दिन रात बरसती है ईश्वरीय कृपा, पाने के लिए पात्र बनें

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जुलाई से कम हो सकता है महामारी का प्रभाव
जुलाई से कम हो सकता है महामारी का प्रभाव।

God shower blessings : दिन रात बरसती है ईश्वरीय कृपा। यह प्रसिद्ध बात आपने भी सुनी होगी। सवाल उठता है कि दिन-रात बरसती है रहमत तो हमें मिलती क्यों नहीं? यह एक बड़ा प्रश्न है। मैंने एक संत से यही सवाल पूछा था। उन्होंने जवाब दिया कि आसमान से पानी बरस रहा है। उस पानी को हम किसी बर्तन में जमा कर सकते हैं। यदि बर्तन में छेद रहेगा तो कितना भी पानी बरसे, उसे जमा नहीं कर सकते हैं। यही हालत हमारी भी है। दिन-रात बरसती है रहमत और हम उसे संभाल नहीं पाते हैं। व्यक्ति पात्र ही नहीं रहेगा तो दिन-रात बरसती रहमत को वह संभाल कर नहीं रख सकेगा।

धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है

विद्या ददाति विनयम, विनयाद्याति पात्रत्वाम, पात्रत्वाम धनमाप्नोति, धना धर्म: तत: सुखम। अर्थ। विद्या से विनय की प्राप्ति होती है, विनयशील होकर व्यक्ति में पात्रता आती है। पात्र बनने से व्यक्ति के पास धन आता है। धन से धर्म होता है और धर्म से सुख होता है। यानी, सीधे धन से सुख नहीं होता है। इस विचार का विश्लेषण करते हैं। जिस विद्या से विनय की प्राप्ति ना हो वह नाश का कारण बनती है। इसका सबसे बड़ा रावण है। उससे बड़ा विद्वान कोई नहीं हुआ। जब रावण की मृत्यु हो रही थी, उस समय राम ने लक्ष्मण को उनके पास भेजा था। कहा, जाओ लक्ष्मण, कुछ ज्ञान लेकर आओ।

ज्ञान लेने के लिए झुकना सीखो

लक्ष्मण चल दिए रावण से ज्ञान लेने। उन्होंने रावण से तीन बार ज्ञान देने का अनुरोध किया। लेकिन, रावण ने कोई जवाब नहीं दिया। लक्ष्मण लौट कर भगवान राम के पास आ गए। उन्होंने कहा, प्रभु। मैंने तो रावण से ज्ञान देने का काफी अनुरोध किया लेकिन रावण ने कुछ नहीं कहा। भगवान राम ने पूछा, तुम कहां खड़े हुए थे। लक्ष्मण ने कहा, मैं रावण के सिर के पास खड़ा था। भगवान राम ने कहा कि यदि तुम्हें ज्ञान लेना है तो पहले झुकना सीखो। किसी से ज्ञान लेने के लिए उसके सिर के पास नहीं बल्कि पैरों के पास खड़ा होना चाहिए। दिन-रात बरसती है ईश्वरीय कृपा, पाने के लिए पात्र बनें।

शुभ कार्य को शीघ्र करें

ज्ञान देने वाला गुरु होता है। रावण के समक्ष अभी तुम विजेता नहीं, शिष्य हो। उस जैसे विद्वान धरती पर कम ही हैं। इस बार लक्ष्मण पुन: रावण के पास पहुंचे। उनके पैरों के पास खड़े हुए। उन्होंने विनम्र होकर ज्ञान देने का अनुरोध किया। रावण प्रसन्न हुआ और लक्ष्मण को तीन बातें बताईं। पहली बात रावण ने कहा कि शुभ कार्य को शीघ्र कर लेना चाहिए। अशुभ कार्य को जितना संभव हो, टालने का प्रयास करें। मैं प्रभु श्रीराम को पहले नहीं पहचान सका और उनकी शरण में आने में देर कर दी। यह मेरे विनाश का एक कारण बना। मैंने अशुभ कार्य अर्थात भगवान राम से शत्रुता और उनसे युद्ध को प्राथमिकता दी। इस कार्य को शीघ्र किया। और शुभ कार्य, यानी उनसे संधि नहीं की। इसी कारण मेरी यह गति हुई है।

शत्रु को छोटा नहीं समझें

रावण ने बताया कि शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। मैंने मानवों और बंदर-भालुओं को तुच्छ समझा। मैंने यमराम तक पर आक्रमण किया। लेकिन, यही मेरी भूल थी। मैंने सोचा कि वानर-भालु की सेना मेरा क्या बिगाड़ सकेगी। उसी सेना ने मेरे गर्व को चूर-चूर कर दिया। शत्रु को छोटा समझना बड़ी भूल है। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई तुच्छ नहीं होता। मैंने ब्रह्मदेव से वरदान मांगते समय कहा था कि मुझे मनुष्य और वानरों को छोड़ कर कोई ना मार सके। मैं इन्हें तुच्छ समझता था। इसी ने मेरे अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।

विद्या से विनय न आना विनाशकारी

यहां हम यह देख सकते हैं कि विद्या से रावण ने विनय की प्राप्ति नहीं की। इसी कारण उसका विनाश हुआ। बिल्कुल उसी तरह से जैसे कि दिन-रात बरसती है रहमत, कोई पात्र न हो तो क्या करें। भगवान राम ने भी लक्ष्मण को विद्या लेने के पूर्व विनयशील होने की आवश्यकता बताई। यानी कि विद्या से पहले विनय की प्राप्ति होती है। विद्या प्राप्त होने के बाद भी विनयशील ना होने के कारण संसार का सबसे शक्तिशाली योद्धा रावण, जिसकी नाभि में अमृत था, का भी विनाश हो गया। इसी कारण जीवन में यह आवश्यक है कि विद्या प्राप्त करने के साथ ही समय विनयशील हो जाएं। जब पेड़ों में फल लगते हैं तो वे झुक जाते हैं। जो नहीं झुकता वही आंधी में टूटता है। झुकने वाली कोमल घास सही-सलामत रहती है। 

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विनयशीलता से पात्रता आती है

विनयशील होकर व्यक्ति पात्र बनता है। जब तक व्यक्ति में विनय नहीं आता है, तब तक वह पात्र नहीं बनता है। अर्थात, दिन-रात बरसती है ईश्वरीय कृपा, पाने के लिए पात्र बनें इस संबंध में भी एक कथा है। एक बार कुबेर ने भगवान शिव को भोजन के लिए आमंत्रित किया। भगवान शिव समझ गए कि कुबेर के मन में अहंकार समा चुका है। उन्होंने गणेश जी को भेज दिया। गणेश जी पलक झपकते ही सारा भोजन चट कर गए। धनपति कुबेर ने काफी इंतजाम किया लेकिन वे गणेश जी की भूख शांत नहीं कर सके। तब वे दौड़ कर मां पार्वती के पास पहुंचे। मां पार्वती ने अपने हाथ से दो निवाले खिलाए। इसके बाद गणेश जी की भूख शांत हुई। तो विनयशील होने से व्यक्ति में पात्रता आती है। पात्रता के बाद व्यक्ति धन को रखने के लायक होता है। 

पूत कपूत तो का धन संचय

कहा भी गया है, पूत कपूत तो का धन संचय, पूत-सपूत तो का धन संचय। यानी किसी भी हालत में व्यक्ति को धन संचय की जरूरत नहीं रहती। सब कुछ चरित्र पर ही निर्भर रहता है। मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने ढेर सारा धन संचित कर लिया। खुद जीवन भर कोई सुख नहीं भोगा, सिर्फ यही सोचा कि आने वाली पीढिय़ां सुख से जीएंगी। यदि पुत्र ही कुपुत्र निकल गया तो जीवन भर पाई-पाई कर जोड़ी गई संपत्ति वह क्षण में उड़ा देगा। अत: यदि पुत्र कुपुत्र निकल जाता है तो धन संचय की कोई आवश्यकता नहीं रहती है।

धन से धर्म प्राप्त करें

धन से धर्म प्राप्त करना चाहिए क्योंकि धर्म से ही सुख मिलता है। यानी, सीधे धन से सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। कई लोगों को लगता है कि धन आ गया तो सुख की प्राप्ति हो जाएगी। लेकिन, ऐसा नहीं है। मान लें कि आपके पास काफी सारा धन है। आज जी भरकर दुनिया के सारे काम कर लेंगे। लेकिन, कब तक? एक दिन इन सबसे मन ऊबेगा। अंततः एक ना एक दिन सब छूटना ही है। तब अपने सत्कर्म ही सहायक सिद्ध होंगे। यानी धन के बाद मनुष्य को धर्म का सहारा लेना चाहिए। धर्म से ही सच्चा सुख होता है। धर्म और कीर्ति ही संसार में रहती है। 

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