चित्रकूट में शेष दिन (भाग तीन)

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Chitrakoot

स्फटिक शिला

स्फटिक शिला चित्रकूट से कुछ ही दूरी पर मंदाकिनी के तट पर है। पर्यटकों और श्रद्धलाओं के आकर्षण का यह स्थान बड़ा केंद्र है। नदी के दूसरे छोर पर सुंदर घना जंगल है और कुल मिलाकर मनमोहक प्राकृतिक छटा के कारण यहां आंखों को बड़ी शांति मिलती है। कथा के अनुसार इस शिला पर भगवान राम माता सीता के साथ बैठा करते थे और प्रकृति को निहारा करते थे। यहीं इंद्रपुत्र जयंत कौवे के भेष में सीता के चरणों में चोंच मारकर भागा था और श्रीराम ने सींक का तीर चलाकर दंडित किया था। यह कथा बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन, मुझे जो चीज सबसे रोचक लगी, वह यह कि राम कितने प्रकृति प्रेमी रहे होंगे और कितना चिंतन करते रहे होंगे। उनका सीता जी के साथ प्रेम का एक सुुंदर प्रसंग रामचरित मानस में मिलता है :


एक बार चुनि कुसुम सुहाए।

निजकर भूषण राम बनाए।

सीतहिं पहिराए प्रभु सादर।

बैठे फटिक शिला पर सुंदर।  (अरण्य कांड, )

इस शिला पर राम के पैरों के चिह्न बने हुए दिखाई देते हैं। यहीं पर जयंत ने अपनी एक आंख देकर अपने प्राणों की रक्षा की थी। जयंत की वह आंख भी यहां पत्थर पर अंकित है।


जानकी कुंड: 

स्फटिक शिला से रामघाट की ओर बढ़ने पर जानकी कुंड मिलता है। दरअसल यह मंदाकिनी का एक घाट है जहाँ चित्रकूट प्रवास के दौरान सीता जी स्नान किया करती थीं। यहाँ एक बहुत छोटा सा मंदिर बना हुआ है। सड़क से काफी निचाई पर यह घाट स्थित है और सीढ़ियां उतरकर घाट तक आना पड़ता है। सीढ़ियों पर भिखारियों और कुत्तों का साम्राज्य है। जानकी कुंड पर कुछ फोटो-सोटो खींचकर हम वापस रामघाट अपने होटल आ गए।


हनुमान धारा: 

भोजन और अल्प विश्राम के बाद हमारा कार्यक्रम हनुमान धारा जाने का था। हनुमान धारा रामघाट से ढाई-तीन किमी की दूरी पर एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है। रामघाट से हनुमान धारा तक का रास्ता भी अत्यंत ऊभड़-खाबड़ रास्तों में एक है। समझ में नहीं आया कि जो स्थल भगवान राम का अधिवास रहा हो, जहाँ इतने तीर्थयात्री आते हैं और जिनसे इस पूरे क्षेत्र की जीविका को इतना बड़ा आधार मिला हो, वहाँ की सरकार और प्रशासन सड़कों तथा अन्य सुविधाओं के साथ इतनी उदासीनता क्यों बरत रहा है ?


ऐसे रास्तों पर दस-बीस मील सफर हो करना हो तो शायद शरीर की हड्डियाँ अपना समायोजन फिर से करने लगें। खैर, छोटी सी कष्टप्रद दूरी तय करके हम हनुमान धारा चोटी के पद पर पहुँच गए।

हनुमान धारा काफी ऊँचाई पर स्थित है और वहां तक सीढ़ियां जाती हैं। सीढ़ियां बहुत अच्छी नहीं तो बहुत खराब भी नहीं हैं। हनुमान धारा तक की सीढ़ियों तक वही धर्मालयी बुराइयाँ। दोनों तरफ भिखारियों का झुंड जो कृत्रिम रूप से दयनीय शक्ल बनाकर, बिगड़ी आवाज और घिसे-पिटे अभिनय करके ‘भक्तों’ का दिल पिघलाते हैं और अपना कटोरा भरते हैं। हो सकता है कि कुछ असमर्थ होते हों, कुछ किसी बड़ी भीख कंपनी के शिकार होते हों, परंतु वे मुझ जैसे तार्किक ‘भक्त’ को ज्यादा चिढ़ाते हैं जो स्वस्थ्य और जवान होते हुए भी लोगों की दयालुता का भयंकर दुरुपयोग करते हैं। दूसरा उनका आतंक जो किसी पत्थर के पास हनुमान जी की सिंदूर पुती मूर्ति रखकर या पत्थर पर ही सिंदूर पोतकर लोगों की धार्मिक भावना का दोहन करते हैं। अब तो श्रद्धा के ध्यान रखते हुए काली माँ, साईं बाबा या दुर्गा जी को यन्त्र-तंत्र इन महात्माओं द्वारा रख दिया जाता है। हनुमान धारा तक जाने वाली लगभग पांच सौ सीढ़ियों पर न जाने कितने ‘भगवान’ और कितने भिखारी बैठे मिल जाते हैं जो अपने ‘आर्द्र’ स्वर से आपकी यात्रा को खाते रहते हैं, बशर्ते आप वाकई ‘बड़े भक्त’ न हों।


हनुमान धारा एक छोटा सा मंदिर है। हालाँकि इसमें भी भ्रम की स्थिति है। यहाँ पर हनुमान धारा के दो मंदिर हैं और दोनों ही अपने को असली हनुमान धारा होने का दावा करते हैं। कहा जाता है कि राम-रावण युद्ध के बाद भी हनुमान जी लंकादहन की गर्मी से त्रस्त थे। रामायण और रामचरित मानस के अनुसार हनुमान जी ने लंकादहन के तुरंत बाद समुद्र में कूदकर अपनी पूँछ की आग बुझा ली थी। किंतु, यहाँ पर जनश्रुति के अनुसार ज्ञात हुआ कि हनुमान जी की लंकादहन से उत्पन्न जलन शांत नहीं हुई थी। उन्होंने भगवान राम को अपनी समस्या बताई और दाह को शांत करने की प्रार्थना की तो उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाकर संधान किया जिससे चित्रकूट के इस पर्वत पर एक जलधारा प्रकट हुई। इस धारा में हनुमान जी ने स्नान किया तो उनका दाह चला गया। तबसे यह धारा अविरल बह रही है। यह तो सत्य है कि एक पतली जलधारा पर्वत को भेदकर लगातार बहती रहती है, लेकिन इस कथा में कितनी सच्चाई है, इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता है। प्रश्न आस्था का है। हाँ, दोनों मंदिरों में धार्मिक लेन-देन खूब चलता है। यह आप पर निर्भर है कि आप कितने धर्मपारायण हैं और कितना पुण्य खरीदना चाहते हैं।


दोनों मंदिरों में दर्शन करने के उपरांत अधिकांश यात्री वापस लौट आते हैं। कुछ सैलानी जैसे ही लोग और ऊपर जाना पसंद करते हैं। हनुमान धारा से ऊपर की तरफ सीढ़ियां जाती हैं जो पर्वत की चोटी तक पहुँचती हैं, ऊँचाई कुछ कम नहीं है। वहाँ सीता की रसोई है जिसे देखने और मौजूद समय का सदुपयोग करने की इच्छा हम रोक नहीं सके। यहाँ तक पहुँचना आनंददायक था किंतु आगे धर्म कराने और पुण्य बेचने वालों के अनगिनत स्टाल लगे हुए थे जो हमें कब्जे में करने को आतुर थे। कुछ-कुछ आतंक जैसा माहौल माना जा सकता है। छोटे-छोटे घेरे और कपड़े या टिन की छत बनाकर उसमें कई देवी-देवताओं की फोटो और मूर्तियाँ जमाई गई थीं और उन पर मालाएं तथा मुद्राएँ चढ़ी हुई थीं। इन पुण्यस्थलों पर कहीं ‘टोलटैक्स या एंट्री फीस भरते हुए, कहीं घूरते या उपेक्षित करते हुए हम सीता रसोई तक पहुँच ही गए।


सीता रसोई

पर्वत की चोटी पर एक छोटा सा मंदिर बना था जिसे सीता रसोई नाम दिया गया था। पूछने पर पता चला था कि चित्रकूट निवास की अवधि में एक बार सीता जी ने अत्रि सहित तीन ऋषियों को अपने हाथों से बनाकर भोजन कराया था। यह वही स्थल है और सीता रसोई के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा संभव लगता है। हाँ, यदि यह कथा होती कि सीता जी प्रतिदिन यहाँ रसोई बनाया करतीं तो बात कुछ अतार्किक होती। मैं इस बात को महसूस करता रहा कि क्या आदर्श होते थे उस समय लोगों के मन में। विद्वानों की क्या प्रतिष्ठा होती थी और राजवंश में पले-बढ़े लोग कितने सभ्य, विनम्र, सांस्कारिक और उदार होते थे। कितनी मानवता भरी होती थी। सीता जी जैसी राजकुमारी जो जनकराज की पुत्री और दशरथ की पुत्रवधू और राम की पत्नी थीं, अपने हाथों से भोजन बनाकर अतिथि सत्कार करती थीं। एक और युग आया है जब यह सुनकर हैरानी होती है कि अमुक (उच्च शिक्षिता) महिला भोजन बनाना भी जानती है।


खैर, वहां से बाहर निकले तो धर्मचक्र वालों की वसूली फिर शुरू और अपने यहाँ जमाई दुकान पर मत्था टेकने का लगभग बलपूर्वक आग्रह। यहाँ तक आते-आते मेरा धैर्य जवाब दे गया और न चाहते हुए भी खरी-खोटी सुनाना पड़ ही गया। विवाद तो क्या होता, हाँ मूड जरूर खराब हुआ और पाखंड को कोसते हुए हम अवतरण की ओर चल पड़े। नीचे जलपान और धार्मिक स्थलों पर मिलने वाली दुकानों का क्रम था। कुछ सामान देखा गया और जलपान करने के उपरांत फिर वही रामघाट।


 भरतकूप की ओर

अगले दिन सायंकाल हमारी ट्रेन थी। हमारे पास लगभग तीन बजे तक का समय था और हमने यह निश्चय किया कि यह समय भरतकूप के दर्शन करके निकाला जाए। भरत के प्रति मेरे मन बहुत श्रद्धा है, शायद उतनी राम के प्रति नहीं है। किशोरावस्था से ही रामचरित मानस पढ़कर यह श्रद्धा स्थिर भाव से मन में बैठ गई है। तुलसीदास भरत के विषय में लिखते हैं –

     भरत सरिस को राम सनेही। 

     जग जपे राम, राम जपे जेही।।

     जौ न होत जग जनम भरत को। 

      सकल धरमधुरि धरनि धरत को।।

      भरत महामहिमा जलराशी।

      मुनि मति ठाढ़ तीर अबला सी।।

      गा चह पार जतन हियँ हेरा। 

      पावति नाव न बोहित बेरा।। (अयोध्याकांड में विविध प्रसंगो से)


ऐसे भरत कूप का दर्शन तो अनिवार्य ही था। गाँव में बचपन के दिनों में चारों  चारधाम के यात्रियों से सुन चुका था कि चित्रकूट में भरत कूप स्थित है।


भरतकूप रामघाट से लगभग 18 किमी की दूरी पर स्थित है और यही एक तीर्थ चित्रकूट में है जो उत्तरप्रदेश में है। यहाँ के लिए हमने बड़ा वाला ऑटो रिक्शा तय किया और फिर एक बार अस्थिभंजक गर्तशंकुल बीहड़ रास्ते से होते हुए किसी प्रकार एक घंटे की यात्रा करके भरतकूप पहुँच गए।


भरतकूप आज की तारीख में एक कुआँ है जो उपयोग में है। रामकथा के अनुसार राम के राजतिलक हेतु सभी तीर्थों को जल मंगाया गया था किंतु दुर्भाग्यवश राम को वनवास हो गया। यह जल उपयोग में नहीं आ पाया। जब भरत ने चित्रकूट जाकर राम को मनाने और वापस लाने का निर्णय किया तो वे आत्मविश्वास से भरे थे और निश्चय किया कि राम का राजतिलक वहीं कर दिया जाएगा। शायद इसी मानसिकता से वे पूरी सेना, गुरु वशिष्ठ सहित अनेक ऋषियों-मुनियों सहित राजश्री जनक को भी साथ लेकर गए थे। राम समयपूर्व अयोध्या लौटने को तैयार नहीं हुए तो भरत के सामने यह समस्या हुई कि तीर्थों के पवित्र जल का क्या करें। इस पर चित्रकूट का विशद भौगोलिक ज्ञान रखने वाले अति मुनि ने भरत को सलाह दी कि इस पवित्र जल को अमुक कूप में रख दिया जाए क्योंकि वह बहुत ही पवित्र जल वाला कूप है। तीर्थों का जल उसमें रख देने से कूप का भी महत्त्व बढ़ जाएगा और जल का भी सम्मान होगा। इतना ही नहीं, उस दिन से उस कूप का नाम भरतकूप होगा और इसके जल में स्नान करने से समस्त पापों का विनाश होगा। गोस्वामी तुलसीदास को एक बार फिर उद्धृत करें तो :


भरतकूप कहिहहिं सब लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।

प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहंहि बिमल करम मन बानी।। (अयो0/309/8)

कूप एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे है और कूप पर टीन की चादरों से छाया की हुई है। दो-तीन चरखियाँ लगी हुई हैं और अनेक भक्त बाल्टियों से पानी भरकर स्नान करते रहते हैं।


चार भाइयों का मंदिर: कूप परिसर में ही भरत मंदिर और चार भाइयों का मंदिर है। राम मंदिर तो देश में हर गली-मोहल्ले में मिल जाते हैं किंतु भरत मंदिर और चार भाइयों का मंदिर दुर्लभ है। यह स्थल वस्तुत: भाइयों के प्रेम और त्याग का प्रतीक है। एक ओर जहाँ मर्यादा परुषोत्तम राम हैं तो दूसरी ओर उनसे कम त्यागी और धैर्यवान भरत नहीं हैं। लक्ष्मण का त्याग कम करके आँकना भ्रातृस्नेह का घोर अपमान होगा। यह एक ऐसा स्थल है जहाँ पर अयोध्या जैसे स्रामाज्य को लात मारने की होड़ लगी है।


कुछ देर रुककर हमने वापसी का मन बनाया । यहाँ जाने के लिए निजी वाहन ही सर्वोत्तम है। सार्वजनिक वाहन पर भरोसा करना कष्टप्रद हो सकता है। एक वृद्ध दंपति साधन के अभाव में बहुत देर से परेशान हो रहे थे। हमारे ऑटो में पीछे की सीट खाली थी और उन्होंने निवेदन किया तो हम सहर्ष उन्हें बिठा लाए। वे पिछले दो घंटे से वाहन की प्रतीक्षा में परेशान थे।


रामशैया :

भरतकूप से वापसी में रामशैया नामक एक स्थल पड़ता है। यहाँ एक विशाल शिला है जो दो भागों में विभक्त सी दिखती है, या यों कहें कि बीच में मेंड़ सी बनी हुई है। कहा जाता है कि इस शिला पर राम और सीत शयन करते थे। बीच में मेंड़ थी जिससे वे अलग रहते थे और पूरे वनवास काल में उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया था। यह अलग बात है कि पूरी श्रद्धा के बाद भी यह तर्क गले नहीं उतरता कि वे रहते थे कामदगिरि के पास और शयन करने यहां आते थे। इसके सम्मुख एक छोटा सा परिसर है जहाँ कुछ छोटे मंदिर भी हैं और सामने एक विद्यालय है जहाँ उस समय जूनियर तक की परीक्षाएं चल रही थीं। खैर, उस गड्ढेनुमा सड़क से होते हुए हम एक बार फिर रामघाट आ गए। दोपहर का भोजन किया। रामघाट को प्रणाम किया और ट्रेन पकडऩे चित्रकूटधाम कर्वी स्टेशन चल पड़े -हाँ, मन में यह पंक्ति वापसी के समय भी गूँज रही थी -चलु चित चेति चित्रकूटहिं अब। काश ! चित्रकूट को उसकी प्राचीन और उपयुक्त गरिमा पुन: मिल पाती।



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