पहला दिन शैलपुत्री के नाम, इन मंत्रों से कर सकते हैं अनुष्ठान

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पहला दिन शैलपुत्री के नाम, इन मंत्रों से कर सकते हैं अनुष्ठान
पहला दिन शैलपुत्री के नाम, इन मंत्रों से कर सकते हैं अनुष्ठान।

Shailputri is first form of durga : पहला दिन शैलपुत्री के नाम होता है। वे भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। सात अक्टूबर से नवरात्र शुरू हो रहा है। पूजन व साधना के लिए तैयार हो जाएं। यह पर्व प्रकृति की मूल शक्ति के नाम है। मां शक्ति दुर्गा के रूप में पृथ्वी लोक में आती हैं। अत: इस समय उनकी उपासना सबसे प्रभावी होती है। इसमें मनोकामनाएं आसानी से पूरी होती हैं। मंत्र को सिद्ध करना भी आसान होता है। नीचे दिए किसी भी मंत्र का चयन कर जप करें। निश्चय ही शानदार परिणाम मिलेंगे। ये सभी दुर्गा साधना के उपयोगी मंत्र हैं। मेरा अनुभव है कि मां हर कामना की पूर्ति करती हैं। नीचे पढ़ें शैलपुत्री के बारे में। 

पहले दिन का संदेश, कड़े तप से मिलती है सफलता

माता शैलपुत्री के रूप में हिमालय पुत्री हैं। पहला दिन शैलपुत्री के नाम है। उन्होंने प्रतिकूल स्थिति में कठोर तप किया है। मानव रूप में जन्म लेकर महादेव की शक्ति बनीं। जगत माता बन सब पर कृपा कर रही हैं। यह संदेश है कि प्रतिकूल स्थिति में विचलित न हों। संयम, मनोबल और दृढ़ता बनाए रखें। कठोर तप (संघर्ष) करें। सफलता आपके कदम चूमेगी। शैलपुत्री के रूप में माता श्वेत व दिव्य स्वरूपा होकर वृषभ पर आरूढ़ हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है। बाएं हाथ में कमल है।

सरलता, सादगी व प्रेम ही सर्वोपरि

कमल के साथ माता का यह दिव्य रूप सरलता, सादगी और प्रेम का संदेश देता है। त्रिशूल प्रतीक है कि सादगी से ही हम अपने त्रितापों (दैहिक, भौतिक एवं दैविक) को नष्ट कर सकते हैं। मां धर्म के प्रतीक वृषभ पर आरूढ़ हैं। वह हमें कुसंस्कारों से निजात दिलाकर सुसंस्कृत और प्रज्ञावान बनने के लिए प्रेरित करती हैं। प्रथम दिन की उपासना आध्यात्म के लिए अहम है। इस दिन मन को मूलाधार चक्र में स्थापित करते हैं। यहीं से योग साधना शुरू होती है।

ध्यान मंत्र

वंदे वांछितं लाभाय चंद्रार्ध कृतशेखराम्।

वृषारूढ़ां शूल धरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।

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 दो पूजन विधि

नवरात्र पूजन की दो प्रमुख विधि है। सामान्य भक्त सिंहवाहिनी दुर्गा का पूजन करते हैं। नित्य सप्तशती का पूरा पाठ करें। समय की कमी है तो कम पाठ करें। नौ दिन में एक या तीन बार पाठ कर सकतें है। कामना हो तो सप्तशती का संपुट पाठ करें। अर्थात सप्तशती के हर मंत्र के आगे व पीछे कामना मंत्र जोड़ें। रोज माता के अलग-अलग रूप का पूजन करें। समय और कम हो तो सप्तशती के किसी मंत्र विशेष का जप कर सकते हैं। यह भी कल्याणकारी होता है। सिद्धि का लक्ष्य हो तो रोज दस हजार जप करें। सिर्फ श्रद्धा या शक्ति के लिए कर रहे हैं तो एक हजार से काम चल जाएगा। पहला दिन शैलपुत्री के नाम है। अतः उनकी पूजा पर विशेष ध्यान दें।

ऐसे करें पूजा

स्नान के बाद माता दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर के समक्ष बैठें। मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में हो। पंचोपचार या दक्षोपचार या  षोडषोपचार पूजन करें। इसके बाद मंत्र जप या पाठ शुरू करें। जप करें तो शाम को हवन भी करें। दिन में जपे गए मंत्र का दशांश हवन होगा। इससे मंत्र की ताकत और बढ़ती है। यदि हवन न कर सकें तो उतना जप अवश्य कर लें।

दुर्गा सप्तशती के कुछ सिद्ध मंत्र

नीचे दिया माता का हर मंत्र उपयोगी है। किसी का भी चयन कर जप शुरू करें। इसके लिए पहले संकल्प लें। पहला दिन शैलपुत्री के नाम होता है। उनके पूजन से पहले ही संकल्प होगा। पूजन के बाद जप शुरू करें। जप तय संख्या व स्थान पर होगा। रोज एक ही नियम रहेगा। तभी इसका फल मिलेगा। वैसे पहला दिन शैलपुत्री के नाम है। अतः उनका पूजन अवश्य करें। फिर निम्न में से किसी मंत्र का जप करें।

1-या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

2-सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्या खिलेश्वरी।

एवमेव त्वया कार्यम स्मद्वैरि विनाशनम्।

3-शरणागतदीनार्त परित्राणपरायणे।

सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणी नमोस्तुते।

4-सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।

मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।

5-या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

इन मंत्रों में से भी कर सकते हैं चयन

ऊपर या नीचे के मंत्रों का उपयोग कर आप जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। पहला दिन शैलपुत्री के नाम होता है। उनका ध्यान करते हुए इन मंत्रों में से किसी का चयन करें। फिर शैलपुत्री की पूजा कर मंत्र का जप करें। उसी मंत्र का पूरे नवरात्र में जप अत्यंत कल्याणकारी होगा। मनोकामना पूर्ति भी संभव है।

6-रोगान शेषानपहंसि तुष्टा

रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।

त्वामाश्रितानां न विपन्नाराणां

त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयांति।

7-विदेही देवी कल्याणं विदेही परमां श्रियम्।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जेहि।

8-सर्व मंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते।

9-या देवि सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

10-देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि में परममसुखं

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जेहि

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