हनुमान चालीसा और उसके अर्थ जानें, उठाएं फायदा

477
हनुमान चालीसा और उसके अर्थ जानें, उठाएं फायदा
हनुमान चालीसा और उसके अर्थ जानें, उठाएं फायदा।

Learn Hanuman Chalisa and its meaning : हनुमान चालीसा और उसके अर्थ जानें। कुछ दिन पूर्व मैंने हनुमान चालीसा के बेहद उपयोगी होने की जानकारी दी थी। साथ ही प्रयोग विधि भी दी थी। उसमें अर्थ को समझते हुए पाठ करने के लिए कहा गया था। इसके बाद कई पाठकों ने अर्थ की जानकारी मांगी थी। उनकी सुविधा के लिए मैं इसमें हनुमान चालीसा पाठ और उसके अर्थ दे रहा हूं। ताकि पाठक उसकी मदद से पाठ कर भरपूर फायदा उठा सकें। पुनः याद दिला दूं कि हर शब्द का अर्थ जानते हुए भाव सहित पाठ करने पर ही हनुमान चालीसा का पूरा फायदा उठाया जा सकता है। यह अत्यंत उपयोगी है। इससे आप हर मनोकामना पूरी कर सकते हैं। खासकर संकट नाश में यह बेजोड़ है।

हनुमान चालीसा पाठ के बारे में

प्रस्तुत है अर्थ सहित श्री हनुमान चालीसा। ऊपर चालीसा की चौपाई और नीचे उसके अर्थ हैं। पाठ करते समय सिर्फ चौपाई का ही पाठ करें। उसमें कोई व्यवधान नहीं हो। बेहतर होगा कि हनुमान चालीसा की पुस्तक लेकर सीधे पाठ करें। इससे पाठ करने में आसानी होगी। इस लेख को पढ़कर उसके अर्थ को ठीक से समझ लें। इससे हनुमान चालीसा और उसके अर्थ को जानने में आसानी होगी।

पहली चौपाई और उसके अर्थ

श्री गुरु चरण सरोज रज,निज मन मुकुरु सुधारि।बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।

अर्थ : गुरु महाराज के चरण। कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाले हैं।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार।बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।

अर्थ : हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप निर्बल बुद्धि मानकर शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दु:खों व दोषों का नाश कर दीजिए।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर,जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥1॥

अर्थ : श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।

दूसरी से छठी चौपाई और अर्थ

राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा ॥2॥

अर्थ : पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।

महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी ॥3॥

अर्थ : हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले हैं। आप खराब बुद्धि को दूर करते हैं, और अच्छी बुद्धि वालों के साथी और सहायक हैं।

कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुंडल कुंचित केसा ॥4॥

अर्थ : आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।

हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥5॥

अर्थ : आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।

शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन ॥6॥

अर्थ : हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर में वंदना होती है।

नोट-आशा करता हूं कि आपको हनुमान चालीसा और उसके अर्थ समझ में आ रहा होगा।

अर्थ सहित सातवीं से दसवीं चौपाई 

विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर ॥7॥

अर्थ :  आप प्रकांड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया ॥8॥

अर्थ : आप श्री राम चरित सुनने में आनंद रस लेते हैं। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय में बसे रहते हैं।

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा ॥9॥

अर्थ : आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके लंका को जलाया।

भीम रुप धरि असुर संहारे,रामचन्द्र के काज संवारे ॥10॥

अर्थ : आपने विकराल रुप धारण करके राक्षसों को मारा और श्री रामचंद्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।

यह भी पढ़ें- हनुमान चालीसा में छुपा है हर समस्या का हल

11 से 14वीं चौपाई

लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये ॥11॥

अर्थ : आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मण जी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई ॥12॥

अर्थ : श्री रामचंद्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं ॥13॥

अर्थ : श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद, सारद सहित अहीसा ॥14॥

अर्थ : सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनागजी सब आपका गुण गान करते हैं।

15वीं से 17वीं चौपाई

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।

अर्थ : यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णत: वर्णन नहीं कर सकते।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥15॥

अर्थ : यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णत: वर्णन नहीं कर सकते।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥16॥

अर्थ :  आपने सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥

अर्थ : आपके उपदेश का विभीषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।

नोट-हनुमान चालीसा और उसके अर्थ को बताने में सावधानी बरती जा रही है। फिर भी संभव है कि मानवीय चूक हो। ऐसे में सुधि पाठक अवश्य ध्यान दिलाएं।

18वीं से 21वीं चौपाई तक

जुग सहस्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥18॥

अर्थ : जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है कि उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझकर.निगल लिया।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥19॥

अर्थ : आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह में रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।

दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥20॥

अर्थ : संसार में जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते हैं।

राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥21॥

अर्थ : श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले हैं, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम की कृपा दुर्लभ है।

22वीं से 25वीं चौपाई अर्थ सहित

सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना ॥22॥

अर्थ : जो भी आपकी शरण में आता हैं, उसे आनंद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक हैं, तो फिर किसी का डर नहीं रहता।

आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै ॥23॥

अर्थ : आपके सिवाय आपके वेग को कोई नहीं रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते हैं।

भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै ॥24॥

अर्थ : जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नहीं फटक सकते।

नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥25॥

अर्थ : वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते हैं, और सब पीड़ा मिट जाती है।

26वीं चौपाई से 30वीं तक

उम्मीद है आपको हनुमान चालीसा और उसके अर्थ को समझने में समस्या नहीं हो रही होगी। पढ़ें 26 से 30वीं चौपाई।

संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥26

अर्थ : विचार, कर्म और बोलने में, जिनका ध्यान आपमें रहता है, उनको संकटों से आप छुड़ाते हैं।

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा ॥27

अर्थ : तपस्वी राजा रामचंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं, उनके कार्यों को आपने सहज में कर दिया।

और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै ॥28

अर्थ : जिस पर आपकी कृपा हो, उसकी हर अभिलाषा पूर्ण होती है।

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा ॥29

अर्थ : चारों युगों में आपका प्रताप है। जगत में आपकी कीर्ति फैली है।

साधु संत के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे ॥30

अर्थ : राम के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का नाश करते हैं।

31वीं चौपाई का अर्थ और भाव

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता ॥31॥

हनुमान चालीसा और उसके अर्थ जानने के लिए इस चौपाई को भाव सहित भी जानना जरूरी है।

अर्थ : आपको माता जानकी से वरदान मिला है कि आप किसी को भी आठ सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते हैं। वे हैं-
अणिमा : जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता है।

महिमा : जिसमें योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।
गरिमा : जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।
लघिमा : जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।
प्राप्ति : जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।
प्राकाम्य : जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है।
ईशित्व : जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य हो जाता है।
वशित्व : जिससे दूसरों को वश में किया जाता है।

32 से 35वीं चौपाई को जानें

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा ॥32

अर्थ : आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।

तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै ॥33

अर्थ : आपका भजन करने से श्री रामजी प्राप्त होते हैं, और जन्म जन्मांतर के दु:ख दूर होते हैं।

अंत काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥34

अर्थ : अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते हैं और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलाएंगे।

और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई ॥35

अर्थ : हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नहीं रहती।

नोट- आपने हनुमान चालीसा और उसके अर्थों को समझ लिया होगा।

36वीं से 38वीं चौपाई तक

संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥36॥

अर्थ : जो हनुमानजी का सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते हैं। सारी पीड़ाएं मिट जाती हैं।

जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई ॥37॥

अर्थ : हे हनुमानजी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप गुरुजी के समान मुझ पर कृपा कीजिए।

जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई ॥38॥

अर्थ : जो कोई चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बंधनों से छूट जाएगा।

39वीं और 40वीं चौपाई के साथ दोहा

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥39॥ 

अर्थ : भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी हैं कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।

तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मंह डेरा ॥40॥

अर्थ : हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम के दास हैं। इसलिए आप उनके हृदय में निवास कीजिए।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुरभुप॥

अर्थ : हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनंद मंगलों के स्वरूप हैं। हे देवराज! आप श्री राम, सीता और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।

यह भी पढ़ें- हर समस्या का है समाधान, हमसे करें संपर्क

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here