मनोरंजन या तंत्र-मंत्र : क्या है इंद्रजाल का मायाजाल

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Indrajaal

इंद्रजाल को लेकर लोगों में भारी भ्रम है। यह एक शानदार कला और मनोरंजन का माध्यम होने के साथ ही रोजगार का रास्ता भी है। दुर्भाग्य से बहुत से लोग इसे तंत्र, मंत्र और यंत्र से जोड़कर देखते हैं और इसके प्रति अच्छी राय नहीं रखते हैं। इसे काला जादू, वशीकरण, सम्मोहन, मारण और मोहन से भी जोड़कर देखने और राक्षसी विद्या मानने वालों की भी कमी नहीं है। इंद्रजाल शब्द का उपयोग भ्रम की स्थिति के लिए किया जाता है। माना जाता है कि यह एक मायावी विद्या है जो भ्रम को ही सच मानने के लिए विवश कर देती है।


फारसी में इसे तिलिस्म कहा जाता है। यह शब्द भारत में भी बहुत प्रचलित है।  इंद्रजाल का उपयोग कुछ धर्म व संप्रदायों के प्रचारक अशिक्षित लोगों को डराकर, सम्मोहित कर या छलपूर्ण तरीके से उन्हें अपना आज्ञाकारी अनुयायी बनाने के लिए किया करते थे। यह क्रम आज भी जारी है। भगवान दत्तात्रेय को इंद्रजाल का जनक माना जाता है। चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में भी इसका उल्लेख किया है। ओडिशा के शासक रहे प्रताप रुद्रदेव ने ‘कौतुक चिंतामणि नाम से एक ग्रंथ लिखा था जिसमें इसी तरह की विद्याओं के बारे में उल्लेख मिलता है। इंद्रजाल के अंतर्गत दर्शकों को सम्मोहित करने के लिए  मंत्र, तंत्र, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, नाना प्रकार के कौतुक, हाथ की सफाई, प्रकाश एवं रंगादि के साथ आश्चर्यजनक खेल, तामाशे आदि सभी का प्रयोग किया जाता है। इंद्रजाल से संबंधित कई किताबें बाजार में प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक बृहत् इंद्रजाल अर्थात कौतुकरत्न भांडागार किताब बहुत ही प्रचलित है।


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इंद्रजाल विद्या

इसके नाम में ही इसका रहस्य छुपा हुआ है। देवताओं के राजा इंद्र को छली कहा गया है। यही इंद्रजाल का भी अर्थ होता है। रावण इस विद्या को जानता था। रावण के दस सिर होने के पीछे भी इसी विद्या का हाथ माना जाता है। रावण सहित सभी राक्षसों को मायावी कहा जाता था। वे अपने दुश्मनों के लिए इंद्रजाल बिछा देते थे जिससे कि दुश्मन भ्रमित होकर उसके जाल में फंस जाता था। आजकल इसे जादूगरों की विद्या माना जाता है। आजकल की भाषा में इसे भ्रमजाल कह सकते हैं। किसी भी व्यक्ति  को कैसे भरमाया जाए और उसे कैसे मनचाहे रूप में इच्छित वस्तुओं या हालात का अनुभव कराया जाए, इसके लिए जो उपाय किए जाते हैं, उसे इंद्रजाल कहते हैं।  इस विद्या का उपयोग करने वाले को ऐंद्रजालिक कहते हैं।


मध्यकाल में इस विद्या का बहुत दुरुपयोग हुआ। युद्ध में विजय, धर्म के विस्तार और व्यक्तिगत स्वार्थ साधने में कई लोगों ने इसका उपयोग किया। चाणक्य के अनुयायी कामंदक ने राजनीति करने वालों और शासन में बैठने की इच्छा रखने वाले लोगों के बारे में कहा है कि लोगों को समूह में मूर्ख बनाना आसान काम नहीं है, वे बातों से नहीं मानते हैं, तर्क करते हैं और तार्किक जवाब दो तब भी वे आक्रमण करते हैं। ऐसे में क्यों न उनके लिए इंद्रजाल किया जाए। यदि बिना कारण ही आसमान में बादल दिखाई दे, अंधकार छा जाए, आग की बारिश होने लगे। अचानक पहाड़ों पर अदभुत दिखाई देने लगे और दूर स्थानों पर बैठी सेनाओं के समूहों में भय व्याप्त हो जाए तो समझना चाहिए कि कोई इंद्रजाल रच रहा है।  दरअसल इंद्रजाल के अंतर्गत कुछ भी हो सकता है, जिससे आपकी आंखें, दिल और दिमाग धोखा खा जाए। आप किसी पर मोहित हो जाओ और उसकी तरीफ करने लगो तो वह भी इंद्रजाल हो सकता है। इंद्रजाल एक बौद्धिक करामात है, बस हमारा दिमाग और आंखे इस करामात का पकड़ नहीं पाती, इसलिए भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है।


जिस चतुराई के स्तर का प्रयोग ट्रोजन हॉर्स जैसे प्रसिद्ध प्राचीन छलों को उत्पन्न करने में किया गया था उसी स्तर का उपयोग मनोरंजन के लिए, या कम से कम पैसे के खेलों में धोखा देने के लिए अनंत काल से किया जाता रहा है। ऐंद्रजालिक के पेशे ने अठारहवीं शताब्दी में मजबूती प्राप्त की और तब से इसकी कई लोकप्रिय रीतियां प्रचलन में रही हैं।


1584 में, रेजिनोल्ड स्कॉट की द डिस्कवरी ऑफ विचक्राफ्ट (जादू टोनों की खोज) प्रकाशित हुई थी। इसे यह दिखाकर कि जादू के इन करतबों को कैसे किया जाता था, यह दिखाने के लिए लिखा गया था कि चुड़ैलों का अस्तित्व नहीं होता था। इस पुस्तक को अक्सर जादू पर पहली पाठ्यपुस्तक समझा जाता है। सभी प्राप्य प्रतियों को 1603 में जेम्स प्रथम के पदारोहण के समय जला दिया गया था और जो शेष बचीं वे अब दुर्लभ हैं। 1651 में फिर से इसका प्रकाशन आरंभ हुआ। एस्केपोलॉजिस्ट और जादूगर हैरी हूडिनी ने रॉबर्ट हूडिन के नाम पर अपना मंचीय नाम रखा था, उन्होंने मंच जादू की चालों की एक शृंखला प्रस्तुत की थी जिनमें से कई उनकी मृत्यु के बाद एस्कोपोलॉजी के नाम से जानी गई।


हंगरीवासी यहूदी धर्मगुरू के पुत्र हूडिनी वास्तव में ताले खोलने और जकडज़ामा से बच निकलने जैसी तकनीक में कुशल थे। वे जादू की तकनीक का पूरा इस्तेमाल करते थे जिनमें नकली उपकरण और दर्शकों के बीच उनके मिले हुए व्यक्ति शामिल थे। हूडिनी का प्रदर्शन कौशल महान था। स्क्रैंटन, पेन्सिलवेनिया में उनको समर्पित एक हूडिनी संग्रहालय है। मनोरंजन के एक स्वरूप के रूप में, जादू आसानी से नाटकीय स्थलों से विशेष टेलीविजन कार्यक्रमों में परिवर्तित हो गया, जिससे छल करने के नए अवसर खुल गए और मंच जादू दर्शकों की विशाल संख्या के सामन पहुंच गया। 20 वीं सदी के प्रसिद्ध जादूगरों में शामिल हैं ओकितो, सिकंदर, हैरी ब्लैकस्टोन सीनियर, हैरी ब्लैकस्टोन जूनियर, हावर्ड थर्स्टन, थिओडोर एनीमैन, कार्डिनी, यूसुफ डनिंगर, दाई वर्नोन, जॉन स्कार्ने, टॉमी वंडर, सिगफ्रायड और रॉय तथा डौग हेनिंग शामिल थे। 20 वीं और 21 वीं सदी के लोकप्रिय जादूगरों में डेविड कॉपरफील्ड, लांस बर्टन, जेम्स रैंडी, पेन और टेलर, डेविड ब्लेन और क्रिस एन्जिल शामिल हैं। ज्यादातर टीवी जादूगर जीवंत दर्शकों के सामने प्रदर्शन करते हैं, जो दूरस्थ दर्शकों को यह आश्वासन प्रदान करता है कि ये भ्रमजाल निर्माणेतर दृश्य प्रभावों के द्वारा प्राप्त नहीं किए गए हैं।


मंच जादू के सिद्धांतों में से कई पुराने हैं। किसी चक्कर में डाल देने वाली बात के वर्णन के लिए कहा जाता है, यह सब धुएं और दर्पण के साथ किया जाता है, लेकिन इन प्रभावों के लिए आज, संस्थापना कार्य की मात्रा और परिवहम की समस्याओं के कारण शायद ही कभी दर्पणों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, मंच इंद्रजाल मिर्च का भूत का उपयोग सबसे पहले 19वीं शताब्दी के लंदन में किया गया था जिसके लिए एक विशेष रूप से निर्मित थिएटर की जरूरत पड़ी थी। आधुनिक कलाकारों ने ताज महल, स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी और एक अंतरिक्ष यान जैसी बड़ी वस्तुओं को अन्य प्रकार के दृश्य धोखों से गायब किया है।



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