एक ही पिता की संतान हैं सभी जातियों के लोग (अंतिम भाग)

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समुद्र मंथन से हुई देव-दानवों में समन्वय की शुरुआत

समुद्र मंथन में पहली बार दोनों ने एक साथ मिलकर कोई काम शुरू किया हालांकि यह एकता चली नहीं लेकिन इसका सूत्रपात अवश्य हो गया। समुद्र मंथन में निकली हुई वारुणी को असुरों ने ले लिया। असुरों ने अमृत कलश को भी छीन लिया। उनमें आपस में झगड़ा होने लगा कि पहले कौन पीये। कुछ दुर्बल दैत्य ही बलवान दैत्योंझ का ईर्ष्यालवश विरोध करने तथा न्यालय की दुहाई देने लगे कि देवताओं ने हमारे बराबर परिश्रम किया, इसलिए उनको यज्ञभाग समान रूप से मिलना चाहिए। नशा उतरने पर असुरों ने देखा कि उनके साथ धोखा हुआ। उन्होंने देवताओं पर धावा बोल दिया। पुनः देवासुर संग्राम हुआ। इस बार असुरराज बेहोश हो गए पर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से उन्हें फिर ठीक कर दिया। नारदजी के आग्रह पर कि देवताओं को अभीष्ट प्राप्त हो चुका है, युद्ध बंद हुआ। देवता और असुर अपने-अपने लोक चले गए।


बाद के दिनों में परस्पर सहयोग तथा एकजुट प्रयत्न में और बढ़ोतरी हुई। इसी दौरान एक राष्ट्रीय जीवन की खोज हुई। कृषि और पशुपालन के गुण व महत्ता को भी दोनों ने सीखा और उसे अपनाया। इस प्रकार एक ओर जहां सामाजिकता के सर्वश्रेष्ठ भावों का निर्माण हुआ, वहीं दूसरी ओर लौकिक उन्नति भी हुई। यह सभ्यता के दोहरे कार्य की ओर पहला कदम था। सबका समन्व‍य करता हुआ, सहिष्णु, एकरस सामाजिक जीवन के निर्माण से समाज मे स्थायित्व आया। इस मंथन से एश्वर्य तथा संपदा के साथ मानव को वारूणी भी प्राप्त हुई। असुर व असुरों के उपासक, जो प्राकृतिक शक्तियों के ज्ञान में आगे थे, पर रजोगुण एवं तमोगुण प्रधान थे, वारूणी पीकर मदहोश हो गए। इसलिए उनके पल्लेथ अमृत नहीं पड़ा। वे एकरस सांस्कृथतिक जीवन के अंग न बन बसे। फिर भी एक विशाल प्रयत्न सभी प्रकार के लोगों को मिलाकर साथ चलने का अध्यवसाय हुआ और इसी से प्रारंभिक समृद्धि, सामर्थ्यल और लौकिक संपदा एकरस सामाजिक जीवन की खोज में मिलीं। तदुपरांत ब्रह्मा, शिव एवं विष्णु ने वामन-अवतार संधि द्वारा बलि एवं उसके समर्थक असुरों को पाताल (अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि)  भेज दिया एवं देव व उनके समर्थक  मानव, असुर, दैत्य व नाग आदि अन्य मानवेतर जातियां समस्त यूरेशिया, अफ्रीका में फ़ैल गए इस काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ, वीर, योद्धा, भक्त एवं महान व्यक्तित्वों को अर्ध-देव व देव श्रेणी में आने का सम्मान मिलना प्रारम्भ हो चुका था। जैसे इंद्र का मित्र वृषाकपि बलि को इंद्र पद प्राप्त होना, हनुमान का पूज्य देवों में सम्मिलित होना |


सुर-असुर की व्याख्या ऋग्वेद में

ऋग्वेदिक मंडलों में सृष्टि उत्पत्ति सूक्तों में सुर का अर्थ तात्विक अर्थ पदार्थ रचना के सृजनशील मूल प्राकृतिक सृष्टि कणों (शक्तियों) को कहा गया है एवं असृजनशील व सृजन में बंधता बाधा उत्पन्न करने वाले कठोर रासायनिक बंधनों को बनाने वाले कणों को ( शक्तियों को ) असुर कहा गया है |


–-ऋग्वेद १/२२/२२६ में मंत्र है..

तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यति सूरय: दिबीव चक्षुराततम |

अर्थात सूरयः (सुर) = विद्वान्, ज्ञानी जन अपने सामान्य नेत्रों ( ज्ञान चक्षुओं ) से अदृष्ट देव ईश्वर विष्णु को देखते हैं| तथा “ —मद्देवानाम सुरत्वेकम || ( ऋक.3/५५) ..सभी महान देवों का सुरत्व, अर्थात अच्छे कार्य हेतु बल संयुक्त है, एक ही है | अदिति के सबसे ज्येष्ठ व प्रतापी पुत्र सूर्यदेव के कारण सभी देवों को सुर कहा गया। असुर शब्द असुअर्थात प्राण’, और अर्थात वाला’ (प्राणवान् अथवा शक्तिमान) से मिलकर बना है। बाद के समय में धीरे-धीरे असुर भौतिक शक्ति का प्रतीक हो गया। ऋग्वेद में असुरवरुणतथा दूसरे देवों के विशेषण रूप में व्यवहृत हुआ है, जिसमें उनके रहस्यमय गुणों का पता लगाता है। असुर देवों के बड़े भ्राता हैं एवं दोनों प्रजापति के पुत्र हैं। आर्यों के मूल धर्म में सर्वशक्तिमान भगवान के अंशस्व रूप प्राकृतिक शक्तियों की उपासना होती थी। ऋग्वेद में सूर्य, वायु, अग्नि, आकाश और इंद्र से ऋद्धि-सिद्धियां मांगी जाती थीं। यही देवता हैं। उक्त देवताओं के ऊपर विष्णु और विष्णु से ऊपर ब्रह्म ही सत्य माना जाता था। बाद में अमूर्त देवताओं की कल्पना हुई जिन्होंने असुरकहा गया। जो प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन भी कर सकते थे, मानवता एवं सांसारिक हित एवं भौतिक प्राप्ति हेतु | ‘देवतथा असुरये दोनों शब्दि पहले देवताओं के अर्थ में प्रयोग होते थे। ऋग्वेद के प्राचीनतम अंशों में असुरइसी अर्थ में प्रयुक्तश हुआ है। वेदों में वरुणको असुरकहा गया और सबके जीवनदाता सूर्यकी गणना सुरतथा असुरदोनों में है। कृष्ण को भी ऋग्वेद में कृष्णासुर कहा गया है।


ऋग्वेद ८/९६/७५८४ में इंद्र का कथन है–द्रप्सम पश्यंविषुयोचरस्तमुपह्वरे नद्यो अन्शुमत्या:। भो त कृष्णमवत स्थिवांस मिस्यामि वो वृषणो।।

अर्थात— हमने अंशुमती तट ( यमुना तट ) पर गुफाओं में घूमते हुए कृष्णासुर को सूर्य के सदृश्य देख लिया है | हे मरुतो! संग्राम में हम आपके सहयोग की अपेक्षा रखते हैंबाद में कर्म के नियमानुशासन की प्रतिबद्धता से संयुक्त होने पर अति-भौतिकता पर चलने वालों को असुर एवं संस्कारित मानवीय व उच्चकोटि के सदाचरण के गुणों को सुर कहा गया। देवशब्द के लिए सुर का प्रयुक्तो करने लगे और असुरका अर्थ राक्षसकरने लगे। ऋग्वेद में यम अपनी बहन यमी से उसकी कामेच्छा जनित मांग के अनुचित कार्य हेतु किसी असुर से संपर्क के लिए कहता है।


ऋग्वेद १०/१०/८८६७ में यम का कथन है

न ते सखा सख्यं वष्टये वत्सलक्ष्यामद्वि पुरुषा भवतिमहष्पुमान्सो असुरस्य वीरा दिवोध्वरि उर्विया परिख्यानि।।

अर्थात— हे सखी! आपका यह सहयोगी आपके साथ इस प्रकार के संपर्क का इच्छुक नहीं है क्योंकि आप सहोदरा बहन हैं| हमें यह अभीष्ट नहीं है। आप असुरों के वीर पुत्रों, जो सर्वत्र विचरण करते हैं की संगति करें। परवर्ती युग में असुर का प्रयोग देवों (सुरों) के शत्रु रूप में प्रसिद्ध हो गया।


असुर के अन्य अर्थ

असुर शब्द के अर्थ को लेकर भी विद्वानों में मतभिन्नता है। विभिन्न लोग इसकी अलग-अलग व्याख्या करते हैं। यहां मैं उनमें से कुछ प्रमुख व्याथ्या को यहां दे रहा हूं।

1 वैदिक काल में वह जो सुर या देवता न हो, बल्कि उनसे भिन्न और उनका विरोधी हो। ईशोपनिषद में असुर्यानाम ते लोका अन्धें तमावृता अन्धकार के अज्ञान में रहने वाले लोग असुर | ऋग्वेद १०/१०८ सरमा प्रकरण में केवल प्राण रक्षा में लिप्त प्राणियों को असुर कहा गया है।

2. प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार दैत्य या राक्षस।

3. इतिहास और पुरातत्त्व से आधुनिक असीरिया देश के उन प्राचीन निवासियों की संज्ञा जिन्हें उन दिनों असुर कहते थे और जिनके देश का नाम पहले असुरिय आधुनिक असीरिया था। वे ही ईरान के अहुर कहलाये।

4. नीच वृत्ति वाला और असंस्कृत पुरूष। भारत में रामायण काल तक दो तरह के लोग हो गए। एक वे जो सुरों को मानते थे और दूसरे वे जो असुरों को मानते थे। अर्थात एक वे जो ऋग्वेद को मानते थे और दूसरे वे जो अथर्ववेद को मानते थे। महाभारत एवं अन्य प्रचलित दूसरी कथाओं के वर्णन में असुरों के गुणों पर प्रकाश डाला गया है। साधारण विश्वास में वे मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों की कोटि में आते हैं। वस्तुतः रामायण काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ व्यक्तियों, वीर, योद्धा, एवं महान व्यक्तित्वों व देवों के सहायकों, मित्रों, भक्त आदि को अर्ध-देव व देव श्रेणी में सम्मिलित किये जाने का सम्मान मिलना प्रारम्भ हो चुका था | उदाहरण स्वरुप वैदिक वृषाकपि जो इंद्र का मित्र है ( जिसे कुछ लोग परवर्ती काल में हनुमान के रूप में देव कोटि ग्रहण करना मानते हैं)। पुराणों में आये उल्लेखों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण के उदय से पूर्व कंस ने यादव गणतंत्र के प्रमुख अपने पिता और मथुरा के राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर निरंकुश एकतंत्र की स्थापना करके अपने को सम्राट घोषित किया था। उसने यादव व आभीरों को दबाने के लिए इस क्षेत्र में असुरों को भारी मात्रा में ससम्मान बसाया था, जो प्रजा का अनेक प्रकार से उत्पीड़न करते थे। श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ही आभीर युवकों को संगठित करके इनसे टक्कर ली थी। ब्रज के विभिन्न भागों में इन असुरों को जागीरें देकर कंस ने सम्मानित किया। मथुरा के समीप दहिता क्षेत्र में दंतवक्र की छावनी थी, पूतना खेंचरी में, अरिष्ठासुर अरोठ में तथा व्योमासुर कामवन में बसे हुए थे। परंतु कंस वध के फलस्वरूप यह असुर समूह या तो मार दिया गया या फिर ये इस क्षेत्र से भाग गये।


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