धन प्राप्ति और रोग नाश के लिए रामबाण हैं यह मंत्र

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ब्रह्मांड को संचालित करने वाली शक्ति को जानने-समझने और अपने अंदर उसे जागृत कर मनोवांछित फल पाने में मंत्रों का असाधारण योगदान होता है। मंत्रों में अद्भुत और असीमित शक्तियां निहित हैं। हर मंत्र भले एक-दूसरे से जुड़े नजर आ रहे हों पर अपने आप में पूर्ण होते हैं। साधक विभिन्न मंत्रों का प्रयोग विभिन्न शक्तियों को प्राप्त करने के लिए करते हैं। यदि गुरु मिले तो सर्वोत्तम, अन्यथा खुद भी शुद्ध हो कर शुभ मुहूर्त में संकल्प लेकर मनोयोग से मंत्र का जप प्रारंभ करें। यदि मंत्र को सिद्ध करने के लिए संबंधित देवी के यंत्र को भी शामिल कर लें और उसे सामने स्थापित कर पूजन करने के उपरांत साधना प्रारम्भ करें तो सफलता निश्चित मिलेगी। मंत्र से थोड़े कम लेकिन यंत्र और टोटके भी प्रभावशाली होते हैं और लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बनते हैं। आइए इस लेख में हम जाने कुछ खास मंत्र व टोटकों के बारे में।


धन प्राप्ति के अचूक उपाय

शनिवार के दिन पीपल का एक पत्ता तोड़कर उसे गंगाजल से धोकर उसके ऊपर हल्दी तथा दही के घोल से अपने दाएं हाथ की अनामिका अंगुली से ह्रीं लिखें। इसके बाद इस पत्ते को धूप-दीप दिखाकर अपने बटुए में रखे लें। प्रत्येक शनिवार को पूजा के साथ वह पत्ता बदलते रहें। यह उपाय करने से आपका बटुआ कभी धन से खाली नहीं होगा। पुराना पत्ता किसी पवित्र स्थान पर ही रखें।


काली मिर्च के 5 दाने अपने सिर पर से 7 बार उतारकर 4 दाने चारों दिशाओं में फेंक दें तथा पांचवें दाने को आकाश की ओर उछाल दें। यह टोटका करने से आकस्मिक धन लाभ होगा। अचानक धन प्राप्ति के लिए सोमवार के दिन श्मशान में स्थित महादेव मंदिर जाकर दूध में शुद्ध शहद मिलाकर चढ़ाएं। अगर धन नहीं जुड़ रहा हो तो तिजोरी में लाल वस्त्र बिछाएं। तिजोरी में गुंजा के बीज रखने से भी धन की प्राप्ति होती है। जिस घर में प्रतिदिन श्रीसूक्त का पाठ होता है, वहां लक्ष्मी अवश्य निवास करती हैं।


किसी भी प्रकार के रोगों को झाड़ने का मंत्र :-

ऊं ऐं श्रीं ह्रीं ह्रीं स्फ्रें ख्फ्रें ह्सौं ह्स्फें ह्सौं ऊँ नमो हनुमते स्फोटकं क्षतज्वरमैकाहिकं द्वयहिकं चातुर्थिकं संततज्वरं सान्निपातिकज्वरं भूतज्वरं मंत्रज्वर-शूल-भगन्दर- मूत्रकृच्छ्र-कपालशूल-कर्णशूला-ऽक्षिशूलोदरशूल-हस्तशूल-पादशूलादीन सर्वव्याधीन् क्षणेन भिन्धि-भिन्धि छिन्दी छिन्दी नाशय नाशय निकृन्तय निकृन्तय छदेय छेदय भेदय भेदय महावीर हनुमान घे घे ह्रीं ह्रीं हूं हूं फट् स्वाहा।

प्रयोग विधि : शनिवार व मंगलवार के दिन श्रीहनुमान जी का ध्यान और प्रणाम कर कुशा या चाकू से दस मंत्र को पढ़ते हुए रोगी को झाड़ने से समस्त रोग समूल रूप से नष्ट हो जाते हैं।


भूत-प्रेत आदि समस्त विघ्न बाधाओं को झाड़ने का मंत्र :- 

‘ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं ह्रीं स्फ्रें ख्फ्रें ह्सौं ह्स्फें ह्सौं ऊँ नमो हनुमते महाबलपराक्रम मम परस्य च भूत-प्रेत-शिाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षिनी-पुतना-मारी-महामारी-कृत्या-यक्ष-राक्षस-भैरव-वेताल-ग्रह-ब्रहाग्रह-ब्रह्मराक्षसा-दिकजात-क्रूरबाधान क्षणेन हन हन जम्भय जम्भय निरासय निरासय वारय वारय बन्धय बन्धय नुद-नुद सूद-सूद धुनु धुनु मोचय मोचय मामेनं मामेनं च रक्ष रक्ष महामाहेश्वर रुद्रावतार हा्र हा्र हा्र हुं हुं घे घे घे हूं फट् स्वाहा।

प्रयोग विधि : श्री हनुमान जी का ध्यान कर भूत-प्रेत आदि बाधाग्रस्त रोगी पर उपर्युक्त मंत्र को पढ़ते हुए पीला सरसों का दाना फेकने से उपरोक्त सभी बाधाएं शीघ्र दूर हो जाती है।


तंत्र

संस्कृत के तन धातु से तंत्र शब्द की उत्पत्ति हुई है। ‘तन का अर्थ- विस्तार एवं सर्वव्यापकता है। ‘त्र का अर्थ है त्राण। यानी मुक्ति करने वाला या लाभ करने वाला। यह एक उपासना पद्धति है। भगवान शिव इसके जन्मदाता हैं। इसके सिद्धांत को गुप्त रखने का प्रावधान है। झाड़-फूंक, जादू-टोने से भी इसका गहरा संबंध है।


यंत्र

यंत्र कई प्रकार के होते हैं। इसे सामथ्र्य एवं आवश्यकता के अनुसार स्वर्ण, रजत, ताम्र या भोजपत्र पर शुभ मुहूर्त में बनाया जाता है। यंत्रों में विन्दु, त्रिभुज, चतुर्भुज, स्वस्तिक, कमल, पदमदल इत्यादि बने होते हैं।
यंत्रों पर ध्यान केन्द्रित करके साधक अपने इष्टदेव या किसी लोक-परलोक की आत्मा या शक्ति से संंबंध स्थापित कर सकते हैं। महर्षि दत्तात्रेय को यंत्र विद्या का जनक माना जाता है। क्योंकि भगवान शिव ने सारे मंत्र-तंत्र को दानवों के दुरुपयोग से बचाने के लिए कीलित कर दिया। बाद में महर्षि दत्तात्रेय ने ज्यामितिय कला के द्वारा वृत्त, त्रिकोण, अद्र्धवृत्त, चतुष्कोण को आधार बनाकर बीज मंत्रों की सहायता से इन शक्तियों को रेखांकित करके विशिष्ट पूजा-यंत्रों का आविष्कार किया। गुरु गोरखनाथ एवं शंकराचार्य का समय तंत्र विद्या का स्वर्णिम काल था।


अशोक वृक्ष का महत्व

किसी विशेष कार्य के लिए जाते समय यदि अशोक वृक्ष का एक पत्ता तोड़कर अपने पास रखें तो कार्य सफल होगा। अशोक वृक्ष के फूल को प्रतिदिन सिल पर पीसकर शहर मिलाकर लगातार खाने से भाग्य दोष और दरिद्रता दूर होती है। इसके तीन पत्तों को प्रतिदिन सुबह खाली पेट चबाने से मानसिक तनाव दूर होता है।
1.अशोक वृक्ष के बीज को तांबे के ताबीज में डालकर गले में धारण करने से सभी प्रकार के लाभ होते है।
2. चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी का व्रत रखने तथा अशोक की आठ पत्तियों को खाने से स्त्री की संतान कामना पूर्ण होती है।



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