छठ पर विशेष : हर मनोकामना की होती है पूर्ति

333

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाने वाला छठ महापर्व सूर्योपासना का अमोघ अनुष्ठान है। मान्यता है कि इससे हर तरह की मनोकामना पूरी होती है, खासकर स्वास्थ्य और संतान प्राप्ति के लिए इससे बेहतर कोई और प्रचलित माध्यम उपलब्ध नहीं है। दुःसाध्य बीमारियों से मुक्ति के लिए भी यह साधना अमोघ है। वैदिक साहित्य पर भी नजर डालें तो सनातन धर्म के पांच शीर्ष देवताओं में भगवान भास्कर का प्रमुख स्थान है। वाल्मीकि रामायण में तो साफ जिक्र है कि रावण से युद्ध लड़ते-लड़ते बुरी तरह से थक चुके भगवान श्रीराम ने आदित्य हृदय स्तोत्र के द्वारा सूर्यदेव का स्तवन कर ही उसे मार पाने में सफलता हासिल की। किया गया है उससे उनके सर्वशक्तिमयस्वरूप का बोध होता है। चार दिवसीय इस पर्व के बारे में मान्यता है कि पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए मनाया जाता है।
रामायण के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया था और सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
सूर्य देव ने कुंती को कलंक से मुक्ति दिलाई
महाभारत के अनुसार कुंती पांच पुत्रों की माता थी और छठी माता के रूप में उन्हें कलंकित होना पड़ा था। माता को कलंक से मुक्ति दिलाने के लिए कर्ण ने गंगा में सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया। इसके बाद भगवान सूर्य कर्ण के पास आए और अंग की जनता के समक्ष उन्हें अपना पुत्र माना। इस प्रकार कुंती की पवित्रता कायम रही। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के भक्त थे। वह प्रतिदिन घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। वहीं जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था, जिससे उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।
देवी भागवत में भी छठ
देवी भागवत पुराण के अनुसार राजा स्वयंभू मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत नि:संतान थे। तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियव्रत की पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ लेकिन वह मृत पैदा हुआ। दु:खी होकर राजा शिशु के शव को लेकर शमशान पहुंचे और पुत्र को हृदय से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगे। तभी वहां एक अति सौदर्यमयी देवी प्रकट हुई। उनकी दिव्य आभा से अभिभूत हो राजा ने पुत्र के शव को पृथ्वी पर रखकर देवी की पूजा- अर्चना की। प्रसन्न होकर देवी ने कहा राजन मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना हूं। गौरी पुत्र कार्तिकेय से मेरा विवाह हुआ है। मैं सभी मातृकओं में विख्यात स्कंद की पत्नी हूं। मूल प्रकृति के छठे वंश से मेरी उत्पत्ति हुई है। जिस कारण मैं षष्ठी कही जाती हूं। हे राजन मैं पुत्रहीन को पुत्र, पत्नीहीन को पत्नी, धनहीन को धन तथा कर्मवीरों को उनके श्रेष्ठ कर्मों के अनुरुप फल देती हूं। मैं तुम्हारे इस पुत्र को जीवित करती हूं। यह गुणी ज्ञानी और कमलकांति से युक्त होगा। यह भगवान नारायण की कला से उत्पन्न है इस कारण यह सुब्रत नाम से विख्यात होगा। इस तरह अपना परिचय देकर तथा शिशु को राजा को सौंपकर देवी अंतर्धान हो गयी। यह घटना कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को घटी थी। अत: इस तिथि को षष्ठी देवी की पूजा-अर्चना होने लगी और तभी से यह छठी मइया की पूजा के नाम से प्रचलित है।
लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। षोडस मातृकाओं में एक षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। जबकि मिथिला और अंग क्षेत्र में  धारणा है कि छठ के दौरान पानी में खड़े होने मात्र से ही किसी भी प्रकार के चर्म रोग से छुटकारा मिल जाता है।
साभार–डा.राजीव रंजन ठाकुर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here