वेदों में निहित है वसुधैव कुटुंबकम का भाव

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अक्षय तृतीया तीन मई को
अक्षय तृतीया तीन मई को।

Vasudhaiva kutumbakam’s message lies in vedas : वेदों में निहित है वसुधैव कुटुंबकम का भाव। वास्तव में सनातन धर्म दुनिया के श्रेष्ठतम धर्मों में से एक है। यह पूरे जगत और प्राणी मात्र के कल्याण का संदेश देता है। इसमें कहीं भी किसी को दबाने की बात नहीं है। हर विचारधारा हो इसने स्वीकार किया है। इस क्रम में अवश्य थोड़ी विकृति आ गई है। इस के मूल भाव को समझने के लिए वेदों का अध्ययन करें। फिर सब कुछ पूरी तरह साफ हो जाएगा। इतने सुंदर विचार दूसरी जगह ढूंढना भी कठिन है।

जानें कैसे वेदों में निहित है वसुधैव कुटुंबकम

अथर्ववेद (7/81/5) में सबके कल्याण का संदेश पढ़ें। लिखा है- योस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तस्य त्वं प्राणेना प्यायस्व। आ वयं प्यासिषीमहि गोभिरश्वै: प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन। अर्थात- हे परमात्मन्। हमसे वैर-विरोध व शत्रुता रखने वाले को भी दीर्घायु बना। वह भी फूले-फले। साथ ही हम भी समृद्धिशाली बनें। हम सब मवेशियों, पुत्र-पौत्र और धन-धान्य से भरपूर हों। सबका कल्याण हो। हमारा भी कल्याण हो।

विश्व प्रेम का संदेश

वेद हमें घृणा नहीं सिखाता है। वह सबसे प्रेम का संदेश देता है। अथर्ववेद (7/81/5) में साफ लिखा है। उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुन:। उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुन:। इसका अर्थ है- हे दिव्यगुणयुक्त विद्वान् पुरुषों। आप नीचे गिरे हुए लोगों को ऊपर उठाओ। हे विद्वानों। पतित व्यक्तियों को बार-बार उठाओ। हे देवों। अपराध और पाप करनेवालों को भी ऊपर उठाओ। हे उदार पुरुषों। जो पापाचरणरत हैं, उन्हें बार-बार उद्बुद्ध करो। ऐसे लोगों की आत्म ज्योति को जाग्रत करो।

राजा के लिए संदेश

राजा के लिए भी बहुत साफ संदेश है। उसे सबको साथ लेकर चलने को कहा गया है। उससे संबंधित अथर्ववेद का (8/4/15) में स्पष्ट लिखा है। अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पुरुषस्य। इसका अर्थ है कि यदि मैं प्रजा को पीड़ा देनेवाला होऊं। यदि किसी मनुष्य के जीवन को संतप्त करूं। तो आज ही, इसी समय मर जाऊं।

वेद में ईर्ष्या व घृणा करने वाले की निंदा

सबके प्रति समभाव सनातन धर्म का आधार है। वेदों में निहत है कि ईर्ष्य़ा व घृणा करने वाले का मन मर जाता है। जैसे भूमि जड़ है। उसमें दिल या मन नहीं होता है। उसी तरह ईर्ष्य़ा व घृणा करने वाले का मन भी मर जाता है। इसलिए किसी से घृणा नहीं करें। अथर्ववेद (6/18/2) का संबंधित मंत्र देखें। यथा भूमिर्मृतमना मृतान्मृतमनस्तरा। यथोत मम्रुषो मन एवेर्ष्योर्मृतं मन:।

सभी नागरिकों को साथ लेकर चलने का संदेश

वेद में राष्ट्रहित को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऋषि कहते हैं। जिस राष्ट्र में ज्ञान व बल साथ चलते हैं। यानि ब्रह्मशक्ति व क्षात्रतेज एक होकर रहते हैं। जहां के नागरिक राष्ट्रोन्नति की भावना से भरे होते हैं। मैं उस लोक या राष्ट्र को पवित्र व उत्कृष्ट मानता हूं। ऐसे विचार के कारण सनातन धर्म को श्रेष्ठ कहा जाता है। इसीलिए कहा है कि वेदों में निहित है वसुधैव कुटुंबकम का भाव। नीचे यजुर्वेद का निम्न मंत्र देखें।

यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरत: सह।

तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवा: सहाग्निना। (यजुर्वेद 20/25)

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