ग्रहों के आधार पर करें भूमि व भवन के वास्तु का संतुलन

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ग्रहों के आधार पर करें भूमि व भवन के वास्तु का संतुलन
ग्रहों के आधार पर करें भूमि व भवन के वास्तु का संतुलन।

On the basis of planets, balance the Vastu of the land and the building : ग्रहों के आधार पर करें भूमि व भवन के वास्तु का संतुलन। ग्रहों का प्रभाव मनुष्य ही नहीं, वरन पूरी सृष्टि पर पड़ता है। धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान भी उससे प्रभावित होते हैं। विघ्न हर्ता गणेश का सिर प्रतिकूल ग्रहदशा के कारण कटा था। स्पष्ट है कि भूमि और भवन भी ग्रहों के बल के प्रभाव से बच नहीं पाते हैं। अर्थात यदि ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल हो तो उनका नकारात्मक असर पड़ता है। इसी तरह अनुकूल ग्रह भवन और उसमें रहने वाले के जीवन को सुखी बना देते हैं। भूमि और भवन की स्थिति में थोड़ा फेरबदल कर ग्रहों को अनुकूल बना सकते हैं। मैं इससे संबंधित मौलिक जानकारी संक्षेप में दे रहा हूं। बाद में विकल्प की भी जानकारी दूंगा। विस्तृत जानकारी के लिए मुझसे मेल पर संपर्क कर सकते हैं।

आत्माकारक ग्रह है सूर्य

सूर्य आत्माकारक ग्रह है। व्यक्ति, भूमि और भवन को इससे ऊर्जा मिलती है। मनुष्य के जीवन, यश और सफलता के निर्धारण में इसकी प्रमुख भूमिका है। भूमि और भवन में इसे अनुकूल बनाने के लिए उत्तर-पूर्व भाग को थोड़ा नीचा रहना चाहिए। भवन के भूमि का ढलान उत्तर-पूर्व (ईशान) की ओर होना चाहिए। इसमें यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इस दिशा के साथ ही पूर्व से भी सूर्य की रोशनी का प्रवेश भरपूर हो। अर्थात रोशनी के मार्ग में बाधा बन सकने लायक बड़े वृक्ष या ऊंचे मकान न हो। इसे भूमि के खरीदते समय ही ध्यान देना चाहिए। हालांकि मैंने पाया कि जिस जातक का सूर्य अधिक खराब होता है, उसके मकान में यह दोष अवश्य आ जाता है। इसे अनुकूल करने के लिए रंगों का संयोजन भी उपयोगी और प्रभावशाली विकल्प है।

चंद्रमा मनोबल और मंगल शौर्य का कारक

ग्रहों के आधार पर वास्तु को देखें तो चंद्रमा जल तत्व का प्रतीक चंद्रमा है। यह भूमि, भवन और मानव शरीर में मौजूद अहम तत्व जल तत्व का निर्धारण करता है। इसका असंतुलन मकान और उसमें रहने वाले लोगों का मानसिक संतुलन ही बिगाड़ देता है। मानसिक अस्थिरता, क्रोध, आवेग, निराशा, उत्साह आदि में इसी की भूमिका रहती है। पूर्व से उत्तर की ओर चंद्रमा परिपथ में शीतलता का पूरा प्रभाव रहता है। इसलिए पूर्व-उत्तर (ईशान कोण) में जल संसाधन रखना उचित होता है। इससे चंद्रमा का सकारात्मक फल मिलता है। मंगल को पुराण संस्कृति में भूमि पुत्र कहा गया है। इसके परिभ्रमण काल में ही पृथ्वी पर बड़ी घटनाएं होती हैं। अतः इन्हें अनुकूल करना आवश्यक है। इसके लिए घर व उसकी भूमि में दक्षिणी हिस्से को ऊंचा रखना आवश्यक है। इसके लिए अन्य विकल्प भी हैं लेकिन फिलहाल बात मौलिक सिद्धांत की कर रहा हूं।

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बुध व गुरु विद्या, बुद्धि, धर्म, धन व संतान के कारक

उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा का स्वामी बुध हैं। इसी से बुद्धि, विद्या, ज्ञान आदि का निर्धारण होता है। यही ग्रह मस्तिष्क और बारीक तंत्रिकाओं का भी स्वामी है। इसे अनुकूल करने के लिए चंद्रमा जैसी युक्ति उपयोगी है। उत्तर-पूर्व में जल स्रोत, टैंक, बाग, घास आदि लगाना लाभकारी होता है। अपने पूजा और स्वाध्याय कक्ष को यदि इस दिशा के कमरे में रखें तो और लाभ मिलेगा। गुरु को उत्तर दिशा का स्वामी माना जाता है। इस दिशा को अधिक दबाना नहीं चाहिए। हालांकि ईशान कोण को दक्षिण और पश्चिम से नीचा रखना चाहिए। ऐसे में अच्छा विकल्प यह है कि ईशान की ओर उत्तर भाग ढलवां हो। साथ ही वह खुला और साफ-सुथरा होना चाहिए। इस दिशा में अपवित्र वस्तु नहीं रखें। ऐसा करने से गुरु अनुकूल रहेंगे। इन्हें रंगों के संयोजन व अन्य उपायों से भी अनुकूल बना सकते हैं।

शुक्र, शनि, राहु व केतु के संयोजन को जानें

ग्रहों के आधार पर वास्तु को अनुकूल करने में जानें शुक्र, शनि, राहु और केतु के बारे में। शुक्र से दांपत्य जीवन, वैभव, सुख-संपदा आदि की स्थिति का निर्धारण होता है। यह पूर्व दिशा का स्वामी है। अतः इसे खुला रखें। जल निकासी के लिए भी यह दिशा उपयुक्त है। इस ओर सफेद फूलों वाला बाग शुभ होता है। कृष्ण वर्ण वाले शनि को पश्चिम दिशा का स्वामी माना जाता है। दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) भाग पर भी इसका प्रभाव रहता है। इस दिशा का स्वामी राहु है। अतः दोनों को अनुकूल करने के लिए इस दिशा में भारी सामान रखें। खुला भाग और रोशनी कम हो। पश्चिम व नैऋत्य में मशीनरी संयंत्र लगाना शुभ माना जाता है। नैऋत्य का घर में सबसे अधिक ऊंचा होना भी शुभ माना जाता है। केतु उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशा का स्वामी है। इसे ईशान की तुलना में ऊंचा रखकर केतु को अनुकूल कर सकते हैं।

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संदर्भ- भारतीय वास्तु शास्त्र, संपूर्ण वास्तु शास्त्र, भवन वास्तु शास्त्र एवं भाग्यफल, लाल किताब।

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