घोड़े पर आएंगी। उनके वाहन का निर्धारण और फल के बारे में विभिन्न ग्रंथों में लिखा हुआ है। मैं उनमें से देवी भागवत का अधिक महत्व देता हूं। देवी भागवत के अनुसार—

शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।

गुरौ शुक्रे चदोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता।

अर्थात- जब मां हाथी पर सवार होकर धरती पर आती हैं तो बारिश अधिक होती है। घोड़े पर सवार होकर आती हैं तो युद्ध और उपद्रव के हालात पैदा होते हैं। सरकार गिरने का खतरा रहता है। जब वे नौका पर सवार होकर आती हैं तो सब अच्छा होता है और शुभ फलदायी होता है। अगर मां डोली में बैठकर आती हैं तो महामारी, संहार का खतरा रहता है। चूंकि इस बार मां घोड़े पर आ रही हैं। इसका संकेत रूस-यूक्रेन युद्ध के और भड़कने का है। निश्चय ही इसका असर कई अन्य देशों पर भी पड़ेगा।

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