मनु की नगरी मनाली की देवी हैं हिडंबा, करती हैं मनोकामना पूरी

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मनु की नगरी मनाली की देवी हैं हिडंबा, करती हैं मनोकामना पूरी

hidamba is godes of manali : मनु की नगरी मनाली की देवी हैं हिडंबा। माता हिडंबा हर मनोकामना पूरी करती हैं। हिमाचल के सर्वाधिक आकर्षक क्षेत्र में से एक है मनाली। जब सृष्टि में जलप्रलय की स्थिति आई थी तो मनु ने इसी स्थान पर शरण ली थी। आज भी यह क्षेत्र अद्भुत है। आश्चर्यजनक विवधताओं से भरा है। ऊंचे पहाड़ पर इंद्र का किला है। मान्यता है कि उस तक पहुंचना संभव नहीं है। शहर में आकर्षण का बड़ा केंद्र है माता हिडंबा मंदिर। भीम की पत्नी हिडंबा मनाली की सबसे बड़ी देवी हैं। इलाके के लोगों का कोई काम बिना इस मंदिर में गए पूर्ण नहीं होता है। कहा जाता है कि पर्यटकों के लिए भी बड़ा केंद्र है। वे हिडंबा का दर्शन न करे तो यात्रा सार्थक नहीं हो सकती।  लोगों का विश्वास है कि माता अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं।

मंदिर क्षेत्र में अद्भुत प्राकृतिक दृश्य 

घने देवदार के जंगलों के बीच मां हिडिंबा का मंदिर पैगोडा शैली में बना है। मनाली बस स्टैंड से एक किलोमीटर से थोड़ा ज्यादा की चढ़ाई कर इस भव्य मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। शहर से कुछ ऊपर का यह स्थान ढूंगरी नाम से जाना जाता है। वैसे पहुंचने के लिए रास्ता पूछने वालों को हिडंबा मंदिर कहना ही काफी होता है। मंदिर के अंदर काठ पर उकेरी गई देवी-देवताओं की मूर्तियां मनमोहक है। इस विशाल मंदिर का प्रवेश द्वार काफी छोटा व संकीर्ण है। जबर्दस्त मान्यता के कारण इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है।

मंदिर के ढांचे में फेरबदल माता को स्वीकार नहीं

मंदिर काफी पुराना है। इसका ढांचा व द्वार छोटा है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर की बनावट में फेरबदल कर द्वार को बड़ा करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन माता ने संकेत में इसे अस्वीकार कर दिया। पुजारियों के अनुसार माता को ढांचे में बदलाव स्वीकार नहीं। परिणामस्वरूप दर्शनार्थियों को अक्सर दर्शन में मशक्कत करनी पड़ती है। इसे हिडंबा माता की कृपा ही कहेंगे। मंदिर परिसर पहुंचने पर सारी थकान व सुस्ती छूमंतर हो जाती है। मन उल्लास और उत्साह से भर जाता है।

चढ़ाई जाती थी बलि

मंदिर में बलि चढ़ाने की परंपरा रही है। परिसर में लटके जानवरों के सिंग इसकी गवाही देते हैं। यहां बकरे, मेंढे और भैंसे के काफी सींग हैं। साथ ही यामू, टंगरोल और बारहसींगे के सींग भी टंगे हैं। कुल्लू दशहरा में शरीक होने के लिए देवी हिडिंबा पशु बलि चढ़ाए जाने पर ही आगे बढ़ती हैं। कुल्लू दशहरा का शुभारंभ देवी हिडिंबा को अष्टांगबलि देने के बाद होता है। ये प्रथा सदियों से चली आ रही है। हालांकि कुछ सालों से इस पर रोक लगाई गई है।

करीब पौने पांच सौ साल पुराना है मंदिर

मंदिर करीब पौने पांच सौ साल पुराना है। इसका निर्माण कुल्लू के शासक बहादुर सिंह ने 1553 में करवाया था। दीवारें परंपरागत पहाड़ी शैली में बनी हैं। प्रवेश द्वार काठ नक्काशी का शानदार नमूना है। ये मंदिर पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित है। अप्रैल-मई में मंदिर परिसर में छोटा दशहरा का मेला लगता है। पूरा मनाली क्षेत्र अदभुत है। हिडिंबा मंदिर के अलावा यहां मनु का भी मंदिर है। मनु की नगरी होने के कारण ही इसका नाम मनाली पड़ा। मनु मंदिर की भी शहर में बहुत मान्यता है। आध्यात्म के साथ ही आकर्णक प्राकृतिक दृश्य मन को मोह लेते हैं।

बर्फ का शिवलिंग भी आकर्षण का बड़ा केंद्र

मनाली के पास ही सोलंगनाला है। उसकी प्राकृतिक छटा अद्भुत है। इस क्षेत्र में अनोखा शिवलिंग है। बर्फ से निर्मित यह शिवलिंग आठ माह तक रहती है। हर साल एक ही स्थान व रंगरूप में। इसकी बहुत मान्यता है। शहर के पास ही ऊंची दुर्गम पहाड़ी है। उसे देवराज इंद्र का किला कहा जाता है। मान्यता है कि उस तक पहुंचना असंभव है। लोगों के अनुसार जिसने भी जाने की कोशिश की उसे देवताओं का कोपभाजन बनना पड़ा। वह फिर वहां से जीवित लौट नहीं पाया।

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