भगवान शिव से जुड़े महत्वपूर्ण और जाने-अनजाने रहस्य

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भगवान शिव की उपासना का महीना सावन
भगवान शिव की उपासना का महीना सावन।

कल्पना का है असली महत्व :  आधुनिक विचारक भी ज्ञान और कर्म से पहले कल्पना को ज्यादा महत्वपूर्ण और उर्वर मानते हैं। प्राचीन काल में भगवान शिव ने भी ‘कल्पना’ को ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण बताया था। उन्होंने कहा कि हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया। धर्मों के मूल भगवान शिव की योग, ध्यान, तंत्र, मंत्र आदि विधियां सर्वश्रेष्ठ हैं। शिव के दर्शन और जीवन की कहानी धर्म- ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। पुराण के अनुसार जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है। वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। शिव को आदिदेव भी कहा जाता है। आदि का अर्थ प्रारंभ होता है। शिव को ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। 


ऐसा माना जाता है कि महाभारत काल तक सभी देवता धरती पर रहते थे। महाभारत काल खत्म होने के बाद कलियुग शुरू हुआ और उसके बाद सभी देवी-देवताओं ने धरती छोड़ दी। कलियुग प्रारंभ होने के बाद सभी देवता विग्रह रूप में ही रह गए। इसी कारण कलियुग में विग्रहों की पूजा होती है।


भगवान शिव ने किया था विशालकाय मानवों का वध : कहा जाता है कि ब्रह्मदेव ने विशालकाय मानवों की रचना की थी जिनका बाद में भगवान शिव ने वध कर दिया था। सन् 2007 में नेशनल जिओग्राफिक की टीम ने भारत और अन्य जगह पर 20 से 22 फिट मानव के कंकाल ढूंढ निकाले। भारत में मिले कंकाल को कुछ लोग भीम के पुत्र घटोत्कच और कुछ लोग बकासुर का कंकाल मानते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार सतयुग में इस तरह के विशालकाय मानव हुआ करते थे। बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। पुराणों के अनुसार भारत में दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करती थी। भारत में मिले इस कंकाल के साथ एक शिलालेख भी मिला है। यह उस काल की ब्राह्मी लिपि का शिलालेख है। इसमें लिखा है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अंत में भगवान शंकर ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई। 


पिनाक से हुआ था त्रिपुरासुर का नाश : भगवान शिव ने पिनाक धनुष का निर्माण किया था। उस धनुष की एक टंकार से ही पर्वत हिलने लगते थे और बादल फट जाते थे। इसी धनुष से तीर छोड़ कर भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का विनाश किया था। अंतरिक्ष में मौजूद तीन पुर थे जो काफी कम समय के लिए एक-दूसरे की सीध में आते थे। एक ही तीर में इन तीनों पुरों को बेधने से त्रिपुरासुर नामक तीन भाइयों का विनाश हो सकता था। भगवान शिव ने पिनाक धनुष से तीर छोड़ कर तीनों पुरों का विनाश किया था। इस धनुष से जुड़ी एक और कथा है। राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह के बाद शिव ने इसी धनुष से तीनों लोकों का विनाश करने का निश्चय किया। बाद में देवताओं ने उनका क्रोध शांत किया। इसके बाद शिव ने यह धनुष देवताओं को दे दिया। देवताओं ने इस धनुष को राजा जनक के पूर्वज देवरात को दे दिया था। बाद में माता सीता के स्वयंवर में भगवान राम ने इसी धनुष को तोड़ा था 


शिव ने ही किया था सुदर्शन चक्र का निर्माण : कई देवताओं के पास अलग-अलग चक्र थे। भगवान शिव के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी के चक्र का नाम मृत्यु मंजरी है। सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे विष्णु को सौंप दिया था। विष्णु ने इसे देवी पार्वती को और पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया। परशुराम ने यह सुदर्शन चक्र भगवान कृष्ण को दिया। भगवान शिव का त्रिशूल काफी घातक अस्त्र है। दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति के लिए शिव के त्रिशूल के तीन शूल हैं।


नागवंश से लगाव : शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नागकुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक। नाग वंशावलियों में ‘शेषनाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक’ कुल चलाया था। उक्त पांचों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।


अमरता के जनक शिव : शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज कई शाखाएं हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है। शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है। योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- ‘वामो मागर्: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। मेरुतंत्र में यह बात है। भगवान शिव ने सबसे पहले सप्त ऋषियों को अपना उपदेश दिया था। इन्होंने इस ज्ञान को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया। भगवान शिव ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। उनके द्वारा बताई गई विधियां अनुपम हैं।


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