खुद को मिटाएं, तभी ब्रह्म को जान सकेंगे (प्रेरक प्रसंग)

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करें राहु को अनुकूल
Parivartan ki awaj

उपनिषद और पुराण को यदि कहानी के रूप में या सीधे ज्ञान के केंद्र के रूप में पढ़ना चाहें तो बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाते हैं क्योंकि उसकी कथा, कथा की धरती और प्रस्तुति की शैली काफी पुरानी हो चुकी है, नई पीढ़ी को सीधे आकर्षित नहीं करती है। लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि वह ज्ञान का भंडार नहीं है। वस्तुतः उसकी महत्ता और उपयोगिता आज भी उतनी ही है, जितनी हजारों साल पहले थी। जरूरत इस बात की है कि उसे आज के परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जाए। इस क्रम में शुरू करता हूं उपनिषद की एक कथा उद्दालक और श्वेतकेतु से।


महान विद्वान उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को बड़े मनोरथ से उच्च शिक्षा के लिए बचपन में ही गुरुकुल भेज दिया। श्वेतकेतु ने वहां मन लगाकर शिक्षा ग्रहण की और हर विषय का प्रकांड विद्वान बन गया। ज्ञान और योग्यता के कारण वह अपने सहपाठियों की तुलना में गुरु का प्रिय भी बन गया। जाहिर है कि इससे अहंकार भी आ गया। सालों जब श्वेतकेतु की शिक्षा पूरी हुई और वह गुरुकुल में ही जवान हो गया तो गुरु की आज्ञा लेकर घर के लिए चल पड़ा। उसकी चाल में मस्ती कम और अकड़ ज्यादा थी। जब वह घर के पास पहुंचा तो सूर्य पीछे से उग रहा था। अंबर में लाली फैल रही थी। पक्षी सुबह के गीत गा रहे थे। उसे दूर से देखकर उद्दालक के मन में खुशी की लहर फैल गई। वह बेटे का स्वागत करने उसकी ओर दौड़ पड़ा लेकिन यह क्या? बेटे को पास देखकर उसकी खुशी काफूर हो गई। उसके मन में अवसाद छा गया और वह उदास हो गया। बाप ने सोचा था कि ज्ञान से भरपूर होकर उसका बेटा विनम्र होकर लौटेगा, पर वह तो अकड़ा हुआ आ रहा था। अकड़ कोसों दूर से ही सामने वाले को महसूस हो जाती है। उसकी अपनी तरंगें ही ऐसी होती है कि सामने वाले को प्रफुल्लता के बदले एक खिंचाव का भाव दे देती थी। दरअसल अहंकार व्यक्ति के ज्ञान और व्यवहार पर एक ऐसा काला पर्दा डाल देता है जिसके पार न तो खुद वह व्यक्ति और न सामने वाला उसे ठीक से देख और समझ पाता है। दोनों में यदि कोई संबंध बन पाता है तो वह अहंकार और उससे उपजे खींचाव का ही होता है।


अतः यहां भी अहंकार से भरे पुत्र और महाज्ञानी व विनम्र पिता के बीच अहंकार और खिंचाव आ गया। पिता को ऐसा लगा कि उसका बेटा ऐसा नहीं आ रहा की कुछ उसके पास कुछ भी ज्ञान हो। अहंकार से भरा वह ऐसे आ रहा था जैसे मूढ़ता से भरा हुआ हो। ऊपर-ऊपर का ज्ञान तो संग्रहित कर लिया लेकिन अंदर से खोखला है। शास्त्रों का किताबी ज्ञान तो हो गया लेकिन सृष्टि और मानवता का नाममात्र भी ज्ञान नहीं लग रहा है। उसके पास अपनी कोई समझ की ज्योति नहीं जली है। अंधेरे शास्त्रों का बोझ लेकर आ रहा है।


बेटा जब नजदीक पहुंचा को पिता ने स्वागत करने के बदले उससे पूछा कि तू क्या सीख कर आया है? गर्व से भरे श्वेतकेतु ने कहा, सब सीख कर आया हूं। कुछ भी छोड़ा नहीं। उसने पिता को एक-एक कर सारे शास्त्रों की गिनती करा दी और बताया कि कितने शास्त्र सीख कर आया है। सब वेद कंठस्थ कर लिए हैं। सब उपनिषद जान लिए हैं। इतिहास, भूगोल, पुराण, काव्य, तर्क, दर्शन, धर्म सब जान लिया है। गुरू द्वारा ली गई सारी परीक्षाओं में बाकी सहपाठियों की तुलना में बेहतर करके आया हूं। बाप ने कहा लेकिन तूने उस एक को जाना, जिसे जान कर सब जान लिया जाता है? उसने कहा कैसा एक? किस एक की बात कर रहे है आप? उद्दालक ने कहा, तूने स्वयं को जाना, जिसे जानने से सब जान लिया जाता है। श्वेतकेतु उदास हो गया। उसने कहा, उस एक की तो वहां कोई चर्चा हुई ही नहीं।


उद्दालक ने कहा, तेरी शिक्षा अधूरी है। तुझे पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए फिर जाना पड़ेगा। क्योंकि हमारे कुल में हम सिर्फ जन्म से ही ब्राह्मण नहीं हैं। हम जान कर ब्राह्मण होते हैं। यह हमारे कुल की परंपरा है। मेरे बाप ने भी मुझे ऐसे ही वापस लौटा दिया था। एक दिन तेरी तरह मैं भी अकड़ कर घर आया था। सोचकर कि सब जान लिया है। सब जान कर आ रहा हूं। लेकिन उस समय मेरे पिता भी उदास हो गये। उन्होंने कहा-वापस जा। उस एक को जान, जिसे जानने से सब जान लिया जाता है। ब्रह्म को जान कर ही हम ब्राह्मण होते हैं। तुझे भी वापस जाना होगा श्वेतकेतु। श्वेतकेतु की आंखों में पानी आ गया। उसने अपने पिता के चरण छुए और वापस चला गया। पिता ने घर के अंदर भी नहीं जाने दिया था। मां ने कहा-बेटा आया है सालों बाद, बैठने को भी नहीं कहा और कुछ खाने को भी नहीं। कैसे पिता हो? लेकिन श्वेतकेतु ने मां के पैर छुए और जल पिया। कहा-अब तो उस एक को जान कर ही तुम्हारे चरणों में आऊंगा। जिसे पिता जी ने जाना है, या जिसे हमारे पुरखों ने जाना है। मैं कुल पर कलंक नहीं बनूंगा।


श्वेतकेतु गुरु के पास वापस लौट गया। उसने गुरु से पूछा-गुरुवर उस एक को जानने के लिए आया हूं। तब गुरु बड़े जोर से हंसे और कहा-गोशाला में चार सौ गायें बंधी हैं। उन्हें जंगल में ले जाओ। जब तक वे हजार न हो जाएं, तब तक नहीं लौटना। एक हजार होने के बाद ही मैं तुम्हें आगे का ज्ञान दूंगा। श्वेतकेतु गायों को लेकर जंगल में चला गया। गायें चरती रहतीं, श्वेतकेतु उन्हें देखता रहता। गायों को तो एक हजार होने में काफी समय लगेगा। वह रहता पेड़ों के नीचे, झील के किनारे, गाएं चरती रहतीं। शाम में जब गाएं विश्राम करतीं तब वह भी विश्राम करता। दिन बीते, रातें बीतीं, ,चाँद उगा, चाँद ढला, सूरज निकला, सूरज डूबा। समय का चक्र धीरे-धीरे चलता रहा। एक समय ऐसा भी आया जब श्वेतकेतु को समय का भी बोध ही नहीं रहा। क्योंकि उसे कोई चिंता नहीं थी, न सुबह की न शाम की। अब गाएं ही साथी हैं। वहां न कोई जान का मतलब था और वैचारिक चिंतन, मनन एवं बहस का। जो सालों तक पढ़ा था, सब निरर्थक लगने लगा था। किससे बात करे? नया क्या करे? कौन का काम करे? कुछ भी  तो नहीं बचा था। श्वेतकेतु का मन खाली होता चला गया। शांत मन से अब वह कभी वह गायों की मनोरम स्फटिक आंखें देखता, तो कभी खुले आसमान में झांकता। चांद, तारे, सूरज और प्रकृति यही उसके अपने हो गए थे और इनमें सबसे अपना था उसका शांत और निर्विकार मन। ऐसे ही सालों गुजर गये।


एक दिन अचानक उसने अपने गुरु को देखा तो उसे पहले की सारी घटना याद हो आई। तब ध्यान आया कि वह तो यहां अपने की तलाश में आया था। उसकी तलाश में आया था जिसे जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता है। गुरु ने कहा- श्वेतकेतु गाएं एक हजार हो गई हैं। अब तू भी गाय के समान हो गया है। तूने उसे भी जान लिया जो पूर्ण से पूर्ण है। लेकिन, श्वेतकेतु इतना पूर्ण हो गया थ कि उसमें कहीं मैं का भाव ही नहीं था। श्वेतकेतु बुद्ध हो गया, अरिहंत हो गया। उसने ब्रह्म को जान लिया था। गुरु ने उसे अपने घर जाने का आदेश दिया। निर्विकार भाव से वह घर की ओर चल पड़ा। इस बार न उसके मन में घर के प्रति कोई अतिरिक्त उल्लास और आकर्षण का भाव था और न चाल में ज्ञानी होने की अकड़। जब श्वेतकेतु अपने घर आया तो ऐसे आया कि उसके पदचाप भी धरा पर नहीं छू रहे थे। जैसे विनम्रता आखिरी गहराइयों को छूती हो। अपने अहंकार को पूरी तरह से मिटा कर आया था। उसके मन और कंधे पर शास्त्र का बोझ नहीं था।  अब थी तो सत्य की निर्भार दशा थी। विचारों की भीड़ न थी। अब ध्यान की ज्योति थी। भीतर एक विराट शून्य था। भीतर एक मंदिर बनाकर आया। एक पूजा गृह का भीतर जन्म हुआ। अपने होने का जो हमें भेद होता है। वह सब गिर गया श्वेतकेतु का, अभेद हो गया था।



 

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