गंगा स्नान से क्यों नहीं धुलता पाप, जानें रहस्य

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गंगा स्नान से क्यों नहीं धुलता पाप का रहस्य जानें
गंगा स्नान से क्यों नहीं धुलता पाप का रहस्य जानें

Why sin is not washed away by bathing in the Ganges : गंगा स्नान से क्यों नहीं धुलता पाप का रहस्य जानें। यह सर्वविदित है कि पतित पावनी गंगा में स्नान मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। उनके जल में दैवीय शक्ति है। सामान्य जल से भरे पात्र में गंगा जल के कुछ बूंद डाल देने से पूरा पानी पवित्र हो जाता है। सामान्य स्थिति में घर में बोतल में बंद कर सालों रखने पर गंगा जल खराब नहीं होता है। इसके बाद भी लोगों को ढेर सारे पुण्य कर्म करने पड़ते हैं। तब भी पाप की गठरी उस पर लदी रहती है। यह विस्मित करता है। मन में सहज सवाल उठता है कि क्या सच में गंगा में स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं? यदि हां, तो फिर बाकी धर्म-कर्म की क्या आवश्यकता है? आज इसी प्रश्न और उत्तर पर चर्चा कर रहा हूं।

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए

संत कबीर ने कहा था- नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए। मीन सद जल में रहे, धोये बास न जाए। उनका दोहा गंगा स्नान में पाप न धुलने का रहस्य स्पष्ट करता है। इसमें कोई शक नहीं कि गंगा में एक बार ही स्नान कर लेने से पाप नष्ट हो जाते हैं। लेकिन मानव मन बड़ा जटिल है। स्नान को वह औपचारिकता समझता है। स्नान करते समय भी मन सांसारिक कुचक्रों में उलझा रहता है। ऐसे व्यक्ति का पाप कैसे नष्ट हो सकते हैं? सिर्फ शरीर साफ होने से मन का मैल खत्म नहीं होता है। इसे स्पष्ट करने वाली एक बहुत अच्छी कथा है। शिव-पार्वती की लीला से जुड़ी यह कथा आंखें खोलने वाली है। इस कथा को पढ़ें। फिर स्वयं मनन करें कि कितने लोग सही तरीके से गंगा स्नान करते हैं।

कुंभ के समय शिव-पार्वती भ्रमण पर निकले

बात बहुत पुरानी है। कुंभ मेला चल रहा था। माता पार्वती के साथ भगवान शिव आकाश मार्ग से भ्रमण के लिए निकले थे। भारी जनसमूह को गंगा स्नान करते देख माता ने भोलेनाथ से पूछा। इतनी बड़ी संख्या में लोग कुंभ जैसे पावन अवसर पर गंगा स्नान कर रहे हैं। इसके बाद भी न तो उनका जीवन सुधर पा रहा है और न पाप नष्ट हो पा रहे हैं। इसलिए उन्हें बार-बार तरह-तरह की धार्मिक क्रियाएं करनी पड़ती हैं। कृपया बताएं कि गंगा स्नान से क्यों नहीं धुलता पाप? भगवान मुस्कराए। फिर कहा कि चलिए महादेवी स्वयं इसका कारण देख लीजिए। दोनों अत्यंत सामान्य और निर्धन दंपति के रूप में कुंभ क्षेत्र के पास उतरे। शिवजी कुंभ स्नान कर लौटने वाले मार्ग के किनारे एक दलदली भूमि में आकंठ समा गए। फिर माता से कहा कि वे स्नान कर लौट रहे लोगों से उन्हें निकालने के लिए सहायता मांगें।

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भोलनाथ ने रची लीला, बताई अनोखी शर्त

शिवजी ने माता को बताया कि वह लोगों से कहें कि उन्हें वही व्यक्ति निकाल सकता है जो निष्पाप है। जो पापी है, वह उन्हें निकालने के प्रयास में स्वयं अपनी जान गंवा सकता है। माता ने तदनुसार श्रद्धालुओं ने अनुनय-विनय करना शुरू किया। लोग सहायता के लिए रुकते भी थे, लेकिन शर्त सुनकर आगे बढ़ जाते थे। इसी तरह तीन दिन बीत गए। उन्हें निकालने के लिए कोई आगे नहीं आया। तीसरे दिन के संध्याकाल में एक वृद्ध व्यक्ति रुका और कहा कि वह निकालेगा। माता ने चेताया कि क्या आप पूरी तरह से निष्पाप हैं? यदि नहीं तो खतरे में पड़ जाएंगे। वृद्ध ने कहा कि हां, मैं निष्पाप हूं। अभी गंगा स्नान कर आ रहा हूं। मेरे सारे पाप नष्ट हो चुके हैं। उसके बाद कोई पाप शेष नहीं। उसने आसानी से भोलेनाथ को निकाल दिया।

गंगा स्नान के बाद भी में मन में पाप ढोते लोग

फिर दोनों ने अपनी लीला समेटी और आकाश मार्ग से लौट पड़े। महादेव ने माता को कहा कि देखा आपने। तीन दिन में लाखों लोग गंगा स्नान कर उस मार्ग से गुजरे। उन्होंने आपकी पुकार सुनी। हजारों ने सहायता करनी भी चाही। लेकिन उनके मन में ही विश्वास नहीं था कि स्नान से उनके पाप नष्ट हुए हैं। वे स्वयं को अभी भी पापी मान रहे हैं। अतः उनके जीवन, आचरण और फल में कोई परिवर्तन नहीं आ सकता है। स्नान करने वाले में विरले ही वृद्ध की तरह होते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि वे निष्पाप हो चुके हैं। अब उनका मन और आचरण भी बदल जाएगा। स्पष्ट है कि उनका जीवन भी बदल जाएगा। यही रहस्य है कि गंगा स्नान से क्यों नहीं धुलता पाप?

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