अपने व पितरों के मोक्ष के लिए मोक्षदा एकादशी व्रत 25 को

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कर्म और उसके फल पर रखें विश्वास, करुणानिधान हैं भगवान
कर्म और उसके फल पर रखें विश्वास, करुणानिधान हैं भगवान।

Mokshada Ekadashi vrat for moksha : अपने व पितरों के मोक्ष के लिए मोक्षदा एकादशी व्रत 25 दिसंबर को है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य माना जाता है मोक्ष। आत्मा कर्म अनुसार मनुष्य जीवन का पाती है। इसका मुख्य उद्देश्य ही सत्कर्म कर मोक्ष की प्राप्ति है। इसी कारण मानव जीवन को अन्य योनियों से बेहतर माना जाता है। अन्य योनि में मोक्ष के लिए प्रयास भी नहीं किया जा सकता है। पद्म पुराण में मोक्ष की चाह रखने वाले के लिए “मोक्षदा एकादशी व्रत” रखने की सलाह दी गई है। इस व्रत को रखने से कर्मों के बंधन से मुक्ति मिलती है। भगवान की कृपा से पापों का नाश होता है। इससे मनुष्य का खुद व उनके पूर्वजों का उद्धार होता है।

व्रत और पारन की विधि

मोक्षदा एकादशी को अन्य एकादशियों की तरह ही व्रत करने का विधान है। एक दिन पहले यानि दशमी को सात्विक भोजन करना चाहिए। रात में सोने से पहले श्री हरि का स्मरण करना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह स्नान करें। फिर पूरे घर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। इसके बाद भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें। पूजा के बाद विष्णु के अवतारों की कथा का पाठ करें। रात्रि में भगवान का भजन-कीर्तन करें। दिन भर निराहार रहें। अगले दिन विष्णु पूजा कर ब्राह्मण भोजन कराएं। फिर ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर विदा करें। इसके बाद उपवास खोलना चाहिए। ध्यान रखें कि उपवास द्वादशी तिथि में ही खोलें। न तो एकादशी हो और न द्वादशी बीतना चाहिए। अपने व पितरों के मोक्ष के लिए इसे अवश्य करें।

इसी दिन भगवान ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था

मोक्षदा एकदशी को विशेष एकदशी कहा जाता है। यह मोक्ष और कर्मों के बंधन से मुक्ति दिलाती है। साथ ही इसी दिन श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को श्रीमद्भगवद गीता सुनाई थी। इसलिए इसे गीता जयंती भी कहा जाता है। जो कोई इस दिन योग्य व्यक्ति को उपहार स्वरूप गीता देता है, उसे भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

मोक्षदा एकादशी की कथा

एक समय गोकुल नगर पर वैखानस नाम के राजा का राज था। वे बहुत ही धार्मिक प्रकृति के थे। प्रजा सुखपूर्वक रह रही थी। एक दिन राजा ने विचित्र स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि उनके दिवंगत पिता नर्क में बहुत कष्ट झेल रहे हैं। यह देखकर राजा बेचैन हो गए। उनकी नींद टूट गई। अपने स्वप्न के बारे में रात भर राजा विचार करते रहे। लेकिन कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने सुबह ही ब्राह्मणों को बुला भेजा। ब्राह्मणों के आने पर राजा ने उन्हें अपने स्वप्न की जानकारी दी। उन्होंने इसका अर्थ पूछा।

पाप के कारण राजा के पिता को नर्क जाना पड़ा

ब्राह्मणों को राजा के स्वप्न से आभास हुआ कि उनके पिता दूसरे लोक में कष्ट झेल रहे हैं। लेकिन इनसे वे कैसे मुक्त हो सकते हैं इस बारे में कोई उपाय सुझाने में असमर्थता जताई। उन्होंने राजा को पर्वत नामक मुनि से सलाह लेने का सुझाव दिया। राजा वैसानख पर्वत मुनि के आश्रम में पंहुच गये। मुनि ने राजा के स्वप्न की बात सुनी। उन्होंने योग दृष्टि से राजा के पिता को देखा। वे सचमुच नरक में पीड़ा को झेल रहे थे। उन्हें इसका कारण भी भान हो गया। तब उन्होंने राजा से कहा। हे राजन, आपके पिता को अपने पूर्व जन्म के पाप की सजा काटनी पड़ रही है। तब राजा ने उनसे पूछा हे मुनिवर मेरे पिता को इससे छुटकारा कैसे मिल सकता है।

मुनि ने दिया मोक्षदा एकादशी का ज्ञान

मुनि ने राजा से कहा कि आप मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को विधिपूर्वक व्रत करें। उसके पुण्य को अपने पिता को दान कर दें। तब उन्हें मोक्ष मिल सकता है। राजा ने ऐसा ही किया। पिता को पुण्य दान करते ही आकाश से मंगल गान होने लगा। राजा ने प्रत्यक्ष देखा कि उसके पिता बैकुंठ जा रहे हैं।  उनके पिता ने कहा कि हे पुत्र मैं कुछ समय स्वर्ग का सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्त हो जाऊंगा। यह सब तुम्हारे उपवास से संभव हुआ है। तुमने मुझे नर्क छुटकारा दिलाकर पुत्र होने का धर्म निभाया है। तुम्हारा कल्याण हो। राजा के एकादशी व्रत रखने से उनके पिता के पापों का क्षय हुआ। उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसी कारण इस एकादशी का नाम मोक्षदा एकादशी पड़ा। अपने व पितरों के मोक्ष के लिए इसीलिए इस व्रत को किया जाता है।

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