नवरात्रि 17 से शुरू, ऐसे करें माता का पूजन, सारे दुख होंगे दूर

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मूर्ति पूजा में गहरा रहस्य, उपहास का विषय नहीं
मूर्ति पूजा में गहरा रहस्य, उपहास का विषय नहीं।

Navratri 17 cotober 2020 : नवरात्रि 17 से शुरू हो रही है। उसमें ऐसे करें माता का पूजन। सारे दुख होंगे दूर। जरूरत है भक्ति व नियमपूर्वक पूजन की। नौ दिन का पर्व शानदार मौका लेकर आया है। इसमें साधक शक्ति संचय करते हैं। मनोकामनाएं पूर्ण करने का भी अद्भुत मौका है। नवरात्रि 25 अक्तूबर तक है। इस समय प्रकृति का दृश्य मनोरम है। कण-कण में ऊर्जा भरी रहती है। यही ऊर्जा भक्तों को सहज मिल जाती है। मार्कण्डेय पुराण में इसमें विस्तार से लिखा है। बाल्मीकि रामायण के अनुसार राम ने शारदीय नवरात्र में पूजन किया था। उनकी मनोकामना रावण पर विजय की थी। माता द्वारा महिषासुर वध की कथा भी खूब प्रचलित है।

नौ दिनों का अद्भुत का संयोग

नौ दिनों का अद्भुत संयोग है। इसमें नौ द्वार, नौ ग्रह, नौ धातु एवं नौ विष हैं। उन्हें नियंत्रित करने वाली नौ देवियों का पूजन होता है। महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती का संगम है। उन्हें ही नवदुर्गा कहा जाता है। उनके भिन्न रूप हैं। प्रथम तीन दिनों तक दुर्गा की पूजा होती है। इससे ऊर्जा और शक्ति का संचार होता है। चौथे से छठे दिन तक लक्ष्मी की पूजा होती है। यह सुख, शांति व समृद्धि की देवी हैं। सातवें व आठवें दिन सरस्वती को पूजा जाता है। इससे ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति होती है। इनका विस्तार से वर्णन नीचे कर रहा हूं।

देवी के नौ रूपों की पूजा

नवरात्रि 17 से शुरू होगी। हर दिन देवी के अलग रूपों की पूजा होती है। उनकी संक्षिप्त जानकारी नीचे दे रहा हूं। विस्तार से जानकारी अगले लेखों में दूंगा। हर देवी का रूप, मंत्र व पूजन विधि अलग है। एक दिन पूर्व उसे देखकर पूजन करें।

17 अक्तूबर को माता की शैलपुत्री के रूप में पूजा। उसी दिन कलश स्थापना।

18 अक्तूबर को माता के दूसरे रूप ब्रह्मचारिणी की पूजा।

19 अक्तूबर को तीसरे रूप चंद्रघंटा की पूजा।

20 अक्तूबर को कुष्मांडा की पूजा।

21 अक्तूबर को स्कंदमाता की पूजा।

22 अक्तूबर को कात्यायनी की पूजा

23 अक्तूबर कालरात्रि की पूजा।

24 अक्तूबर को महागौरी की पूजा।

25 अक्तूबर को माता के नौवें रूप सिद्धिदात्री की पूजा। इसी दिन विजया दशमी भी है।

नवरात्रि के नौ दिनों में नौ रंग

नवरात्रि के हर दिन का अलग महत्व है। हर दिन की अलग देवी हैं। उनका अलग पूजा विधान है। हर दिन का अलग रंग भी है। उसी रंग के फूल व प्रसाद चढ़ाने से अच्छा फल मिलता है। उचित होगा कि वस्त्र का रंग भी दिन के हिसाब से हो। पहला दिन अर्थात प्रतिपदा को पीला रंग सौभाग्य का प्रतीक है। द्वितीया का रंग हरा है। तृतीया को भूरा रंग हो। चतुर्थी के लिए नारंगी उपयुक्त है। पंचमी को सफेद और षष्ठी का रंग लाल है। सप्तमी नीला और अष्टमी का गुलाबी रंग है। नवमी को बैंगनी रंग का उपयोग करना चाहिए।

कलश स्थापना, शुभ मुहूर्त और तिथियों का फेर

नवरात्रि 17 से, ऐसे करें माता का पूजन।

इस वर्ष नवरात्रि 17 से शुरू हो रही है। उसी दिन प्रतिपदा है। कलश स्थापना का शुभ समय सुबह 6.27 बजे से 10.30 बजे के बीच होनी चाहिए। इसी दिन पूर्वाह्न 11.44 बजे अभिजित मुहूर्त शुरू होगा। यह मुहूर्त 12.29 तक रहेगा। इस बार नवरात्रि नौ दिन का ही है। इस बार 24 अक्तूबर को अष्टमी के साथ ही नवमी है। अष्टमी सुबह 6.58 बजे तक ही है। उसके बाद नवमी शुरू हो जाएगी। हालांकि नवमी का सूर्योदय 25 अक्तूबर को होगा। कुछ जगहों पर 24 को सिर्फ अष्टमी पूजा होगी। कई लोग उसी दिन नवमी की भी पूजा करेंगे। चूंकि नवमी 25 को सुबह 7.41 बजे तक है। अतः कई जगह पर 25 को नवमी की पूजा होगी। विजया दशमी को लेकर कोई विवाद नहीं है। 25 को ही अपराजिता पूजा व दशमी मनी जाएगी। विजय मुहूर्त दोपहर 1.58 से 2.43 बजे तक है।

पूजन सामग्री की तैयारी

पूजा के इच्छुक लोगों को पहले ही तैयारी करनी चाहिए। माता की प्रतिमा या फोटो रख लें। लाल चुनरी, अक्षत, जल व चंदन भी रख लें। जौ, कपूर, नारियल, गुलाल व मिट्टी का बर्तन भी रखें। कलश के लिए पात्र व आम की पत्तियां (डंठल सहित) रखें। पूजा स्थान साफ होना चाहिए। धूप और दीप का हर दिन उपयोग होना है। ताला फूल रोज चढ़ाना है। उसकी व्यवस्था पहले से कर लें। प्रसाद के लिए फल, ड्राई फ्रूट व मिठाई श्रद्धानुसार रखें। इनकी व्यवस्था एक दिन पहले सुनिश्चित करें। नवरात्रि 17 से शुरू हो रही है। अतः माता के पूजन की तैयारी 16 को ही कर लें।

पूजन विधि

चूंकि नवरात्रि 17 से शुरू है। इसलिए सुबह सबसे पहले संकल्प लें। इसमें आपको तय करना है कि कितनी पूजा करेंगे। कितना और किस मंत्र का जप करेंगे। कितना पाठ करेंगे। सप्तशती का करेंगे या दुर्गा चालीसा। यदि संस्कृत पर पकड़ नहीं है तो मूल पाठ से परहेज करें। सप्तशती के हिंदी अनुवाद का पाठ भी प्रभावी है। वह भी कठिन लगे तो दुर्गा चालीसा करें। मंत्र का चयन कामना के अनुसार करें। पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करें। फिर जौ को स्थापित करें। पूजा अवधि में रोज सुबह जल्दी उठें। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पर पूजा पर बैठें। रोज पंचोपचार पूजा करें। आरती व प्रार्थना रोज करें। विधि इसी वेबसाइट में सरल व संक्षिप्त पूजन विधि में देखें। अष्टमी या नवमी यो दोनों दिन कन्या भोजन कराएं। दशमी को विसर्जन के बाद पूजा सामग्री विसर्जित करें।

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