ब्राह्मणों के सरनेम, दैनिक कार्य और विधि-विधान अलग-अलग क्यों?

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हम सब जानते हैं कि ब्राह्मण मूल रूप से एक ही हैं, फिर कोई कोई तिवारी तो कोई दुबे, कोई शुक्ला, पाठक, चौबे, शर्मा, मिश्रा, पांडे आदि अलग-अलग सरनेम से क्यों पुकारे जाते हैं? अर्थात उनके उपनाम अलग-अलग क्यों हैं? इसके साथ ही उनके खान-पान, दैनिक कर्म, मंत्र जप की विधि आदि में अंतर क्यों है? इसे स्पष्ट करने के लिए हमें ब्राह्मणों की उत्पत्ति और उसके विकास क्रम को समझना होगा। प्राचीन ग्रंथोंं के विश्लेषण से सब कुछ साफ हो जाता है। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि क्षेत्र, भाषा, परंपरा आदि में बदलाव के बाद भी ब्राह्मणों का मूल चरित्र और मुख्य कामकाज लगभग एक समान रहा है। उनकी स्थिति में कुछ अंतर अवश्य है लेकिन अधिकतर बातें मेल खाती हैं, जो उनके मूल रूप से एक होने का प्रमाण है।


प्रचलित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रह्मा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे। एक वर्ष बीत जाने पर देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणों की समृद्धि के लिये उन्हें  वरदान दिया। वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका क्रमानुसार नाम था– उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ला, मिश्रा, अग्निहोत्री, दुबे, तिवारी, पांंडेय और चतुर्वेदी। इन लोगोंं के जैसे नाम थे वैसे ही गुण। इन लोगों ने नतमस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगोंं को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याएं प्रदान कींं। वे क्रमश: उपाध्यायी, दीक्षिता, पाठकी, शुक्लिका, मिश्राणी, अग्निहोत्रिधी, द्विवेदिनी, तिवेदिनी, पांंड्यायनी और चतुर्वेदिनी कहलायीं। सरस्वती पुत्री उन कन्याओं के अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए। वही सब गोत्रकार कहलाए। उनके नाम हैं– कष्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्रि, वशिष्ठ, वत्स, गौतम, पराशर, गर्ग, अत्रि, भृगडत्र, अंगिरा, श्रंगी, कात्याय और याज्ञवल्क्य। इन नामों से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं। फिलहाल मुख्य रूप से दस प्रकार के ब्राह्मण हैं।


इनमें से उत्तर और दक्षिण भारत के भेद के आधार पर पुन: पांच-पांच के दो वर्गों में विभाजित हैं। वे हैं——- तैलंगा,  महार्राष्ट्रा, गुर्जर, द्रविड, कर्णटिका। यह पांच  “द्रविण” कहे जाते हैं। ये विन्ध्याचल के दक्षिण में पाए जाते हैं। विंध्यांचल के उत्तर में पाये जाने वाले ब्राम्हण हैं– सारस्वत, कान्यकुब्ज, गौड़, मैथिल और उत्कलये। 


उक्त ब्राह्मणों में से उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं। अलग-अलग जगह में बस जाने के कारण इन ब्राह्मणों में क्षेत्रीय गुण और संस्कारों का भी समावेश होता चला गया जिससे न सिर्फ उनके उपनाम बल्कि दैनिक कर्मों में भी अंतर आ गया है। इसे सरलता से समझने के लिए मंत्रों की दुनिया में जाएं तो पाएंगे कि एक ही मंत्र के एक-आध वर्ण/मात्रा, उच्चारण आदि में क्षेत्र के आधार पर थोड़ा अंतर आ जाता है। देवता एवं देवियों की पूजन विधि तक में अंतर होता है। यह विवाद का कोई विषय नहीं हो सकता है। क्षेत्रीय रहन-सहन, खान-पान, आचरण. उच्चारण आदि का असर व्यक्तित्व पर पड़ना स्वाभाविक है। वैसे शाखा भेद के कारण ब्राह्मण अनेक हैं। इनके अलावा संकर जाति के भी ब्राह्मण इनमें शामिल हो गए हैं। उन सबको मिलाकर इनकी संख्या मुख्य 115 की है। हालांकि उन सबों को मिलाकर और उनका सूक्ष्म विश्लेषण करने पर उत्तर व दक्षिण के ब्राह्मणों की संख्या शाखा भेद से 230 के लगभग हैं। उनके भी उपशाखा भेद हुए हैं, जिससे लगभग 300 के करीब ब्राह्मणों भेदों की संख्या का उल्लेख पाया जाता है। इन विवादों और सूक्ष्म चर्चा से परहेज करते हुए उत्तर व दक्षिणी ब्राह्मणों के मुख्य भेद के आधार पर यहां 115 ब्राह्मणों को ही मुख्य मान रहा हूं। इनमें से मुझे सिर्फ 69 तरह के ब्राह्मणों की सूची मिल पाई है। 


उपलब्ध सूची ये है—— (1) गौड़ ब्राह्मण, (2)मालवी गौड़ ब्राह्मण, (3) श्री गौड़ ब्राह्मण, (4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राह्मण, (5) हरियाणा गौड़ ब्राह्मण, (6) वशिष्ठ गौड़ ब्राह्मण, (7) शोरथ गौड़ ब्राह्मण, (8) दालभ्य गौड़ ब्राह्मण, (9) सुखसेन गौड़ ब्राह्मण, (10) भटनागर गौड़ ब्राह्मण, (11) सूरजध्वज गौड ब्राह्मण (षोभर), (12) मथुरा के चौबे ब्राह्मण, (13) वाल्मीकि ब्राह्मण, (14) रायकवाल ब्राह्मण, (15) गोमित्र ब्राह्मण, (16) दायमा ब्राह्मण, (17) सारस्वत ब्राह्मण, (18) मैथिल ब्राह्मण, (19) कान्यकुब्ज ब्राह्मण, (20) उत्कल ब्राह्मण, (21) सरवरिया ब्राह्मण, (22) पराशर ब्राह्मण, (23) सनोडिया या सनाड्य ब्राह्मण, (24) मित्र गौड़ ब्राह्मण, (25) कपिल ब्राह्मण, (26) तलाजिये ब्राह्मण, (27) खेटुवे ब्राह्मण, (28) नारदी ब्राह्मण, (29) चन्द्रसर ब्राह्मण, (30) वलादरे ब्राह्मण, (31) गयावाल ब्राह्मण, (32) ओडये ब्राह्मण, (33) आभीर ब्राह्मण, (34) पल्लीवास ब्राह्मण, (35) लेटवास ब्राह्मण, (36) सोमपुरा ब्राह्मण, (37) काबोद सिद्धि ब्राह्मण, (38) नदोर्या ब्राह्मण, (39) भारती ब्राह्मण, (40) पुश्करर्णी ब्राह्मण, (41) गरुड़ गलिया ब्राह्मण, (42) भार्गव ब्राह्मण, (43) नार्मदीय ब्राह्मण, (44) नन्दवाण ब्राह्मण, (45) मैत्रयणी ब्राह्मण, (46) अभिल्ल ब्राह्मण, (47) मध्यान्दिनीय ब्राह्मण, (48) टोलक ब्राह्मण, (49) श्रीमाली ब्राह्मण, (50) पोरवाल बनिये ब्राह्मण, (51) श्रीमाली वैष्य ब्राह्मण, (52) श्रीमाली वैष्य ब्राह्मण, (53) तांगड़ ब्राह्मण, (54) सिंध ब्राह्मण, (55) त्रिवेदी म्होड ब्राह्मण, (56) इग्यर्शण ब्राह्मण, (57) धनोजा म्होड ब्राह्मण, (58) गौभुज ब्राह्मण, (59) अट्टालजर ब्राह्मण, (60) मधुकर ब्राह्मण, (61) मंडलपुरवासी ब्राह्मण, (62) खड़ायते ब्राह्मण, (63) बाजरखेड़ा वाल ब्राह्मण, (64) भीतरखेड़ा वाल ब्राह्मण, (65) लाढवनिये ब्राह्मण, (66) झारोला ब्राह्मण, (67) अंतरदेवी ब्राह्मण, (68) गालव ब्राह्मण और (69) गिरनारे ब्राह्मण।



यह लेख वरिष्ट पत्रकार और विचारक श्री हरिप्रकाश शर्मा द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित है। इसका मकसद किसी की भावना को आहत करना नहीं, बल्कि शोध की प्रक्रिया को शुरू करना है।



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