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ध्यान का मार्ग सरल है तो सबसे कठिन भी

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आध्यात्म में ध्यान का सबसे ज्यादा महत्व है। इसलिए इस राह पर चलने वालों के लिए जरूरी है कि वह ध्यान को ठीक से समझें। ध्यान का मार्ग सरल है तो सबसे कठिन भी है। सरल इसलिए कि ध्यान करने का मतलब है कि कुछ नहीं कीजिए। बस मन और शरीर को पूरी तरह से शांत कर चुपचाप बैठ जाइए। कठिन इसलिए कि जैसे ही शरीर या मन में कोई गतिविधि हुई तो ध्यान टूटा। चुपचाप बैठ जाना सरल है। समस्या तब होती है जब आप चुप बैठकर आपनी आंखें बंद करें। तत्काल दिमाग की दौड़ शुरू हो जाती है। शरीर शांत, लेकिन मन भाग रहा है। इसीलिए कहा गया है कि ध्यान का मार्ग सरल तो है लेकिन सबसे कठिन भी है।

जब भीतर-बाहर कुछ न हो तो वह ध्यान है

हम सिर्फ बैठ जाएं और कुछ भी न करें, तो वह ध्यान है। आसनस्थ होकर शांत चित्त बैठ जाएं। इसके बाद यदि कोई विचार भी आता है, तो वह भी कृत्य है। कहने के लिए हम कुछ नहीं कर रहे तो भी वह ध्यान नहीं है। ध्यान में तो कोई विचार आ रहा हो तो आने दीजिए, रोकिए नहीं। रोकने की कोशिश हुई तो वह कृत्य माना जाएगा। ध्यान का मतलब, जब न परमात्मा का स्मरण किया जाए और न संसार का। इस स्थिति में कुछ भी करने की जरूरत नहीं, बस बैठ जाएं। जैसे हम निर्जीव हों, हमारे भीतर कोई हचलच नहीं हो। इस स्थिति में पहुंचना आसान नहीं है। सालों-साल अभ्यास के बाद भी विरले को ही यह स्थिति प्राप्त होती है।

शरीर की बात नहीं सुनें

यह प्रकृति जीवन कृत्य के बल पर ही टिका है। जैसे ही जीव कृत्य से शून्य हुआ, कि वह ऊपर उठने लगा। इसलिए मनुष्य शांत होता है तो प्राकृतिक गुण के कारण शरीर कहता है कि कुछ करो। ध्यान का अभ्यास करने वालों की समस्या है कि वैसे तो कभी पता नहीं चलता है कि शरीर में कहीं दर्द है, खुजली है या कोई अन्य समस्या है। लेकिन जब भी ध्यान करने बैठते हैं, लगता है कि मुसीबत बुला ली है। खुजली, खांसी, दर्द सब शुरू हो जाता है। सबकी तीव्र अनुभूति होने लगती है। यही सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। शरीर के इस कृत्य पर बिल्कुल ध्यान नहीं दें। उसकी कोई बात नहीं सुनें। याद रखें कि शरीर आपका है। आप इसके मालिक हैं।

ध्यान का मार्ग सरल, बशर्ते मन की नहीं सुनें

इसके बाद मन का नंबर आता है। यह सबसे ज्यादा चंचल, तेज और बेलगाम है। ध्यान का करने वाले के लिए मन पर नियंत्रण बड़ी चुनौती है। जब शरीर आवाज देना बंद करे, तब ही इससे निपटने की तैयारी कीजिए। इस तैयारी का मतलब कि उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देना। मन सबसे ज्यादा बगावती है। चूंकि यह शरीर का ही हिस्सा है। अतः इसका अस्तित्व शरीर से है। इसलिए जब शरीर आसन में बैठने लगेगा, मन भी ज्यादा भटक नहीं पाएगा। यह भी शांत हो जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि आसनस्थ होकर शांत-चित्त बैठ जाना। आप देखेंगे कि चंचल मन इधर-उधर भागने लगा है। उससे लड़ें नहीं। उसे दबाने की भी कोशिश भी नहीं कीजिए। तटस्थ भाव से ऐसे बैठे रहें जैसे कि उससे कोई संबंध नहीं है। फिर भागता मन शांत होने लगेगा। खाली हो जाएगा। इसमें लगभग तीन से चार माह का समय लगता है।

सहज-सरल होकर करें ध्यान

ध्यान लगाने के लिए आसनस्थ होने की प्रक्रिया अत्यंत सरल है। इसके लिए किसी योग मुद्रा या खास जगह की जरूरत नहीं है। हां, यदि आप योगासन के अभ्यस्त हों तो अवश्य करें, उससे इसमें सहायता मिलेगी। ध्यान रहे कि आपका पहला लक्ष्य सिर्फ शांत-चित्त बैठना है। इसे सीख गए तो यही परमासन है। इसके लिए खुली हवा, मंदिर, बंद कमरा के साथ जमीन, कुर्सी, पलंग आदि की कोई सीमा नहीं है। सिर्फ जहां आप शांत-चित्त होकर एक ही अवस्था में बैठ सकें वही सबसे अनुकूल जगह है। जैसे बैठने में आसानी हो, तय समय तक बैठ सकें उसी रूप में वहीं बैठ जाइए। ठंड है तो कंबल डाल लीजिए, गरमी है तो पंखा लगा लीजिए। ऐसी व्यवस्था जरूर कर लें कि शरीर सुरक्षित और सहज रहे।

(क्रमशः)

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