Home त्रिपुर भैरवी पांचवीं महाविद्या त्रिपुर भैरवी संकटों का नाश करती हैं

पांचवीं महाविद्या त्रिपुर भैरवी संकटों का नाश करती हैं

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पांचवीं महाविद्या त्रिपुर भैरवी संकटों का नाश करती हैं
संकटों का नाश करने वाली पांचवीं महाविद्या त्रिपुर भैरवी।

Tripur Bhairvi destroys crisis : पांचवीं महाविद्या त्रिपुर भैरवी संकटों का नाश करती हैं। ये जन्म, पालन व संहार की देवी हैं। इनके रूप व नाम कई हैं। इनमें बाला, भैरवी व सुंदरी प्रचलित हैं। उग्र होने के बावजूद शीघ्र प्रसन्न होती हैं। भक्तों को सिद्धि प्रदान करने वाली हैं। सभी महाविद्याएं अत्यंत कृपालु हैं। अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करती हैं। भक्तिभाव से की गई पूजा से प्रसन्न होती हैं। इनकी साधना से सिद्धि व मोक्ष दोनों मिलती है।

साधना करने वालों के लिए गुरु का साथ जरूरी

महाविद्याओं की साधना कठिन होती है। इसके लिए साधक का स्तरीय होना जरूरी है। अर्थात किसी बीज मंत्र का कम से कम दस लाख जप किया हो। उचित यह होगा कि महाविद्या की साधना में क्रम का पालन किया जाए। अर्थात पहले दसवीं फिर नौवीं महाविद्या की साधना करें। इसके बाद ऊपर के क्रम में बढ़ें। सामान्य पूजन व अनुष्ठान में यह शर्त लागू नहीं होती है।

तीन रूप की तरह तीन बीज मंत्र

तीन रूप की तरह इनके बीज मंत्र भी तीन हैं। ये क्रमश: ह्स्रैं, ह्स्कल्रीं एवं ह्स्रौं: हैं। इनका त्रिकुटा मंत्र ही सबसे ज्यादा प्रचलित है। पांच व्यंजनों से रचित होने के कारण त्रिपुर भैरवी का यह मंत्र पंचकूटा भी कहा जाता है। देश में इनके कई मंदिर हैं। इनमें जबलपुर के पास त्रिपुरी स्थित मंदिर को पीठ माना जाता है।

त्रयक्षरी मंत्र

ह्स्रैं, ह्स्कल्रीं एवं ह्स्रौं:।

विनियोग

अस्य मंत्रस्य दक्षिमामूर्ति ऋषि:। पंक्तिश्छंदः। त्रिपुरभैरवी देवता। ऐं बीजम्। सौ: (तार्तीय) शक्ति:। क्लीं कीलकम। सर्वार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।

न्यास

नाभि से पैर तक छूते हुए ह्स्रैं नम:। हृदय से नाभि तक छूते हुए ह्स्कल्रीं नम:। मस्तक से हृदय तक ह्स्रौं: नम: से न्यास करें। ह्स्रैं नम: दक्ष हस्ते। ह्स्कल्रीं नम: वाम हस्ते। ह्स्रौं: नम: करयो। ह्स्रैं नम: शिरसि। ह्स्कल्रीं नम: मूलाधारे। ह्स्रौं: नम: हृदय से न्यास करें।

ध्यान

उद्यद्भानुसहस्रकांतिमरुणक्षौमां शिरोमालिकाम्,

रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।

हस्ताब्जैदधतीं त्रिनेत्र विलसद्रक्तारविंद श्रियमं,

देवीं बद्धहिमांशुरक्तमुकुटां वंदेरविंद स्थिताम्।।

जप विधि और फल

किसी एक मंत्र का दस लाख जप करें। फिर 12 हजार हवन से पुरश्चरण होता है। हवन में ढाक के फूलों का प्रयोग करें। इससे मंत्र सिद्ध होता है। इसका उपयोग बेकार नहीं जाता है। भीषण संकट में ही प्रयोग करना चाहिए। माता की साधना से वाक् सिद्धि होती है। आध्यात्मिक उन्नत्ति में पांचवीं महाविद्या त्रिपुर भैरवी प्रभावी हैं।

अन्य उपयोगी मंत्र

सकलसिद्धिदा भैरवी मंत्र

स्हैं स्हक्लीं स्हौं

निर्भय विध्वंसिनी भैरवी

हस्रैं हस्स्स्रीं हसौं

चैतन्य भैरवी

इसे त्रैलोक्यमातृका चैतन्य भैरवी विद्या भी कहते हैं।

स्हैं स्कल्ह्रीं स्ह्रौं।

जप विधि और फल

किसी भी मंत्र का ढाई लाख जप करें। दसवें भाग (25 हजार) का हवन करें। हवन में ढाक के फूलों का प्रयोग करें। पांचवीं महाविद्या त्रिपुर भैरवी नाम के अनुरूप ही फल प्राप्त होते हैं।

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