योग भगाए रोग-2 – बेहतर स्वास्थ्य व साधना की पहली सीढ़ी है आसन

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योग भगाए रोग की इस कड़ी में बेहतर स्वास्थ्य तथा साधना करने के लिए उचित क्षमता हासिल करने के इच्छुक सुधि पाठकों को आसान, प्राणायाम और सूक्ष्य यौगिक क्रियाओं की मौलिक जानकारी दी जा रही है। अगली कड़ी से योग की विभिन्न मुद्राओं और उसके फायदे के बारे में अलग-अलग जानकारी दी जाएगी। यदि इस दिशा में आपकी रूचि हो तो इन सारी कड़ियों को ठीक से पढ़ना और समझना आवश्यक है। अन्यथा आप कई जरूरी जानकारी से वंचित रह जाएंगे।


आसन : बेहतर स्वास्थ्य हासिल करने, साधना के लिए पात्र बनने, व्यक्तित्व विकास तथा आत्मनियंत्रण के लिए आसन पहली सीढ़ी है और इसका अभ्यास अत्यावश्यक है। इसके लिए निरंतर अभ्यास करना होगा। पहले आप पद्मासन, भद्रासन, सिद्धासन या सुखासन आदि ऐसे किसी भी आसान में जिसमें आप लंबे समय तक स्थिर चित्त बैठ सकते हैं, बैठ जाएं। चाहें तो सामान्य रूप से पालथी ही मार लें। इसका मकसद लंबे समय तक आसन विशेष में बैठने का अभ्यास करना है। अतः बैठने के तरीके से ज्यादा इस पर ध्यान देना चाहिए कि किस तरह से आप एक ही आसन पर बैठ सकते हैं। ऋषियों ने बीमार, शारीरिक रूप से अयोग्य आदि को दीवार से टेक लगाकर या किसी भी अन्य सुखकर आसन में बैठ कर यौगिक क्रियाएं करने की भी सलाह दी है।


प्राणायाम : श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना और उस पर ध्यान एकाग्र करना ही प्राणायाम है। श्वास को प्राणवायु कहते हैं। इस पर नियंत्रण का मतलब शरीर (स्वास्थ्य सहित) और मन पर नियंत्रण पाना है। प्राणायम में सबसे पहले शांत चित्त एक आसन पर बैठकर सिर्फ श्वास के आवागमन (शरीर के अंदर व बाहर जाने) पर ध्यान केंद्रीत करना होता है। दो से तीन मिनट तक इसका अभ्यास करने के बाद बाद सांस को धीमी गति में जितना ज्यादा खींच सकें खींचें और जितना संभव हो सके रोके रखें। इसके बाद धीरे-धीरे उसे छोड़ना है। इस प्रक्रिया में यह ध्यान रखना होगा कि जितनी देर और गति में सांस खींची गई है, छोड़ने की गति और अवधि उससे थोड़ा ज्यादा ही होगी।  अत: सांस को अंदर रोकते समय यह याद रखें कि स्तंभन की क्षमता के चरम पर न पहुंच जाएं। क्योंकि ऐसी स्थिति में सांस छोड़ने की गति तेज हो जाती है और यह प्राणायाम के नियम के विरुद्ध है। सांसों के लेने व छोड़नेे में ही अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका, कपालभाति और भ्रामरी को भी शामिल किया जाता है लेकिन यह एक अलग प्रक्रिया है और उसके फायदे भी अलग हैं, जिसके बारे में बाद में बताया जाएगा।


सूक्ष्म व्यायाम- इसके तहत हाथ, पैर, उंगलियां आदि के जोड़ों का संचालन पहले बाहर से भीतर फिर भीतर से बाहर के क्रम में किया जाता है। चूंकि शरीर की सारी नसें व शिराएं उगलियों से ही शुरू होती (या जाती) है। अत: इसको करने से नसों, शिराओं एवं हड्डियों में नई ऊर्जा का संचार होता है। उल्लेखनीय है कि बच्चा जब जन्म लेता है तो वह सबसे ज्यादा उंगलियों एवं हाथ-पैर के जोड़ों को ही निरंतर गतिशील रखता है। परिणाम सबके सामने है कि बच्चे का विकास सबसे तेज होता है। इसी सिद्धांत के तहत इन पोरों व उसके जोड़ों के संचालन से शरीर के सारे अवयव सक्रिय होते हैं।


उक्त क्रम को आगे बढ़ाते हुए हाथ के ऊपरी हिस्से से लेकर कंधे तक एवं पैर के ऊपरी हिस्से से लेकर कमर को जोड़ तक सरल मोड़, विपरीत मोड़, सम्मुख एवं कटिचक्र के माध्यम से गतिशील बनाया जाता है। इसके बाद रीढ़ का नंबर आता है। उसके लिए ताड़ासन, तिर्यक, रीढ़ की हड्डी का व्यायाम और सम्मुख कर्षण किया जाना चाहिए। इसके बाद गर्दन को आगे-पीछे, अगल-बगल मोड़ना, चारों तरफ घुमाना, एक दिशा एवं विपरीत दिशा में तीन-तीन बार करना चाहिए। चेहरे, गले की चमड़ी एवं पतली व छोटी मांसपेशियों के लिए व्याघ्रासन उपयुक्त आसन है। इसके साथ ही दोनों हथेली को रगड़ कर चहरे पर नीचे से ऊपर ले जाने से चेहरे में कांति बढ़ती है एवं झुर्रियां खत्म होती हैं। ऐसा प्रतिदिन पांच-पांच बार करना चाहिए। इस विधि से आंखों को सेंकने से उसे भी आराम मिलता है और उसकी चमड़ी ठीक रहती है। आंखों की पुतलियों के ऊपर-नीचे, दाएं-बांए, गोल-गोल (सीधी व विपरीत दिशा) पांच-पांच बार घुमाने से आंखों की बीमारियां नियंत्रित रहती हैं तथा नेत्रज्योति बरकरार रहता है। यदि दिन में यह प्रक्रिया तीन बार कर लें तो नेत्र ज्योति बढ़ जाती है तथा मोतियाबिंद तक नियंत्रित (जिस स्थिति में है, उसी में) हो जाता है। मुंह, होंठ और कंठ को मजबूत एवं कांतिमय बनाने के लिए उसमें हवा भर कर फुलाएं और हवा को बंद मुंह में ही इधर-उधर घुमाएं। इसके साथ ही गले से सांस को छोड़ते समय हं….. की आवाज के साथ सांस छोड़ें।



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