प्रकृति की शक्ति और उसके दोहन के तरीके (भाग-1)

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Nature's power

विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के कारण जैसे-जैसे मानव भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न होता जा रहा है, वह प्रकृति से दूर होता जा रहा है। अब विशिष्ट मानसिक और शारीरिक शक्ति तो दूर की बात सामान्य बीमारियों से निपटने में उसे दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो इंसान आज पूरी तरह से भौतिक सुख-सुविधाओं का गुलाम होता जा रहा है। जबकि वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चुका है कि हमारे शरीर में अद्भुत मानसिक व शारीरिक क्षमता है। कई बार शरीर आश्चर्यजनक रूप से खुद रोगों से लड़ लेता है। कई लोग ऐसे हैं जो कुछ ही देर में मोटी किताब पढ़कर उसे याद कर लेते हैं। लेकिन यह अपवाद में है।


वैदिक युग से आज के लोगों की क्षमता की तुलना करें तो साफ है कि उस समय के लोग आज की तुलना में मानसिक और शारीरिक क्षमता के मामले में बहुत आगे थे। ऋषि-मुनि तो प्रकृति का इस हद तक दोहन कर लेते थे कि आज लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। परिणामस्वरूप कथित तर्कवादी व कुछ अधकचरे ज्ञान वाले उस समय के चमत्कार को कपोल कल्पना करार देते हैं। धर्मग्रंथों के साथ ही बड़े वैज्ञानिकों, विचारकों, धर्मगुरुओं एवं उत्प्रेरकों ने भी बार-बार मानसिक शक्ति की महिमा का बखान किया है। इसके साथ ही उन्होंने प्रार्थना (कृतज्ञता) के महत्व की खूब चर्चा की है।


सच यह है कि हम जो कुछ भी सामान्य बुद्धि या कल्पना से सोचते हैं, उसे पूरा करना या पाना संभव है। आवश्यकता है सिर्फ उस स्तर की मानसिक क्षमता और सोच की। इस सिद्धांत के अनुसार विचार ही बीज है। यदि विचार मजबूत है और उसे पाने की दृढ़इच्छाशक्ति है तो हर लक्ष्य को पाया जा सकता है। महान विचारक प्रेंटिस मलफोर्ड (1834-1891) के अनुसार, आपका हर विचार एक वास्तविक वस्तु – एक शक्ति है। धर्मग्रंथों का अध्ययन करें तो एक बात बार-बार कही गई है कि हमारे साथ जो कुछ भी होता है, वह आकस्मिक नहीं, बल्कि हमारे विचार, प्रयास एवं कर्मों का ही फल होता है। जाहिर है कि इनमें हम बदलाव कर अपनी मौजूदा स्थिति में फेरबदल कर सकते हैं। समस्या यह है कि हमारे विचार और कर्मों में एकरूपता नहीं आ पाती है। वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चुका है कि एक व्यक्ति के मस्तिष्क में प्रति 24 घंटे में 60 हजार विचार आते हैं। इसी तरह आम आदमी के कर्मों में एकरूपता और निरंतरता की कमी होती है। जाहिर है कि जब इंसान के विचार और प्रयास में एकरूपता और निरंतरता की कमी होगी, तो लक्ष्य तक पहुंचना संभव नहीं हो सकेगा।


हमारे धर्मग्रंथों में मनुष्य को सुखी और इच्छानुसार (वैध और नैतिक) जीवन बिताने की ही क्षमता विकसित करने के तरीके बताए गए हैं। उसका पालन कर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लोगों के विचारों एवं कर्मों में एकरूपता और निरंतरता का आना तय है। ध्यान दें कि योग, ध्यान, प्रार्थना, कृतज्ञता एवं मंत्रों का प्रयोग हमें सीधे लाभ पहुंचाने वाले हैं। करोड़ों लोग इसका लाभ उठा भी रहे हैं। दुर्भाग्य से इस दिशा में वैदिक काल के बाद शोध का क्रम रुक जाने से बदलते समय और आवश्यकता के अनुसार उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता है। परिणामस्वरूप प्रयोग करने वाले भी न तो उसे ठीक से समझ पाते हैं और न उसका भरपूर लाभ उठा पा रहे हैं। जिन लोगों ने इस गुर को आंशिक रूप से भी समझ लिया, वह जीवन में अत्यंत सफल हुए। बिना अपवाद के सभी महापुरुषों ने विचार, कल्पना, ध्यान, प्रार्थना एवं कृतज्ञता के महत्व को स्वीकार किया है।


महान विचारक और प्रेरक चार्ल्स विलमोर (1854-19948) के अनुसार, आध्यात्मिक खजाना जिससे सारी दिखने वाली दौलत मिलती है, कभी खाली नहीं होता है। यह हर समय आपके पास है और आपकी आस्था और मांगों के अनुरूप प्रतिक्रिया करता है।



(जारी)

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