पंच तत्व का मानव शरीर व ज्योतिष पर प्रभाव जानें

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ज्ञानवापी में मंदिर के पक्ष में कई अकाट्य तर्क
ज्ञानवापी में मंदिर के पक्ष में कई अकाट्य तर्क।

Know the effect of five elements on the human body and astrology : पंच तत्व का मानव शरीर व ज्योतिष पर प्रभाव जानें। इस विषय और ब्रह्मांड की समानता पर पुराणों तथा धर्मग्रंथों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्मांड में है, वही मानव शरीर में भी है। ब्रह्मांड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। इसी कारण आत्मा को परमात्मा का ही संक्षिप्त रूप कहा जाता है। अहम् ब्रह्मास्मि इसका चरम लक्ष्य है। सौरमंडल को ज्योतिष भली-भांति जानता है। इसी में व्याप्त पंचतत्वों-जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु तथा आकाश से मानव का निर्माण हुआ है। मानव ही क्यों पूरी प्रकृति, जीव-जंतु सभी का निर्माण इसी से हुआ है। ज्योतिष शास्त्र ने भी ग्रहों में अलग-अलग तत्वों को पाया है। अच्छे ज्योतिषी अपनी गणना और उपाय में इस आधार का भी सहारा लेते हैं। अब पढ़ें तत्वों और ग्रहों के संबंध और प्रभाव के बारे में।

सूर्य व मंगल अग्नि और शुक्र व चंद्र जल तत्व के कारक

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य व मंगल अग्नि और शुक्र व चंद्र जल तत्व के कारक है। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा तथा जीने की शक्ति का कारक है। इसकी कमी शरीर और जीवन के विकास को अवरुद्ध कर देती है। ऐसे जातक में रोगों से लड़ने की शक्ति भी कम रहती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व के कारक हैं। शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में जल सबसे अधिक होता है। यह पोषण करता है। इसकी कमी आलस्य व तनाव उत्पन्न कर शरीर की संचार-व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनों चंचल हैं, इसलिए चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है। शुक्राणु जल में ही जीवित रहते हैं, जो सृष्टि के विकास व निर्माण में महत्वपूर्ण हैं। ‘शुक्र’ काम जीवन का कारक है। यही कारण है कि शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहूर्त नहीं निकलते हैं।

बुध पृथ्वी, गुरु व राहु आकाश एवं शनि वायु तत्व से संबंधित

पंच तत्व का मानव पर प्रभाव में अब जानें गुरु, राहु, शनि व केतु के बारे में। गुरु एवं राहु आकाश तत्व से संबंध रखते हैं। ये जातक में नैतिक गुण व आध्यात्मिक जीवन को प्रभावित करते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक है। यह बुद्धि क्षमता तथा निर्णय लेने की शक्ति देता है। इसकी कमी बुद्धिमत्ता तथा निर्णय क्षमता पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व का कारक है। शरीर में व्याप्त वायु पर इसका आधिपत्य है। केतु का फल मंगल की तरह होता है। हर मनुष्य में आत्मा, मन, बल, वाणी, ज्ञान, काम तथा दुःख विद्यमान होते हैं। यह ग्रहों पर निर्भर करता है कि इनकी मात्रा कितनी है। विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर, क्योंकि आत्मा से शरीर है। यह सूर्य का क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, मंगल- बल। बुध-वाणी, गुरु-ज्ञान, शुक्र-काम तथा दुःख पर शनि का आधिपत्य है।

मनोविज्ञान, चिकित्सा, आयुर्वेद और ज्योतिष

मनोविज्ञान के अनुसार मानव की चार मूल प्रवृत्तियां हैं। वे हैं- भय, भूख, यौन और सुरक्षा का भाव। भय पर शनि और केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य एवं बृहस्पति व यौन पर शुक्र निर्णायक होते हैं। सुरक्षा भाव पर चंद्र, मंगल तथा बुध का प्रभाव है। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी ब्रह्मांड के ग्रहों से सीधा संबंध है। शरीर की हड्डियों पर सूर्य, खून पर चंद्रमा, शरीर के मांस पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायु मंडल का शनि से संबंध है। राहु और केतु का संबंध चेतना से है। आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य त्रिदोषों-वात, पित्त और कफ से पीड़ित होता है। वही विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होता है। ग्रहों के अनुसार सूर्य व मंगल- पित्त, चंद्रमा- कफ, शनि- वायु, बुध- त्रिदोष, शुक्र- कफ एवं वात तथा गुरु- कफ और पित्त के अधिपति हैं।

क्रमशः (अगले अंक में पढ़ें पंच तत्वों के अनुसार शरीर रचना, वात, पित्त व कफ के साथ उनसे जुड़े ग्रहों के प्रभाव के बारे में)

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