मैहर में आज भी आकर पहली पूजा करते हैं आल्हा-ऊदल

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मैहर में आज भी आकर पहली पूजा करते हैं आल्हा-ऊदल
मैहर में आज भी आकर पहली पूजा करते हैं आल्हा-ऊदल

Even today Alha-Udal performs the first worship in Maihar : मैहर में आज भी आकर पहली पूजा करते हैं आल्हा। धार्मिक पर्यटन में इस बार आपको देश के इकलौते मां सरस्वती यानी शारदा माई के मंदिर के बारे में बताते हैं। यहां मां सती का हार गिरा था। इस शक्तिपीठ में भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। अतः सालों पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। रात में दो से पांच बजे के बीच मंदिर के पट बंद रहते हैं। इसकी खोज आल्हा-ऊदल ने की थी। वे माता के अनन्य भक्त थे। माता ने आल्हा को अमरत्व का वरदान दिया है। मान्यता है कि आज भी मंदिर में पहला दर्शन और पूजा आल्हा करते हैं। इसी कारण रात दो से सुबह पांच बजे तक यहां कोई नहीं आता है। पुजारी जब प्रातः यहां आते हैं, मां के चरणों में ताजा पुष्प चढ़ा पाते हैं।

महान योद्धा थे आल्हा-ऊदल

आल्हा-ऊदल वही प्रसिद्ध वीर हैं जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान से भी लड़ाई की थी। उसमें ऊदल शहीद हो गए थे। तभी गुरु गोरखनाथ पहुंचे और उन्होंने आहत आल्हा से वचन लिया कि वे पृथ्वीराज चौहान के वध का संकल्प नहीं लेंगे। उसके बाद आल्हा ने संन्यास ले लिया। यहां एक तालाब भी है जहां दोनों भाई स्नान कर मां की पूजा करते थे। दोनों भाई जिस अखाड़े में कुश्ती करते थे, उसे आज भी देखा जा सकता है। मां के प्रमुख भक्तों में आल्हा-उदल, मछला, ईदल हैं। कलियुग के भक्तजनों में भाई रैदास और मंदिर के प्रधान पुजारी देवी प्रसाद पांडे प्रमुख रहे हैं। भाई रैदास ने मनमांगी मुराद पूरी होने पर पूरा जीवन मां को समर्पित कर दिया था। उन्होंने अपने पिता से अपना सिर कटवाकर मां के चरणों में चढ़वा दिया था। मंदिर के प्रधान पुजारी देवी प्रसाद जी ने अपनी जीभ काटकर देवी को चढ़ा दी थी।

बाद में मां के आशीर्वाद से उन्हें नई जीभ प्राप्त हुई। विक्रम संवत 559 में मां की मूर्ति की यहां स्थापना की गई थी। यहां स्थापित शिलालेख में लिखा है कि सरस्वती के पुत्र दामोदर कलियुग में व्यास मुनि कहे जाएंगे। प्राचीन काल से यहां पशु बलि देने की परंपरा थी जो 1822 में बंद कर दी गई।

यहीं गिरा था मां सती का हार


मैहर नाम अपभ्रंश है जो मां के हार के नाम पर पड़ा। स्थानीय लोग मानते हैं कि यहां मां सती का हार गिरा था। यही माई हार बाद में मैहर हो गया। नवीं-दसवीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने यहां पूजा की थी। भगवती सरस्वती को विद्यादात्री माना जाता है। उनका वाहन हंस है। रंग चंद्रमा के समान धवल है। इनकी चार भुजाएं हैं। एक  में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथा हाथ वर मुद्रा में है। मान्यता है कि मां सरस्वती रोज एक समय के लिए हर व्यक्ति की जिह्वा पर विराजती हैं और उस समय उसकी कही गई बात सत्य हो जाती है। मां की मूर्ति के बगल में दरवाजे से सटी नृसिंह भगवान की मूर्ति है, जबकि दूसरी तरफ भैरव की मूर्तियां हैं। मंदिर के पिछली दीवार कालिका माई नाम से प्रसिद्ध है। मैहर में आज भी मां की उपस्थिति अनुभव होती है।


मुराद पूरी होने पर मां काली का रूप धारण करते हैं भक्त


मान्यता के अनुसार हाथों पर चंदन लगा कर कालिका मां की दीवार को स्पर्श करने से भक्तों की मुराद पूरी होती है। यहां थोड़ी दूर पर मां दुर्गा की भी मूर्ति है। यहां जवा नाम का उत्सव मनाया जाता है। जवा स्थानीय भाषा में घड़ा का एक नाम है। मां जिसकी मुराद पूरी करती है, वे लोग मां काली का रूप धारण कर उत्सव में नाचते-गाते चलते हैं। लड़कियां माथे पर जवा नाम का विशेष प्रकार का घड़ा लेकर चलती हैं।
पहले यहां बलि प्रथा चलती थी। उसे 1910 में मां के स्वप्न में मिले आदेश पर मैहर के तत्कालीन महाराजा बृजनाथ सिंह जूदेव ने बंद करा दिया।

ऐसे पहुंचें मैहर

जबलपुर और प्रयागराज के बीच स्थित है मैहर। यहां रेलवे स्टेशन भी है। यदि आपके आसपास से सीधी ट्रेन न हो तो जबलपुर या प्रयागराज पहुंच कर ट्रेन या बस से मैहर पहुंचा जा सकता है। यह ठहरने के लिए उचित दर पर कई छोटे-छोटे होटल उपलब्ध हैं। बजट कम हो तो धर्मशाला में भी रुक सकते हैं। मंदिर पहाड़ी पर स्थित है। उसकी चढ़ाई श्रमसाध्य है। हालांकि सरकार की ओर से रोप-वे की भी व्यवस्था की गई है। उससे जाना आसान होता है। वैसे तो कई धार्मिक स्थलों पर लोग मंदिर प्रांगण में भी रात बिता लेते हैं लेकिन इस मंदिर में रात बिताने की अनुमति नहीं है। मान्यता के अनुसार रात में रहने वाला अगले दिन का सूरज नहीं देख पाता है।

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