सूक्त 2
(ऋषि-मधुच्छन्दा वैश्वामित्र:। देवता-वायु:, इंद्रवायु, मित्रावरुणो। छंद-गायत्री)
वायवा याहि दर्शते मे सोमा अरंकृता:। तेषां पाहि श्रुधी हवम् ।।1।।
वाय उक्थेभिर्जरंते त्वामच्छा जरितार:। सुतसोमा अहर्विद: ।।2।।
वायो तव प्रपृचंती धेना जिगाति दाशुषे। उरूची सोमपीतये ।।3।।
इंद्रवायु इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम्। इंदवो वामुशंति हि ।।4।।
वायविंद्रश्च चेतथ: सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्रवत् ।।5।। 3
अर्थ–हे प्रिय दर्शन वायो! यहां आ, तेरे निमित्त यह सुसिद्ध सोम रखा है, उसे पीते हुए हमारे वचनों पर ध्यान दो। हे वायो! यह सोम निष्पन्न करने वाले और इसके गुणों को जानने वाले स्तोता तेरा गुणगान करते हुए स्तवन करते हैं। हे वायो! तुम्हारी मर्मस्पर्शी वाणी सोम की कामना से दाता को शीघ्र प्राप्त होती है। हे इंद्र-वायो! यहां सोमरस प्रस्तुत है। यह तुम्हारे लिए ही है। अत: अन्नादि सहित आओ। हे वायो! हे इंद्र! तुम अन्न सहित सोमों के त्राता हो। अत: शीघ्र ही आओ।
वायविंद्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्। मक्ष्वि त्था धिया नरा ।।6।।
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्। धियं घृताचीं साधन्ता ।।7।।
ऋतेन मित्रावरुणा वृतावृधावृतस्पृशा। क्रतुं बृहन्तमाशाथे ।।8।।
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया। दक्षं दधाते अपसम् ।।9।।4
अर्थ–हे वायो और इंद्र! इस सिद्ध किये सोमरस के पास शीघ्र आओ। तुम दोनों ही योग्य पदार्थ को प्राप्त करते हो। पवित्र बल वाले मित्र और शत्रुनाशक वरुण का मैं आह्वान करता हूं। ये ज्ञान और कर्म को प्रेरित करने वाले हैं। ये मित्र, वरुण सत्य से वृद्धि को प्राप्त होने वाले, सत्य-स्वरूप तथा सत्य से विशालता को प्राप्त यज्ञ को संपन्न करने वाले हैं। ये मित्र, वरुण, शक्तिशाली, सर्वत्र व्याप्त हैं और जल द्वारा कर्मों को प्रेरित करते हैं। सब कर्मों और अधिकारों को वश में करने वाले हैं।