कर्म बनते हैं भाग्य का आधार : विचार प्रवाह

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कर्म बनते हैं भाग्य का आधार : विचार प्रवाह
कर्म बनते हैं भाग्य का आधार : विचार प्रवाह।

Karma decides your destiny : कर्म बनते हैं भाग्य का आधार। विचार प्रवाह में पढ़ें प्राचीनकाल से विवादित रहे कर्मफल के बारे में। धर्मग्रंथों में इस पर विरोधी जानकारी है। यह मनुष्य को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला विषय है। कर्मकांड इसी पर टिका है। जानें कि क्या मनुष्य के सुख-दुख का कारण उसके पूर्व जन्म के कर्म होते हैं? या क्या मनुष्य ईश्वर की इच्छा से सारे कर्म करता है? यदि ईश्वर की इच्छा से कर्म करता है तो फिर उस कर्म के लिए दोषी करार नहीं दिया जा सकता। यदि वह स्वयं कर्म करता है तो फिर कर्म में ईश्वर की इच्छा का कोई अर्थ नहीं। महाभारत में भी ऐसा प्रसंग है। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को उसके दुष्कृत्यों की सजा भोगने की चेतावनी दी। तब दुर्योधन ने कहा कि केशव, आप ही मुझ से सब कुछ करवा रहे हैं। फिर मैं दोषी कैसे और सजा क्यों?

पूर्वजन्म के कर्मफल का सिद्धांत विवादित

इस विवाद का हल आसान नहीं है। स्वामी विवेकानंद समेत कई विद्वान पूर्वजन्म के कर्मों के फल के सिद्धांत से पूरी तरह से सहमत नहीं थे। यह सिद्धांत उनके गले नहीं उतरा कि मात्र पूर्व जन्म के कर्मों के कारण ही लोग वर्तमान जन्म में सिर्फ दुख भोगते हैं। उन्हें सुधार का भी अवसर नहीं मिल पाता है। प्रकृति के इस कथित अन्याय पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया जताई थी। कहा था कि उन्होंने विभिन्न जगहों पर ऐसे कई लोगों को देखा है जो जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत दुख ही भोगते रहे हैं। उन्हें खुद को सुधारने या बेहतर कर्म करने का मौका ही नहीं मिला। उन्होंने कहा कि लगता है कि ऐसे लोगों का जन्म ही दुख भोगने के लिए होता है। मेरा मानना है कि यह विचार उनके प्रारंभिक जीवन का है। बाद में इसमें अवश्य परिवर्तन हुआ होगा। हालांकि ऐसा कोई साक्ष्य या कथन उपलब्ध नहीं है।

ठग धर्मगुरुओं ने भी खूब आडंबर फैलाया

दो राय नहीं कि कर्म बनते हैं भाग्य का आधार। पुनर्जन्म के सिद्धांतों को खारिज करने वाले धर्मों में भी यह बात आती है कि जो जैसा करेगा, वह वैसा भरेगा। इसलिए इसमें कोई संशय नहीं कि कर्मों के फल से बचा नहीं जा सकता है। वर्तमान कर्म से उसे कम या अधिक किया जा सकता है। मौजूदा समय में लोगों में इस विषय पर भ्रम का एक बड़ा कारण है। अकसर देखने में आता है कि बेईमान और अपराधी लोग परिवार समेत सुख से रहते हैं। दूसरी ओर ईमानदार मुश्किलों का सामना करते रहते हैं। इस समस्या को लेकर किसी धर्माचार्य के पास जाइए तो वे आपको एक अलग ही तरह की बात बताते हैं। वे हर प्रकार से आपका ब्रेनवाश करना चाहते हैं। कहते हैं, ईश्वर आपकी परीक्षा ले रहा है। दरअसल इस मसले पर ठग धर्मगुरुओं ने खूब आडंबर फैला रखा है।

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अयोग्य लोगों के पास नहीं होता सरल बातों का भी जवाब

चूंकि अधिकतर ठग धर्माचार्य अयोग्य हैं। उनके पास सरल बातों का भी सटीक जवाब नहीं होता है। उनसे पूछें कि ईश्वर कितने दिनों तक परीक्षा लेते हैं? और सिर्फ ईमानदारी से जीवन गुजारने वालों की ही परीक्षा क्यों लेते हैं? धर्म की दुकान चलाने वाले इसका तार्किक जवाब नहीं दे सकेंगे। सत्य तो यह है कि जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा फल मिलना तय है। संभव है कि पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप हमें इस जन्म में लक्ष्य प्राप्ति में आसानी हो या बाधाएं आकर परेशान करें। लेकिन लगातार किया कर्म कभी बेकार नहीं जा सकता है। प्रकृति का कार्यकारिणी नियम अपना असर दिखाएगा ही। वर्तमान कर्म का फल पिछले कर्मों को जोड़ते हुए कम या अधिक अवश्य मिलेगा। गरीबी में रहने वाले अधिकतर लोग वहीं वैसे ही जिंदगी गुजार लेते हैं। उनमें कर्मयोगी कुछ ऐसा कर जाते हैं जिससे उनका भाग्य बदल जाता है।

कार्यकारिणी नियम में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता

प्रकृति के कार्यकारिणी नियम अटल है। जैसे हर क्रिया के विपरीत समान प्रतिक्रिया होती है, वैसे ही कर्म के फल में होता है। हमारे कर्म बनते हैं भाग्य का आधार। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। ईश्वर भी नहीं। यदि वह अपने बनाए नियम में ही हस्तक्षेप करने लगे तो पूरी सृष्टि अस्त-व्यस्त हो जाएगी। यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह कर्मयोगी बन कर प्रकृति के कार्यकारिणी नियम को अपने पक्ष में झुका ले। या भाग्य और ईश्वर की इच्छा का रोना रोते हुए दुखपूर्वक जीवन गुजारे। किसी धर्म में एवं धर्माचार्य के पास गरीबी, शोषण, असमानता, दुर्भाग्य आदि से निपटने का कोई रामबाण नहीं है। लोगों को सिर्फ दुर्भाग्य को दूर करने के लिए बड़े-बड़े पाखंडपूर्ण कार्य करवाए जाते हैं। लेकिन, नतीजा ढाक के तीन पात। अधिकतर धर्माचार्यों में अहंकार और भेदभाव भरा होता है। ऐसे भटके लोगों से कल्याण की आशा व्यर्थ है।

ऋषि चार्वाक नहीं मानते थे पूर्वजन्म की अवधारणा

अथर्व वेद के एक भाग के रचयिता ऋषि चावार्क का सिद्धांत है- यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:। अर्थात- मनुष्य जब तक जीवित रहे तब तक सुखपूर्वक जीये। ऋण करके भी घी पीये। उनका साफ संदेश है कि सुख-भोग के लिए हर उपाय करें। दूसरों से भी उधार लेकर भौतिक सुख-साधन जुटाने में हिचकें नहीं। परलोक, पुनर्जन्म और आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करें। भला जो शरीर मृत्यु के पश्चात् भष्मीभूत हो जाए, राख हो जाए, उसके पुनर्जन्म का सवाल ही कहां उठता है। उन्होंने यहीं बस नहीं किया। कहा कि कुछ ऋषियों ने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों का भ्रम फैलाया है। चार्वाक ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते थे। उनकी बात यदि सही नहीं है तो पूरी तरह से खारिज भी नहीं की जा सकती है।

वर्तमान स्थिति भी चर्वाक विचार के पक्ष में

आसपास चारों ओर नजर दौड़ाएं। पाएंगे कि कर्मकांड से दूर रहने वाले शीर्ष पर काबिज हैं। उन्हें सारे सुख उपलब्ध हैं। धार्मिक लोग कायर और भीरू माने जाते हैं। विकसित देशों में लक्ष्मी की पूजा नहीं होती। वहां बिल गेट्स और जैक मा जैसे धनकुबेर पैदा होते हैं। सरस्वती की पूजा नहीं करते, लेकिन न्यूटन, आइंस्टीन, स्टीफन हॉकिंग और स्टीव जॉब्स बन जाते हैं। शक्ति की पूजा किए बिना क्रमशः अमेरिका, रूस और चीन सबसे शक्तिशाली हैं। पहले हम भी सर्वसंपन्न थे। अब हर तरह से विपन्न क्यों हैं? कारण साफ है। कर्म बनते हैं भाग्य का आधार। भारतीय, विशेष रूप से सनातनी पाखंडियों के चंगुल में फंसकर धर्म के नाम पर बेवकूफ बनाए जाते हैं। कृपा बरसने की आशा लगाए रहते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि धर्म बेकार है। हां, धर्म के नाम पर जिस तरह का कर्मकांड और पाखंड फैलाया जा रहा है वह बेकार है।

मूल सवाल- कैसे कर्म बनते हैं भाग्य का आधार

फिर लौटें उस सवाल पर कि क्या स्वामी विवेकानंद, महात्मा बुद्ध सरीखे महामानवों का सिद्धांत ठीक है कि यह संसार दु:खों से परिपूर्ण है। इसमें दुखों के सिवा कुछ भी नहीं है। यहां मैं उनसे असहमत हूं। सत्य यह है कि हर व्यक्ति कर्म करने और तदनुसार फल पाने के लिए स्वतंत्र है। कर्म बनते हैं भाग्य का आधार। गीता में श्रीकृष्ण ने कर्म का ही संदेश दिया था। कर्म करके ही भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्राप्ति की बात कही है। आदि शंकराचार्य का सांख्य योग दर्शन भी कर्म की बात करता है। हां, उसके कर्म में अहंकार और कर्ता भाव को त्यागने का संदेश है। प्रकृति का कार्यकारिणी नियम अटल है। मनुष्य का हर कर्म (शारीरिक और मानसिक) प्रकृति को प्रभावित करता है। फिर कार्यकारिणी नियम के तहत वह किसी न किसी रूप में कर्ता तक लौटता है। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता, ईश्वर भी नहीं।

सत्य निष्ठा से लक्ष्य प्राप्ति के लिए परिश्रम ही धर्म है

धर्म की दुकान चलाने वाले कथित धर्माचार्यों के कारण इन दिनों सनातन धर्म में अकर्मन्यता, पाखंड और कुरीतियों का बोल-बाला है। अधिकतर लोग धर्म, पंथ और मूल कर्म के अंतर को समझ ही नहीं पाते हैं। कोई समोसे खाकर भाग्य चमकाने की कोशिश में है तो कोई अपने पाखंडी गुरु के नाम का जप कर रहा है। ध्यान रहे कि धर्म का मूल सिद्धांत इस लोक को सुधारते हुए परलोक को सुधारना है। अर्थात कर्म प्रधान है। प्राचीन धर्मग्रंथों में गृहस्थ जीवन को सर्वोपरि माना गया है। वही ऋषियों और संन्यासियों का भी पालनहार होता है। ऋषि और संन्यासी भी कहीं न कहीं देश, समाज और युवा पीढ़ी में ज्ञान-विज्ञान और जागरूकता फैलाने का काम करते थे। धर्म कर्तव्य पथ से विचलित होकर तप, त्याग, तपस्या या कायरता की प्रेरणा नहीं देता है। वह ईमानदारी से कड़ी मेहनत करके लक्ष्य पाने का संदेश देता है।

संदर्भ ग्रंथ- गीता, महाभारत, शंकराचार्य के विचार, विवेकानंद के विचार, चार्वाक के विचार।

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