लघु बोध कथाएं

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प्याज और लहसुन अमृत समान, फिर व्रत में परहेज क्यों
प्याज और लहसुन अमृत समान, फिर व्रत में परहेज क्यों।

सच्ची प्यास का अर्थ

वास्तव में जिन्हें ईश्वर और जीवन में कुछ पाने की तमन्ना होती है, वे वाद-विवाद में नहीं पड़ते पर जिनकी प्यास सच्ची नहीं होती, वे ही वाद-विवाद में पड़े रहते हैं। वे साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ते। अगर भगवान नहीं हैं तो उनका जि़क्र क्यों? और अगर भगवान हैं तो फिर फिक्र क्यों?:” मंजि़लों से गुमराह भी, कर देते हैं कुछ लोग। हर किसी से रास्ता पूछना अच्छा नहीं होता..अगर कोई पूछे जिंदगी में क्या खोया और क्या पाया …तो बेशक कहना…जो कुछ खोया वो मेरी नादानी थी और जो भी पाया वो रब की मेहरबानी थीखूबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच में। ज्यादा मैं मांगता नहीं और कम वो देता नही….जन्म अपने हाथ में नहीं, मरना अपने हाथ में नहीं; पर जीवन को अपने तरीके से जीना अपने हाथ में होता है, मस्ती करो मुस्कुराते रहो, सबके दिलों में जगह बनाते रहो। एक बार किसी रेलवे प्लेटफॉर्म पर जब गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला। ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी, ऐ लड़के इधर आ। लड़का दौड़कर आया। उसने पानी का गिलास भरकर सेठ की ओर बढ़ाया तो सेठ ने पूछा, कितने पैसे में? लड़के ने कहा – पच्चीस पैसे। सेठ ने उससे कहा कि पंदह पैसे में देगा क्या? यह सुनकर लड़का हल्की मुस्कान के साथ पानी वापस घड़े में उड़ेलता हुआ आगे बढ़ गया। उसी डिब्बे में एक महात्मा बैठे थे। उन्होंने यह नजारा देखा कि लड़का मुस्कराया पर मौन रहा। जरूर कोई रहस्य उसके मन में होगा। महात्मा नीचे उतरकर उस लड़के के पीछे-पीछे गए। वह बोले : ऐ लड़के ठहर जरा, यह तो बता तू हंसा क्यों? वह लड़का बोला, महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को प्यास तो लगी ही नहीं थी। वे तो केवल पानी के गिलास का रेट पूछ रहे थे। महात्मा ने पूछा -लड़के, तुझे ऐसा क्यों लगा कि सेठजी को प्यास लगी ही नहीं थी।लड़के ने जवाब दिया -महाराज, जिसे वाकई प्यास लगी हो वह कभी रेट नहीं पूछता। वह तो गिलास लेकर पहले पानी पीता है। फिर बाद में पूछेगा कि कितने पैसे देने हैं? पहले कीमत पूछने का अर्थ हुआ कि प्यास लगी ही नहीं है।


हास्य कथा – ” रावण का चमत्कार या राम की शक्ति ? ” 

श्रीराम के नाम से पत्थरों के तैरने की खबर जब लंका पहुँची, तब वहाँ की जनता में तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं- कि भैया जिसके नाम से ही पत्थर तैरने लगे, वो आदमी क्या गज़ब होगा। इस तरह की चर्चाओं से परेशान लंकाधिपति रावण ने तैश में आकर घोषणा करवा दी कि कल रावण के नाम लिखे हुए पत्थर भी पानी में तैराये जायेंगे। अगले दिन लंका में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया गया।  निश्चित दिन और समय पर सारी जनता लंकाधिपति रावण का चमत्कार देखने पहुँच गयी। तय समय पर रावण अपने भाई-बँधुओं, पत्नियों तथा अपने सभासदों-नौकरों के साथ वहाँ पहुँचा और एक भारी से पत्थर पर उसका नाम लिखा गया। मजदूरों ने पत्थर उठाया और उसे समुद्र में डाल दिया– पत्थर सीधा पानी के भीतरजनता सांस रोके इस सारे प्रकरण को देख रहे थी। इस दौरान रावण लगातार मन ही मन में कोई मँत्रोच्चारण कर रहा था। अचानक, पत्थर वापस पानी के ऊपर आया और तैरने लगा। लंका की जनता पागल सी हो गयी, और ‘लँकेश की जय’ के कानफोड़ू नारों ने आसमान को गुँजायमान कर दिया। 
एक शानदार समारोह के बाद रावण अपने लाव-लश्कर के साथ वापस अपने महल में चला गया और जनता को भरोसा हो गया कि ये राम तो बस ऐसे ही हैं। पत्थर तो हमारे महाराज रावण के नाम से भी तैरते हैं। पर उसी रात को मँदोदरी ने नोटिस किया कि रावण बिस्तर पर लेटा हुए बस छत को घूरे जा रहा था। मंदोदरी ने पूछा ” क्या हुआ स्वामी? फिर से चिंता ने घेर लिया है जिसके कारण नींद नहीं आ रही क्या?” दवा दराज मे पड़ी है लेकर आऊँ? मँदोदरी ने पूछा।
“मंदोदरी! रहने दो, आज तो इज़्ज़त बस लुटते-लुटते बच गयी। आइंदा से ऐसे रिस्क वाले प्रयोग नहीं करूंगा।” छत को लगातार घूर रहे रावण ने जवाब दिया। मंदोदरी चौंक कर उठी और बोली, “ऐसा क्या हो गया स्वामी?” रावण ने अपने सर के नीचे से हाथ निकाला और छाती पर रखा और बोला, ” वो आज सुबह याद है पत्थर तैरा था?” मंदोदरी ने एक मनमोहक हंसी के साथ हाँ मे सर हिलाया। “पत्थर जब पानी में नीचे गया था, उसके साथ साथ मेरी साँस भी नीचे चली गयी थी। “रावण ने कहा। इसपर कन्फ्यूज्ड मँदोदरी ने कहा, “पर पत्थर तो वापस ऊपर भी तो आ गया था ना? और फिर तैरता भी रहा। वैसे, आप ऐसा कौन सा मंत्र पढ़ रहे थे जिससे पानी में नीचे गया भारी पत्थर वापस आकर तैरने लगा?” इस पर रावण ने एक लंबी साँस ली और बोला, “मंत्र-वंत्र कुछ नहीं पढ़ रहा था बल्कि बार-बार बोल रहा था कि ‘हे पत्थर! तुझे राम की कसम, प्लीज डूबियो मत भाई !!”



राम नाम मेँ है दम!! बोलो, जय श्री राम !! 

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