ध्यान से आध्यात्मिक चेतना के चमत्कार

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ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन
ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन।

Miracles of spiritual consciousness by meditation : ध्यान से आध्यात्मिक चेतना के चमत्कार को अनुभव कर सकते हैं। आज के युग में तीर्थ अपना महत्व, स्वरूप और उपयोगिता खो चुके हैं। वे अपने-आप में कभी बहुत महत्वपूर्ण भी नहीं थे। उन्हें महत्वपूर्ण बनाया था, वहां रहने वाले सच्चे साधु-संतों, तीर्थंकरों और विद्वानों ने। अब वे रहे नहीं, उनके वेशधारी ही बचे हैं। उनमें किसी का कल्याण करने, उन्हें बीज से वृक्ष बनाने की ताकत नहीं है। वे अपनी ही आध्यात्मिक चेतना नहीं जगा सके हैं। जो सक्षम हैं वे अपनी पहचान छुपाए एकांत साधन में लीन हैं। ऐसे में भ्रमित लोगों ने गुरुओं के बदले उनके प्रतीक, प्रतिमा की पूजा शुरू कर दी है। कुछ पाखंडियों के फेर में पड़ गए हैं। समय की मांग है कि ध्यान से स्वयं आध्यात्मिक चेतना जगाने का प्रयास करें।

खोने को कुछ नहीं सिर्फ पाना है

लोगों को समझना होगा कि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। मात्र पाना है। जिस भौतिक सुख के पीछे वे भाग रहे हैं, उसका छोटा हिस्सा भी उनके साथ नहीं जाएगा। भौतिक सुख से कभी तृप्ति नहीं मिलेगी। इसलिए श्रद्धावान बनें। श्रद्धा यह देखती है कि मेरे पास अभी क्या है? तर्क देखता है कि भविष्य में क्या होगा? सच यह है कि जीव के पास भौतिक जगत में अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं है। जिस धन-संपदा को अपना मानते हैं, उसकी सीमा शरीर रहने तक ही है। दूसरी ओर ध्यान के माध्यम से अंदर की यात्रा से मिलने वाला सुख असीमित है। वह आत्मा को परमात्मा से मिलाकर ब्रह्मांड के सारे बंधन से ऊपर उठ जाता है। यात्रा शुरू हुई नहीं कि आत्मा का पात्र भरने लगा। तब ध्यान से आध्यात्मिक चेतना के चमत्कार को अनुभव किया जा सकता है।

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बीज सिर्फ खोल है

वास्तव में बीज के पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं है। वह एक खोल मात्र है। ऐसे ही रहेगा तो सड़ जाएगा और बेकार हो जाएगा। जब खोल टूटेगी तब सब कुछ संभव हो जाएगा। परमात्मा से मिलन संभव हो सकेगा। जिस दिन तुम्हारे अंदर ध्यान का बीज फूटेगा, खोल टूटेगी और नया जन्म होगा। उस दिन मनुष्य ज्ञान की धारा बन जाएगा। वह चैतन्य हो जाएगा। उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं रह जाएगा। इसी को बुद्धत्व कहा जाता है। बुद्धत्व का अर्थ है- जागा हुआ आदमी। दूसरे शब्दों में कहें तो आत्मा का परमात्मा हो जाना। यही है अहम ब्रह्मोस्मि। यही मानव जीवन का चरम लक्ष्य है। जिसने इसे पा लिया, उसके लिए जन्म-जन्मांतर का चक्र भी बेकार है। सभी बंधन से परे वह अपनी इच्छानुसार ब्रह्मांड में कभी भी, कहीं की भी यात्रा कर सकता है। वह परमात्मा रूप हो जाता है।

ध्यान के चमत्कार- 4

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