कर्मों के अलावा कुछ साथ नहीं जाता

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कर्मों के अलावा कुछ साथ नहीं जाता
कर्मों के अलावा कुछ साथ नहीं जाता।

Nothing goes apart from Karma : कर्मों के अलावा कुछ साथ नहीं जाता। इसके बाद भी लोग काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार में फंसे रहते हैं। वे अपने असली सुख के बदले दिखावे में फंसे रहते हैं। इसे दो बोध कथाओं से समझें। पहली कथा साधु और एक सेठ की है। दूसरे में कबीरदास का एक प्रसंग है। पहली कथा के अनुसार एक सेठ के पास काफी दौलत थी। वे दान-पुण्य में कुछ भी खर्च नहीं करते थे। हमेशा अपने पैसे को बचाने के नए-नए तरीके सोचते रहते। कैसे धन बढ़े, इसी चिंता में चिड़चिड़े हो गए थे। एक बार उनके द्वार पर एक साधु आया। उन्होंने साधु को कुछ भी दान नहीं दिया। साधु ने ध्यान लगा कर देखा तो सारी स्थिति समझ गए। उन्होंने सेठ जी को सही रास्ता दिखाने की ठानी। फिर उनसे कहा वे कि वे उनके पास अपना एक सामान रखने आए हैं।

साधु ने सेठ को समझाया जीवन का अर्थ

साधु ने सेठ को एक सूई दी। कहा, जब दोनों की मृत्यु हो जाएगी तो वे दूसरे लोक में उनसे वह सूई ले लेंगे। सेठ चकराया कि ऐसा कैसे हो सकता है? फिर साधु से कहा कि आप मुझे धरती पर सूई दे रहे हैं और चाहते हैं कि मैं उसे आपको दूसरे लोक में लौटा दूं। भला मरने के बाद मैं यहां से सूई लेकर दूसरे लोक में कैसे जा सकता हूं? साधु ने कहा कि यदि आप एक छोटी सी सूई लेकर नहीं जा सकते हैं तो फिर इस धन-संपत्ति के प्रति इतना मोह क्यों? यह धन-संपत्ति भी तो आप स्वर्ग लेकर नहीं जा सकते हैं? बात सेठ की समझ में आ गई। वह साधु के चरणों में गिर पड़ा। इसके बाद उसका जीवन बदल गया। वह समझ गया कि कर्मों के अलावा कुछ साथ नहीं जाता है।

जैसा लोग समझते हैं, वैसा नहीं होता

संसार की रीत ऐसी है कि लोग जो समझते हैं,  वास्तव में वैसा होता नहीं है। जो होता है, उसे समझ नहीं पाते हैं। कुछ-कुछ कबीर की उलटबांसी की तरह। एक बार एक भक्त ने कबीरदास को मलमल का एक कुरता पहनने को दिया। कबीरदास ने कुर्ता उलटा पहन लिया। भक्त ने उनसे कहा कि उन्होंने उलटा कुरता पहन लिया है। कबीरदास ने कहा, लोग ऐसा समझते हैं, मैं नहीं समझता। मलमल का कोमल हिस्सा दुनिया को दिखाने के लिए लोग बाहर रखते हैं और उसका रूखा भाग अंदर। ऐसे में देखने वाले लोग तो सुखी होते हैं लेकिन शरीर को मलमल का लाभ नहीं मिल पाता। मैंने तो मलमल को शरीर से लगा कर रखा है। रूखा भाग बाहर है। अब बताओ, मैं सही हूं या तुम?

सुख बाहर नहीं अंदर है

सुख और दुख का असली अर्थ लोग नहीं समझ पाते हैं। सुख हमारे अंदर है। बुद्ध कहते हैं कि सुख की तलाश में बाहर मत भटको। बाहर तुम्हें कोई दुखों से मुक्ति नहीं दिला सकता है। अपने अंदर ही समा जाओ। ध्यान और तप का सहारा लो। तुम्हें सच्चा सुख मिलेगा। बुद्ध ने कर्मकांड का विरोध किया था। कहा था, मुक्ति का मार्ग आपके अंदर है। बुद्ध ने कड़ी तपस्या की थी। कई जन्मों तक संघर्ष किया। खुद को मानवता के उच्चतम धरातल पर रखा। तब जाकर वे बुद्ध बने। बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था। बुद्ध तो मन की वह स्थिति है। ऐसी स्थिति जहां सारे रहस्य खुल जाते हैं। व्यक्ति सारे बंधनों से ऊपर उठ जाता है। तब वह बुद्ध बन जाता है। ऐसा बनना सबके लिए संभव नहीं है। वह यही समझे तो बहुत है कि कर्मों के अलावा कुछ साथ नहीं जाता।

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