छठ महापर्व पर इस तरह करें सूर्य की आराधना

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मात्र संयोग नहीं किसी से मिलना, इसके पीछे होते हैं कारण
मात्र संयोग नहीं किसी से मिलना, इसके पीछे होते हैं कारण।

Worship sun on Chhath Mahaparva : छठ महापर्व पर इस तरह करें सूर्य की आराधना। छठ की महिमा यूं ही नहीं है। सूर्य ब्रह्मांड के स्वामी नियंत्रक और संचालक हैं। मनोकामनाओं की पूर्ति में उनका जवाब नहीं है। वेदों में भी उनकी महिमा का गुणगान किया गया है। अथर्ववेद के अनुसार, सूर्य ग्रहों और नक्षत्रों के स्वामी हैं। वे तीनों लोकों में ऊर्जा और प्रकाश का संचारण करते हैं। उन पर ही संपूर्ण ब्रह्मांड की संरचना टिकी है।

सूर्य की हर दिशा में आराधना का अलग-अलग फल

सूर्य भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। विभिन्न दिशाओं की ओर मुंह कर आराधना से अलग-अलग फल मिलते हैं। पूर्व की ओर मुख कर आराधना से उन्नति होती है। पश्चिम मुखी होकर करने से दुर्भाग्य का अंत होता है। उत्तर मुख साधना से धन प्राप्त होता है। दक्षिण मुख से रोग, शोक व शत्रु नाश होता है। कार्तिक एवं चैत्र शुक्ल में उपासना से हर मनोकामना पूरी होती है। हर रविवार को सूर्योपासना करने पर चतुर्दिक सुख मिलता है। शुक्ल पष्ठी रविवार के दिन नमक, तेल व तामसी भोजन का त्याग करें। इन तिथियों में सूर्योंपासना से नेत्र रोग दूर होता है।

षष्ठी व सप्तमी सूर्य को प्रिय हैं

कार्तिक शुक्ल पष्ठी व सप्तमी सूर्य को प्रिय है। सप्तमी को उनका आविर्भाव हुआ था। इस पर्व को छठ पर्व के रूप में मनाते हैं। षष्ठी व सप्तमी को नदी या तालाब में भक्त खड़े होते हैं। वे खड़े होकर सूर्यदेव का ध्यान करते हैं। अब लोग घर में गड्ढे या टैंक में स्वच्छ जल भर कर उसमें भी खड़े होते हैं। षष्ठी की शाम को डूबते सूर्य की पूजा होती है। सप्तमी को उदयीमान सूर्य को पूजा जाता है। उन्हें फल एवं पकवानों के साथ दूध व जल से अर्घ्य दिया जाता है। दोनों तिथियों में षष्ठी तिथि को प्रमुखता प्राप्त है। इस दिन डूबते सूर्य की पूजा होती है। अतः छठ महापर्व पर इस तरह करें सूर्य की आराधना।

डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का निहितार्थ 

संध्याकालीन छठ पूर्व को प्रमुखता देने में संदेश निहित है। इसका अर्थ है कि जब तक हम डूबते सूर्य को अर्घ्य नहीं देंगे तब तक उगता सूर्य खुशहाल नहीं होगा। दूसरे शब्दों में बुजुर्गों को सम्मान नहीं देंगे तो नई पीढ़ी उन्नत और खुशहाल नहीं होगी। संस्कारों के बीज बुजुर्गों से ही प्राप्त होते हैं। बुजुर्ग अनुभव रूपी ज्ञान के कारण वेद पुराणों के समान आदरणीय हैं। उनका निरादर नहीं करें। अपितु उनकी सेवा करें। उनसे जीवन का अनुभव रूपी ज्ञान प्राप्त करें। यही संध्याकालीन सूर्य पूजा का तात्पर्य है। इसी संदेश को पूर्ति के लिए भगवान सूर्य सांध्यकालीन अर्घ्य देने वाले भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। छठ महापर्व पर इस तरह करें सूर्य की आराधना।

साभार–डा.राजीव रंजन ठाकुर

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