गणेश चतुर्थी 2020 : इन मंत्रों से करें प्रथम पूजनीय को प्रसन्न

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भगवान गणेश के विभिन्न अवतार
भगवान गणेश के विभिन्न अवतार

कोरोना के कारण पिछले वर्षों की तरह गणेश चतुर्थी पर सार्वजनिक कार्यक्रम संभव नहीं है। अभी समय गणेश चतुर्थी पर आप भगवान गणेश की उपासना कर उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं। इससे आपकी मनोकामना पूरी हो सकती है। मंगलमूर्ति भगवान के आगमन और स्वागत की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। उनके प्रादुर्भाव को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। सभी में उन्हें प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला माना गया है। उनके प्रादुर्भाव की तरह पूजन का तरीका भी अलग-अलग है। उत्तर भारत में अधिकतर लोग गणेश चतुर्थी के दिन ही पूजा करते हैं। पश्चिम में प्रतिमा स्थापित कर नौ से दस दिन पूजा कर विसर्जन करते हैं। हाल के वर्षों में उनके भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है। साथ-साथ मिश्रित पूजन पद्धति भी बढ़ी है। आइए उनकी पूजा की तिथि, समय और शुभ मुहुर्त को जानें।

गणेश चतुर्थी और शुभ मुहुर्त

गणेश चतुर्थी 21 अगस्त की रात 11.02 से 22 अगस्त की रात 7.56 बजे तक रहेगी। चूंकि चतुर्थी का सूर्योदय 22 अगस्त को होगा और उस दिन भर चतुर्थी रहेगी। अतः उसी दिन गणेश जी की पूजा शुरू करना उचित होगा। पूजा दिन भर में कभी भी की जा सकती है। लेकिन शुभ समय (अमृत चौघड़िया मुहुर्त) भिन्न स्थानों पर दिन में 10.46 से शाम 4.48 बजे के बीच है। यदि स्थानीय समय और मुहुर्त निकालने में परेशानी हो तो चिंता न करें। आप बेहिचक दिन में 12 से एक बजे के बीच पूजा कर सकते हैं। यह औसत समय सभी जगहों के लिए उपयुक्त होगा। यह पर्व गणेश चतुर्थी के दिन शुरू होकर 10 दिन बाद अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। कुछ लोग उसी दिन और बाकी 11वें दिन प्रतिमा का विसर्जन करते हैं।

पूजन विधि

स्नानादि कर पवित्र हो जाएं। फिर साफ-सुथरे स्थान पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। यह प्रतिमा मिट्टी, सोना, तांबा या गोबर का हो सकता है। बाजार से खरीद कर भी ला सकते हैं। ऐसा संभव नहीं हो तो तस्वीर को सामने रखकर भी पूजा की जा सकती है। इसके बाद कलश में जल भरकर उसमें सुपारी डालें। उसे नए कपड़े से बांध मंत्र से आह्वान कर गणेश जी के साथ स्थापित करें। इसके बाद प्रतिमा पर सिंदूर, केसर, हल्दी, चंदन, फूल आदि के साथ पूजन करें। उन्हें लड्डुओं का भोग चढ़ाएं। बाद में उसे गरीबों एवं ब्राह्मणों में बांट दें। इस दौरान अखंड दीपक जलाएं। इसके साथ समय-समय पर पूजन, भजन, कीर्तन और आरती का दौर चलता रहता है।

चंद्रदर्शन से करें परहेज

शुक्ल पक्ष चतुर्थी को व्रत करने वालों को शाम को चंद्र दर्शन के पश्चात ही भोजन करना चाहिए। हालांकि कई ग्रंथों में गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्लपक्ष) तो कुछ में भाद्रपद शुक्लपक्ष द्वितीया तिथि को चंद्र दर्शन से परहेज करने की सलाह दी गई है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा का दर्शन करने वाला कलंक का भागी होता है। इसका पालन करने की सलाह कई विद्वानों ने दी है। इसका पालन नहीं करने पर भगवान कृष्ण पर मणि की चोरी का कलंक लगा था। इस विचार मैं भी सहमति जताते चंद्र दर्शन से बचने की सलाह देता हूं। फिर भी यदि किसी मजबूरी में या भूलवश चंद्रमा दिख जाए तो बचाव करें। बचाव के लिए निम्न मंत्र का कम से कम 21 बार जप अवश्य कर लेना चाहिए। मंत्र है- सिंहः प्रसेनम् अवधीत सिंहो जांबवता हतः। सुकुमार मा रोदीस्तव ह्येष स्वमंतकः।

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