वैष्णो देवी मंदिर में पूरी होती हैं मनोकामनाएं

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वैष्णो देवी मंदिर में पूरी होती हैं मनोकामनाएं
वैष्णो देवी मंदिर में पूरी होती हैं मनोकामनाएं।

Wishes are fulfilled in Vaishno Devi temple : वैष्णो देवी मंदिर में दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। जम्मू-कश्मीर के कटरा शहर के पास समुद्र तल से 5200 फीट की ऊंचाई पर त्रिकूट पर्वत पर स्थित है मां वैष्णो देवी मंदिर। इसमें मां के तीनों रूप महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती की पूजा होती है। उनकी स्थापना और उनके इस रूप में धरा पर आगमन को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं, उनमें दो प्रमुख हैं। दोनों कथा के अनुसार माता ने दक्षिण भारत में निःसंतान रत्नाकर सागर के घर त्रेतायुग में जन्म लिया था। उनका जन्म चूंकि विष्णु की शक्ति से हुआ था, इसलिए वे वैष्णवी कहलाईं।

त्रेता युग में जन्म लिया था माता ने, त्रिकुटा था नाम

बचपन में माता का नाम त्रिकुटा था। नौ साल की उम्र में ही उन्होंने पिता की अनुमति से समुद्र तट पर विष्णु के अवतार भगवान राम की तपस्या की। जब श्रीराम अपनी सेना के साथ लंका जाने के क्रम में समुद्र तट पर पहुंचे तो उनका ध्यान तपस्या में लीन इस दिव्य कन्या पर पड़ा। राम ने त्रिकुटा से उनके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह मन ही मन राम को पति रूप में मान चुकी हैं। भगवान ने कहा कि इस अवतार में उन्होंने सिर्फ सीता के साथ एकपत्नी व्रत रहने का वचन लिया है, इसलिए इस जन्म में ऐसा होना संभव नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने माता को कहा कि कल्कि अवतार में वह उनसे विवाह करेंगे।

भगवान राम के कहने पर त्रिकूट पर्वत पर आई माता

इस अवधि में उन्होंने माता से त्रिकूट पर्वत श्रृंखला में रहकर तपस्या में लीन रहने के लिए कहा। श्रीराम ने त्रिकुटा ने कहा कि त्रिकूट पर वे वैष्णो देवी के नाम से अमर हो जाएंगी। वहां उनकी पूजा होगी। सच्चे मन से उनकी उपासना करने वाले को मनचाहा फल मिलेगा। तब से माता त्रिकूट पर्वत पर गूफा में पिंडी रूप में ध्यान मग्न है और सच्चे मन से उनकी तपस्या करने वालों को मनचाहा फल मिलता है। कई भक्तों को तो वैष्णो देवी मंदिर में दर्शन करने पर ही मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि यहां हमेशा भक्तों की भीड़ रहती है।

श्रीधर को दिया था दर्शन

इसी कथा के अगले क्रम में अत्यंत निर्धन होने पर भी माता की भक्ति में लीन रहने वाले श्रीधर का नाम आता है। वे कटरा से दो किलोमीटर दूर हंसली गांव में रहते थे। एक बार माता ने एक दिव्य कन्या के रूप में उन्हें दर्शन दिया और भक्तों के लिए भंडारा करने का आदेश सुनाया। यह सुनकर श्रीधर एक बार तो परेशान हो गए। उनके पास न तो भंडारा कराने के लिए पैसे थे और न अधिक टूटी-फूटी कुटिया में अधिक लोगों को बैठाकर भोजन कराने की व्यवस्था थी। इसके बाद भी माता की भक्ति में डूबे श्रीधर ने उनका आदेश मानकर आसपास के सारे लोगों, साधु-संन्यासियों को भंडारे का निमंत्रण दे दिया।

भैरवनाथ को दिया निमंत्रण, पकड़ने की कोशिश की

यह निमंत्रण उन्होंने कई चमत्कारिक शक्तियों के मालिक लेकिन नकारात्मक विचारधारा वाले भरवनाथ और उनके शिष्यों को भी दिया। भैरवनाथ को श्रीधर की आर्थिक स्थिति की जानकारी थी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि भंडारे में कोई कमी हुई तो खैर नहीं। माता की भक्ति में लीन श्रीधर ने डरने के बदले उन्हें आश्वस्त किया कि कोई कमी नहीं होगी। तय समय पर सैकड़ों लोग भंडारे के लिए श्रीधर के घर पहुंचे। आश्चर्य कि उनकी टूटी-फूटी छोटी सी कुटिया में सभी आसानी से समा गए। शानदार भंडारा हुआ। इसी बीच भैरवनाथ की नजर दिव्य कन्या पर पड़ी। उन्हें समझ आ गया कि वह अलौकिक शक्तियों की मालकिन है। इस रहस्य को सुलझाने के लिए उन्होंने कन्या को पकड़ने की कोशिश की। कन्या त्रिकूट पर्वत की ओर भाग निकली। उनके भागने के दौरान बीच में पड़ने वाली सारी जगह भक्तों के लिए अमूल्य निधि बन गई है।

बाणगंगा में स्नान से धुल जाते हैं पाप

वैष्णो देवी मंदिर में मां पिंडी रूप में स्थित है। भागने के दौरान वे जिन रास्तों से गुजरीं वे भी महत्वपूर्ण जगह बन गई हैं। मां ने सबसे पहले धरती पर एक बाण चलाया। उसकी चोट से धरती से पानी का सोता बह निकला, जो बाणगंगा नदी के नाम से मशहूर हुआ। मान्यता है कि मां के जो भक्त इसमें स्नान करते हैं, उनके सारे पाप धुल जाते हैं। नदी के किनारे ही माता के पैरों के निशान आज भी देखे जा सकते हैं। वह चरण पादुका के नाम से मशहूर है। वहां से आगे जाकर माता नौ माह तक छोटी गूफा में छिपकर ध्यान मग्न रही। वह स्थान अब गर्भजून क नाम से विख्यात है। जब भैरवनाथ वहां भी पहुंच गए तो माता और ऊपर पवित्र गूफा तक चली आई।

भैरव मंदिर के दर्शन के बिना यात्रा अधूरी

इसके बाद भी भैरवनाथ ने पीछा नहीं छोड़ा तो माता ने काली का रूप धारण कर उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया। उसका सिर ढाई किलोमीटर दूर भैरव घाटी में गिरा। मरते समय भैरवनाथ ने उन्हें मां कहकर पुकारा और क्षमायाचना की। भक्त वत्सला माता ने उसे न सिर्फ माफ कर दिया, बल्कि जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान किया। उन्होंने उसे यह भी वरदान दिया कि किसी भी भक्त की वैष्णो देवी की यात्रा तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक वह भैरव घाटी में जहां सिर गिरा था, उसका भी दर्शन नहीं कर लेगा। उस स्थान पर अब मंदिर बना हुआ है। माता के दर्शन के बाद लोग भैरव मंदिर भी जाते हैं।

तीन सिरों वाली पिंडी रूप में ध्यानस्थ हैं माता

वैष्णो देवी मंदिर में उसी पवित्र गूफा में चट्टान के आकार में माता तीन सिरों वाली पिंडी रूप में ध्यानमग्न हो गईं। भक्तगण अब उन्हीं पिंडी का दर्शन कर निहाल होते हैं। उधर, श्रीधर माता के लिए परेशान होने लगे और उनकी खोज में व्याकुल होकर भटकने लगे। तब माता ने उन्हें स्वप्न में गूफा में पिंडी रूप में होने की जानकारी दी। श्रीधर वहां पहुंचे और वहीं रहकर विधिपूर्वक पिंडी की पूजा करने लगे। यही स्थान मां वैष्णो देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। इससे प्रसन्न होकर माता ने प्रत्यक्ष हो उन्हें दर्शन दिया। तब से उनका वंशज ही माता की पूजा करता आ रहा है।

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