क्यों जरूरी है आरती और क्या हैं इसके फायदे

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बिना तोड़फोड़ वास्तु दोष दूर कर ग्रहों को अनुकूल बनाएं
बिना तोड़फोड़ वास्तु दोष दूर कर ग्रहों को अनुकूल बनाएं। प्रतीकात्मक तस्वीर।

Why aarti is important and what are its benefits : क्यों जरूरी है आरती और क्या हैं इसके फायदे। अधिकतर लोग इससे अनजान हैं। उन्हें पता ही नहीं कि आरती कैसे करना चाहिए? आरती का महत्व क्या है? यह कितने प्रकार की होती है? वास्तव में आरती बहुत महत्वपूर्ण है। पूजा में कमी रह गई। आप उसकी विधि ही ठीक से नहीं जानते हैं। फिर भी यदि आरती ठीक से कर ली तो सारी कमी पूरी हो जाती है। आइए जानें कि क्यों जरूरी है आरती और क्या हैं इसके फायदे? यह भी जानें कि इसे कैसे करना चाहिए?

परमात्मा की भक्ति में डूबना है आरती

परमात्मा की भक्ति में डूब जाना आरती है। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। इसका अर्थ है विशिष्ट तरीके से प्रकाशित करना। अर्थात पूजा से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दे। उसे ही आरती कहते हैं। यह आरती करने वाले के व्यक्तित्व को उज्जवल कर देती है। पूजा में कोई खामी हो जाए तो आरती उसे भी खत्म कर देती है। स्कंद पुराण के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता है। पूजा की विधि भी नहीं जानता है। लेकिन भगवान की आरती करता है तो उसमें भक्ति के साथ शामिल हों। ऐसी आरती को भगवान पूजा सहित पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं। आरती के बिना पूजा अधूरी रहती है।

आरती में किस सामग्री का क्या मतलब

आरती में सबसे जरूरी है श्रद्धा। इसमें कुछ सामग्री का उपयोग आवश्यक है। रूई के साथ घी की बाती प्रमुख है। घी समृद्धि का प्रतीक है। वह स्निग्धता प्रदान करता है। आरती में भगवान को घी अर्पित करने से जीवन में समृद्धि आती है। बाधाएं दूर होती हैं। कपूर के साथ बाती जलाने से वातावरण पवित्र हो जाता है। नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। सकारात्मक ऊर्जा फैलती है। आरती में घंटी, घंटा, शंख आदि की ध्वनि शुभ मानी जाती है। यथासाध्य इनका प्रयोग करें। कम से कम किसी एक अवश्य हो। इसकी आवाज के साथ गायन से ध्यान एकाग्र होता है। व्यक्ति का अपने देवी या देवता से सीधा संपर्क बन पाता है। मन और शरीर ऊर्जावान बनता है। इस आवाज से बुरी शक्तियां वहां से दूर चली जाती हैं। उम्मीद है कि आपने समझ लिया होगा कि क्यों जरूरी है आरती।

इस तरह से करें आरती

आरती करते हुए मन में ऐसा भाव करें मानो साक्षात ईश्वर की आरती उतार रहे हों। थाल की ज्योति को आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानें। जब भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारता है तो यह पंचारती कहलाती है। आरती से पहले ईष्ट को नमन करते हुए तीन बार फूल अर्पित करें। थाली में विषम संख्या तीन, पांच या सात बत्तियां जलाएं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है। इसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। आरती के लिए पीतल या तांबे की थाली श्रेष्ठ होती है। उसमें पहले कुमकुम से स्वस्तिक की आकृति बना लें। फिर दीप, कपूर आदि प्रज्जवलित करें।

आरती करने की विधि

क्यों जरूरी है आरती के बाद बारी है इसकी विधि की। आरती की थाली को बाईं ओर से शुरू कर दाईं ओर करते हुए घुमाएं। घुमाते समय कोशिश हो कि ऊं की आकृति बने। घुमाने की औसत संख्या सात बार होती है। विशेष, में जाएं तो हर देवी-देवता की संख्या अलग है। सात बार में चार बार चरण, दो बार नाभि और एक बार मुख मंडल हो। चाहें तो फिर सात बार पूरे गोलाकार में भी घुमा लें। आरती के बाद थाल के चारों ओर जल घुमाया जाता है। इसका मतलब प्रज्वलित ज्वाला को शांत करना है। फिर खुद आरती लेकर उपस्थित भक्तों को दें। इसकी शुरुआत अपनी दाईं ओर से करें।

देवी-देवताओं के सामने आरती घुमाने की अलग संख्या

प्रमुख देवी-देवताओं के सामने आरती घुमाने की संख्या अलग-अलग है। भोलेनाथ के सामने तीन या पांच बार घुमाएं। भगवान गणेश के सामने चार बार घुमाएं। भगवान विष्णु के सामने 12 बार घुमाएं। रूद्र के सामने चौदह बार घुमाएं। सूर्य के सामने सात बार घुमाएं। दुर्गा जी के सामने नौ बार घुमाएं। बाकी देवी-देवताओं के सामने सात बार घुमाएं। आपके समक्ष यह स्पष्ट हो गया होगा कि क्यों जरूरी है आरती?

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