आस्था और पर्यटन का अनोखा संगम है शबरी मंदिर

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आस्था और पर्यटन का अनोखा संगम है शबरी मंदिर
आस्था और पर्यटन का अनोखा संगम है शबरी मंदिर।

Shabari temple is unique confluence of faith and tourism : आस्था और पर्यटन का अनोखा संगम है शबरी मंदिर। यहां दर्शन मात्र से हर मनोकामना पूरी होती है। छत्तीसगढ़ के डांग जिले में है यह अनूठा मंदिर। शबरी भक्ति और समर्पण की चरम थीं। उनकी शक्ति से भगवान राम भी उसके पास खिंचे चले आए। उन्होंने शबरी के जूठे बेर भी बड़े प्रेम से चखे। कहने को वे एक सामान्य भील महिला थीं। लेकिन भक्ति के दम पर कई देवी-देवताओं से श्रेष्ठ बन गईं। भगवान पर भक्त की जीत का वे अनुपम उदाहरण हैं। इस बार मैं आपको उस मंदिर के बारे में बता रहा हूं। मान्यता है कि शबरी की भक्ति से प्रसन्न भगवान विष्णु एक अंश वहीं स्थित है। चार धाम के समकक्ष इसे गुप्त धाम माना जाता है।

शबरी नारायण बना शिवरी नारायण मंदिर

इस स्थान को पहले माता शबरी के नाम पर शबरी नारायण कहा जाता था। बाद में अपभ्रंश होकर यह शिवरी नारायण मंदिर के रूप में प्रचलित हुआ। प्रतिमा के रूप में भगवान विष्णु का एक अंश यहां रहने के कारण यह स्थान जगन्नाथपुरी के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इसी स्थान पर प्राचीन समय में भगवान जगन्नाथ जी की प्रतिमा स्थापित थी। बाद में उसको जगन्नाथ पुरी ले जाया गया था। यह भी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ यहां पर नित्य आते हैं।

गुप्त धाम की मान्यता

देश के प्रचलित चार धाम उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिका हैं। देश के मध्य में स्थित शिवरीनारायण को ”गुप्तधाम” का दर्जा प्राप्त है। इस बात का वर्णन रामावतार चरित्र और याज्ञवलक्य संहिता में मिलता है। यह स्थान भव्य प्राकृतिक दृश्यों से भी भरपूर है। इसी कारण इसे आस्था और पर्यटन का अनोखा संगम भी कहा जाता है।

माता शबरी का संक्षिप्त परिचय

शबरी का असली नाम श्रमणा था। वे भील सामुदाय के शबर जाति से संबंधित थीं। उनके पिता भीलों के राजा थे। उनका विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था। विवाह से पहले सैकड़ों बकरे-भैंसे बलि के लिए लाये गए। उन्हें देखकर शबरी को बहुत बुरा लगा। उन्हें लगा कि यह कैसा विवाह जिसके लिए इतने पशुओं की हत्या की जाएगी। वे विवाह के एक दिन पहले घर से भाग गईं। घर से भागकर वे दंडकारण्य पहुंच गई। वहां ऋषि तपस्या करते थे। वहां वे सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं। एक दिन महर्षि मतंग की नजऱ उन पर पड़ी। उनके सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में शरण दे दी। उन्होंने ही शबरी को बताया कि वे उसी आश्रम में भगवान राम की प्रतीक्षा करें। वे उनसे मिलने जरूर आएंगे।

भक्ति का अनूठा उदाहरण

मतंग की मौत के बाद शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा। वे नित्य अपना आश्रम एकदम साफ़ रखती थीं। साथ ही राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए। वह बूढ़ी हो चुकी थीं। तभी उन्होंने सुना कि दो सुंदर कुमार जंगल में आए थे। उन्होंने समझ लिया कि उनके आराध्य ही हैं। राम के आने की खबर सुनते ही वे भागती हुई उनके पास पहुंचीं। उन्हें घर लेकर आई उनके पांव धोकर बैठाया। अपने तोड़े हुए मीठे बेर राम को दिए। राम ने बड़े प्रेम से वे जूठे बेर खाए। उस स्थान पर एक कटोरीनुमा पत्‍ता कृष्‍ण वट का है। मान्यता है कि शबरी ने इसी पत्‍ते में रख कर श्रीराम को बेर खिलाए थे।

ऐसे पहुंचें

आस्था और पर्यटन का अनोखा संगम माता शबरी मंदिर सुंदर पहाड़ी पर स्थित है। चारों तरफ आज भी रमणीक वन हैं। अभ्यारण्य होने के कारण यह स्थान धार्मिक ही नहीं पर्यटन के लिहाज से भी मनमोहक है। भव्य और जीवंत मंदिर होने के कारण भक्तों एवं पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यह बिलासपुर से 64 किलोमीटर और रायपुर से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रायपुर और बिलासपुर के लिए लगभग सभी प्रमुख शहरों से ट्रेन सेवा उपलब्ध है। कुछ स्थानों से रायपुर के लिए हवाई सेवा भी है। इन स्थानों से डांग जिला के मुख्यालय आहवा तक पहुंच कर सुबीर गांव पहुंचा जा सकता है। वहीं पास में है माता शबरी का पवित्र स्थान। 

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