जानें ध्यान के चमत्कार और उपयोगिता

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ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन
ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन।

know magic of meditation : आध्यात्मिक उत्थान के इच्छुक लोगों के लिए जरूरी है कि वे जानें ध्यान के चमत्कार को। चूंकि ध्यान ही बीज है। ध्यान से परमात्मा की जागृति संभव है। बीज अपने-आप में सार्थक और पूर्ण नहीं होता। वह तो साधन मात्र है। उसमें वृक्ष बनने की संभावना है। जैसे एक यात्रा पूरी कर बीज वृक्ष बनकर सफल हो जाता है। उसी तरह मनुष्य ध्यान से अपने अंदर की परमात्मा की जागृति होती है। इस रहस्य को समझने के लिए बीज की स्थिति को ठीक से समझना जरूरी है। लोग परमात्मा के संबंध में निरंतर प्रश्न पूछते हैं। उन्हें जानना चाहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि वे जानें ध्यान के चमत्कार को।

ध्यान भीतर का स्नान है 

जैसे स्नान से शरीर ताजा हो जाता है। धूल, कूड़ा-करकट शरीर से बह जाता है। ऐसे ही ध्यान भीतर का स्नान है। भीतर जब सब निर्मल और ताजा हो जाता है। फिर कैसी अशांति, कैसा दुख और कैसी चिंता? तब जीव पुलकित हो जाता है। पहले वह उदास, थका और परेशान रहता है। वह सोचता है कि उसकी अशांति के कारण बाहर हैं। जबकि अशांति का एक ही कारण है कि ध्यान के बीज को वृक्ष नहीं बनाया।

बाहर हम लाख उपाय करें। हमें धन, पुत्र, यश, अच्छा स्वास्थ्य मिल जाए तो क्या होगा? ऊपर तो सब मिल जाएगा लेकिन इनसे मन की अशांति नहीं मिटेगी। जितनी भी चीजें हमें मिलेंगी, उतनी ही भूख और अशांति बढ़ने लगेगी। खुद विचार करें कि गरीब आदमी कम और अमीर ज्यादा अशांत क्यों होता है? क्योंकि वह मूल तत्व को नहीं जानता है। मूल तत्व को जानने के लिए जानें ध्यान के चमत्कार को।

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सवाल यह है कि अमीरी से अशांति क्यों बढ जाती है?

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 जवाब सरल है। 

ध्यान बीज है

जीवन के लक्ष्य की खोज में और सत्य के मंदिर तक पहुंचने में ध्यान ही बीज है। ध्यान का इतना मूल्य है कि खिल जाएगा तो जीव परमात्मा हो जाएगा। यूं ही पड़ा रहा तो बेकार और सड़ जाएगा। तब मनुष्य नारकीय जीवन व्यतीत करेगा। ध्यान निर्विचार चैतन्य की अवस्था है, जहां होश तो पूरा हो और विचार बिलकुल न हो। जीव रहे, लेकिन मन न बचे। दूसरे शब्दों में मन की मृत्यु ही ध्यान है।

हम अभी हम नहीं हैं। अभी तो मन ही मन है। इससे उलटा हो जाए कि हम ही बचें और मन बिलकुल न बचे।

गरीब भी अशांत होता हैं । रोटी, कपड़ा और मकान की तलाश में उसकी इतनी ऊर्जा चली जाती है कि अपने भीतर की अशांति को देखने के लिए न समय बचता है और न शक्ति बचती। अमीर की बाहर की जरूरतें पूरी हो जाती हैं, तो सारी शक्ति बची रहती है। उसे भीतर की जरूरत का ध्यान आता है। इसलिए अमीर को अशांति कांटे की तरह चुभने लगती है

मनुष्य की सारी ऊर्जा मन पी लेता है। अभी जीवन की जो भी शक्ति है, वह मन चूस लेता है। जैसे-अमरबेल जब वृक्ष को पकड़ लेती है तो वह सूखने लगता है। दूसरी ओर बेल जीने और फैलने लगती है। मन भी ठीक वैसा ही है। मन की तरह अमरबेल की कोई जड़ नहीं; क्योंकि उसे जड़ की जरूरत ही नहीं है। वह दूसरे के शोषण से जीती है। वृक्ष को सुखाने लगती है, खुद जीने लगती है। ठीक उसी तरह मन भी मरता नहीं है। वह अनंतकाल तक जी सकता है। जन्मों-जन्मों तक जीव का पीछा करता रहता है। वह जीव का शोषण करके जीता है।

मन की मृत्यु ही समाधि है

मनुष्य का मन उसे बस उतना ही देता है, जितने में वह जीवित रह सके। उसकी 99 प्रतिशत ऊर्जा वह पी लेता है। मतलब एक प्रतिशत में हम हैं और 99 प्रतिशत में मन है। यह गैर ध्यान की अवस्था है। ध्यान की अवस्था में हम 99 प्रतिशत और मन एक प्रतिशत होता है। अगर मनुष्य सौ प्रतिशत हो जाए तो मन शून्य हो जाता है। यही समाधि की अवस्था है। ध्यान का अर्थ है, जहां मन न के बराबर रह जाए। समाधि का अर्थ है, जहां मन शून्य हो जाए, हम ही हम बचें। मरते क्षण भी मनुष्य मन से ही भरा रहता है। वह पूजा करे, प्रार्थना करे, तीर्थयात्रा करे लेकिन मन साथ रहता है। और, जहां मन साथ होगा, वहां धर्म से संबंध नहीं जुड़ पाएगा।

अहंकार सबसे बड़ा शत्रु

मैं के भाव के साथ जब आदमी पूजा और प्रार्थना करता है, तो सफल नहीं होता। मन में ज्यादा धार्मिक कार्यक्रमों को करने से अहंकार होने लगता है। अपने ध्यान की चर्चा लोगों से बढ़-चढ़ कर करता है। जबकि उसे इस तरह से संभाला जाए, जैसे कोई बहुमूल्य हीरा मिल गया हो। जैसे लोग हीरा को संभाल कर छुपा कर रखते हैं। उसे सरे बाजार उछालते और प्रदर्शनी नहीं लगाते हैं। उसी तरह ध्यान को भी गुप्त रखना चाहिए। यह तो धन-संपत्ति से भी ज्यादा बहुमूल्य है। उसकी चर्चा से मन में अहंकार आने लगता है। अर्थात मन की बेल वहां भी पहुंच कर उसे चूस लेती है। और जहां मन पहुंच जाता है, वहां धर्म नहीं है। मन बाहतृखा है। उसका ध्यान दूसरे पर होता है, अपने पर नहीं होता। ध्यान अंतर्मुखता है। ध्यान का अर्थ है-अपने पर ध्यान। मन का अर्थ है-दूसरे पर ध्यान।

(क्रमश:)

प्रस्तुति- राजीव रंजन ठाकुर

यह भी पढ़ें- ध्यान के चमत्कार- 2

 

हम अभी हम नहीं हैं। अभी तो मन ही मन है। इससे उलटा हो जाए कि हम ही बचें और मन बिलकुल न बचे।

गरीब भी अशांत होता हैं । रोटी, कपड़ा और मकान की तलाश में उसकी इतनी ऊर्जा चली जाती है कि अपने भीतर की अशांति को देखने के लिए न समय बचता है और न शक्ति बचती। अमीर की बाहर की जरूरतें पूरी हो जाती हैं, तो सारी शक्ति बची रहती है। उसे भीतर की जरूरत का ध्यान आता है। इसलिए अमीर को अशांति कांटे की तरह चुभने लगती है

मनुष्य की सारी ऊर्जा मन पी लेता है। अभी जीवन की जो भी शक्ति है, वह मन चूस लेता है। जैसे-अमरबेल जब वृक्ष को पकड़ लेती है तो वह सूखने लगता है। दूसरी ओर बेल जीने और फैलने लगती है। मन भी ठीक वैसा ही है। मन की तरह अमरबेल की कोई जड़ नहीं; क्योंकि उसे जड़ की जरूरत ही नहीं है। वह दूसरे के शोषण से जीती है। वृक्ष को सुखाने लगती है, खुद जीने लगती है। ठीक उसी तरह मन भी मरता नहीं है। वह अनंतकाल तक जी सकता है। जन्मों-जन्मों तक जीव का पीछा करता रहता है। वह जीव का शोषण करके जीता है।

मन की मृत्यु ही समाधि है

मनुष्य का मन उसे बस उतना ही देता है, जितने में वह जीवित रह सके। उसकी 99 प्रतिशत ऊर्जा वह पी लेता है। मतलब एक प्रतिशत में हम हैं और 99 प्रतिशत में मन है। यह गैर ध्यान की अवस्था है। ध्यान की अवस्था में हम 99 प्रतिशत और मन एक प्रतिशत होता है। अगर मनुष्य सौ प्रतिशत हो जाए तो मन शून्य हो जाता है। यही समाधि की अवस्था है। ध्यान का अर्थ है, जहां मन न के बराबर रह जाए। समाधि का अर्थ है, जहां मन शून्य हो जाए, हम ही हम बचें। मरते क्षण भी मनुष्य मन से ही भरा रहता है। वह पूजा करे, प्रार्थना करे, तीर्थयात्रा करे लेकिन मन साथ रहता है। और, जहां मन साथ होगा, वहां धर्म से संबंध नहीं जुड़ पाएगा।

अहंकार सबसे बड़ा शत्रु

मैं के भाव के साथ जब आदमी पूजा और प्रार्थना करता है, तो सफल नहीं होता। मन में ज्यादा धार्मिक कार्यक्रमों को करने से अहंकार होने लगता है। अपने ध्यान की चर्चा लोगों से बढ़-चढ़ कर करता है। जबकि उसे इस तरह से संभाला जाए, जैसे कोई बहुमूल्य हीरा मिल गया हो। जैसे लोग हीरा को संभाल कर छुपा कर रखते हैं। उसे सरे बाजार उछालते और प्रदर्शनी नहीं लगाते हैं। उसी तरह ध्यान को भी गुप्त रखना चाहिए। यह तो धन-संपत्ति से भी ज्यादा बहुमूल्य है। उसकी चर्चा से मन में अहंकार आने लगता है। अर्थात मन की बेल वहां भी पहुंच कर उसे चूस लेती है। और जहां मन पहुंच जाता है, वहां धर्म नहीं है। मन बाहतृखा है। उसका ध्यान दूसरे पर होता है, अपने पर नहीं होता। ध्यान अंतर्मुखता है। ध्यान का अर्थ है-अपने पर ध्यान। मन का अर्थ है-दूसरे पर ध्यान।

(क्रमश:)

प्रस्तुति- राजीव रंजन ठाकुर

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