भक्त के नौकर बने महादेव, जानिए क्यों सहा अपमान

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भक्त के नौकर बने महादेव, जानिए क्यों सहा अपमान
उगना महादेश का भव्य मंदिर

shiva became devotee’s servant : भक्त के नौकर बने महादेव। अपमान सह कर भी काम करते रहे? यह दुर्लभ घटना हुई मिथिलांचल में। ऐसा अद्भुत संयोग हुआ था महान शिव भक्त महाकवि विद्यापति के घर में। विद्यापति के लिए ही देवाधिदेव महादेव ने नौकर का रूप धरा। कई सालों तक उनके घर चाकरी की। उनकी पत्नी के कटु वचन सुने। कुछ लोगों का मानना है कि विद्यापति की कविताएं शिव को इतनी पसंद आईं कि उन्हें सुनने के लिए वे उनके घर आए। अपना नाम और रूप बदला। उगना के नाम से उनके घर नौकर बने। शिव के इसी रूप का मंदिर मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में है। उगना महादेव या उग्रनाथ के नाम से यह प्रसिद्ध है।

उज्जैन जैसा मंदिर है उगना महादेव

उगना महादेव मंदिर को देखकर उज्जैन की याद आती है। यहां गर्भ गृह में जाने के लिए छह सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। उज्जैन के महाकाल मंदिर में में भी छह सीढिय़ां उतरनी पड़ती है। उगना महादेव के बारे में कहा जाता है कि ये आपरूपी प्रकट हुआ शिवलिंग है। यहां शिवलिंग आधार तल से पांच फीट नीचे है। यह मिथिला का प्रसिद्ध शिव मंदिर है। वहां का वातावरण अत्यंत मनोरम है। माहौल भक्ति में सराबोर करने वाला है। मंदिर परिसर का भव्य प्रवेश द्वार है। माघ कृष्ण पक्ष में नर्क निवारण चतुर्दशी को धूमधाम से मनाया जाता है।

भव्य मंदिर व मनमोहक परिसर

वर्तमान भव्य मंदिर 1932 में बना। मंदिर का परिसर मनमोहक है। मुख्य मंदिर के अलावा परिसर में यज्ञशाला और संस्कारशाला है। मंदिर के सामने के सुंदर सरोवर है। इसके पास ही एक कुआं है। इस कुएं के बारे में कहा जाता है कि शिव ने इसी स्थान से पानी (गंगाजल) निकाल कर प्यासे विद्यापति को पिलाया था। काफी श्रद्धालु इस कुएं का पानी पीने के लिए यहां आते हैं। यह स्थान भक्त के नौकर बने महादेव का प्रमाण है।

उगना महादेव की कथा

मंदिर के पुजारी नारायण ठाकुर कथा सुनाते हैं। वे कहते हैं कि महान मैथिल कवि विद्यापति ने भक्ति परंपरा के कई गीत लिखे। उनके गीत में अद्भुत भाव व संदेश हैं। वे तुलसी,सूर, कबूर, मीरा से पहले के कवि हैं। उनका जन्म मधुबनी के बिसफी गांव में संभ्रांत मैथिल ब्राह्मण गणपति ठाकुर के घर हुआ था। बाद में राजा शिवसिंह ने यह गांव विद्यापति को दे दिया था। इनके पिता गणपति ठाकुर मिथिला नरेश शिवसिंह के दरबार में सभासद थे।

विद्यापति के गीतों में भक्ति की धारा 

मंदिर के पुजारी नारायण ठाकुर कथा सुनाते हैं। वे कहते हैं कि महान मैथिल कवि विद्यापति ने भक्ति परंपरा के कई गीत लिखे। उनके गीत में अद्भुत भाव व संदेश हैं। वे तुलसी,सूर, कबूर, मीरा से पहले के कवि हैं। उनका जन्म मधुबनी के बिसफी गांव में संभ्रांत मैथिल ब्राह्मण गणपति ठाकुर के घर हुआ था। बाद में राजा शिवसिंह ने यह गांव विद्यापति को दे दिया था। इनके पिता गणपति ठाकुर मिथिला नरेश शिवसिंह के दरबार में सभासद थे।

भगवान शिव को समर्पित महाकवि के गीत

विद्यापति के पदों में राजा शिवसिंह एवं रानी लखमा देई का उल्लेख आता है। वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने महेशवानी और नचारी के नाम से शिवभक्ति पर अनेक गीतों की रचना की। महेशबानी में शिव के परिवार के सदस्यों का वर्णन है। साथ ही शंकर का फक्कड़ स्वरुप को भी दर्शाया है। उन्हें दुनिया के लिए दानी, अपने लिए भिखारी का वेष लिखा है। भूत-प्रेत, नाग, बसहा बैल का सुंदर समन्वय है। नचारी में भक्त शिव को अपना दुख नाचकर सुनाता है।

विद्यापति के घर नौकर बने भोलेनाथ

कहा जाता है कि विद्यापति की भक्ति और रचनाओं से प्रसन्न होकर शिव एक दिन वेष बदलकर उनके घर आ गए। शिव जी ने अपना नाम उगना बताया। शिव सिर्फ दो वक्त के भोजन पर नौकरी करने के लिए तैयार हो गए। इस तरह भक्त के नौकर बने महादेव। एक दिन उगना विद्यापति के साथ कहीं जा रहे थे। तेज गर्मी से विद्यापति का गला सूखने लगा। आस-पास जलस्रोत नहीं था। उन्होंने उगना से कहा कि कहीं से जल लाओ। उगना कुछ दूर जाकर अपनी जटा खोलकर एक लोटा गंगा जल भर लाए। विद्यापति ने जब पीया तो उन्हें गंगा जल का स्वाद लगा।

कवि को संदेह हो गया। उन्होंने उगना के चरण पकड़ लिए। उगना को अपने वास्तविक रूप में आना पड़ा। शिव ने शर्त रखी कि किसी को मेरा परिचय मत देना। परिचय दिया तो मैं चला जाऊंगा।

जब शिव गए तो शोक में विद्यापति ने गीत लिखे

एक दिन विद्यापति की पत्नी सुशीला ने उगना को कोई काम दिया। उगना उस काम को ठीक से नहीं समझा। वह गलती कर बैठा। सुशीला इससे नाराज हो गयी। वह चूल्हे से जलती लकड़ी लेकर लगी शिव जी की पीटने। विद्यापति ने यह दृश्य देखा नहीं गया। अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा ‘ये साक्षात भगवान शिव हैं, इन्हें मार रही हो?Ó कवि के मुंह से यह शब्द निकलते ही शिव अंतर्ध्यान हो गए। कवि घोर पश्चाताप में खो गए। खाना-पीना सभी छोड़ दिया। वह उगना, उगना, उगना रट लगाने लगे। उस समय महाकवि ने एक गीत लिखा। उगना रे मोर कतय गेलाह। कतए गेलाह शिब किदहुं भेलाह।

उगना महादेव।

कैसे पहुंचें उगना महादेव मंदिर

देश के प्रमुख स्टेशनों से दरभंगा की सीधी ट्रेन है। वहां से मधुबनी जाने वाली रेलवे लाइन पर उगना हाल्ट पड़ता है। वहां से उगना महादेव मंदिर करीब दो किलोमीटर दूर है। दरभंगा से बस से भी जाया जा सकता है। वहां से पंडौल पहुंचें। पंडौल के पास ब्रहमोतरा गांव भवानीपुर की दूरी चार किलोमीटर है। पैदल या फिर निजी वाहन से जा सकते हैं।

साभार-विद्युत प्रकाश मौर्य

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